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ख़ैर... वे लोग हैं।
उनकी भी अपनी ज़रूरतें हैं,
कुछ अधूरे सपने, कुछ अपनी हसरतें हैं।
कुछ मंज़िलें हैं, जिन तक पहुँचना है,
कुछ प्यासें हैं, जिन्हें हर हाल में बुझना है।
एक दिन वे मेरे दर पर आए,
होंठ सूखे थे, आँखों में विनती लाए।
मैंने घड़ा बढ़ाया, पानी पिलाया,
उन्होंने झुककर धन्यवाद जताया।
दूसरे दिन फिर वही दस्तक थी,
वही प्यास थी, बस बात कुछ कम थी।
मैंने फिर भी गिलास भर दिया,
उन्होंने मुस्कुराकर सफ़र कर लिया।
तीसरे दिन धन्यवाद कहीं खो गया,
पानी लेना जैसे रोज़ का सिलसिला हो गया।
चौथे दिन तो बिना पूछे ही
उन्होंने ख़ुद गिलास उठाया, पानी पिया… और चले गए।
पाँचवें दिन घड़े में पानी थोड़ा कम था,
शायद मेरी मजबूरी का भी कोई मौसम था।
पर उनकी प्यास अधूरी क्या रह गई,
मेरी ख़ामोशी भी उनकी शिकायत बन गई।
छठे दिन घड़ा बिल्कुल खाली था,
मेरे हिस्से में भी एक सूखा सवेरा था।
उन्होंने न वजह पूछी, न हाल जाना,
बस मुड़ गए… जैसे कभी था ही न कोई ठिकाना।
फिर वे लौटकर कभी आए नहीं।
मैंने सोचा—
शायद अब उनकी प्यास बुझ गई होगी।
फिर मन ने धीरे से कहा—
"नहीं...
प्यासें नहीं बुझतीं,
बस उनके कुएँ बदल जाते हैं।"
तभी समझ आया...
ख़ैर... वे लोग हैं।
जो कभी एहसान लगता है,
धीरे-धीरे अधिकार लगने लगता है।
जो कभी सौभाग्य होता है,
वक़्त के साथ सामान्य हो जाता है।
शायद इंसान की फ़ितरत ही ऐसी है—
जब तक घड़ा भरा रहता है,
घड़े वाले का नाम भी याद रहता है।
और जिस दिन घड़ा खाली मिले,
रास्ते भी बदल जाते हैं...
और रिश्तों के मायने भी।
ख़ैर... वे लोग हैं।

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