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मैं एक शख़्स को सदियों से ढूँढता हूँ मगर,
वो शख़्स है कि बहुत कम बचा है मुझ में।

मैं अपने लहजे की शिद्दत से काँप जाता हूँ,
अजब सी एक ख़ामोशी का डर है मुझ में।

सुना है दुनिया में भीड़ है बहुत ज़्यादा है,
मगर एक शहर-ए-ख़ामोश बसा है मुझ में।

अजीब ज़ब्त की आदत है मेरी आँखों को,
समुंदरों सा कोई रोता रहता है मुझ में।

मैं आईने के मुक़ाबिल जो जा के बैठूँ तो,
कोई मज़ाक़ सा उड़ता है मुझ में।

वो एक शाम जो गुज़री थी साथ तेरे कभी,
वही इक शाम ठहर सी गई है मुझ में।

मैं आज थक के जो बैठा तो ये ख़याल आया,
एक उम्र से कोई चलता रहा है मुझ में।

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