यह कविता मैंने सोनम वांगचुक के जीवन से प्रेरित होकर लिखी है। यह कविता सोनम वांगचुक के जीवन पर आधारित एक सच्ची और प्रेरणादायक कथा को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें उनके बचपन की कठिन परिस्थितियों, सीमित संसाधनों के बीच सीखने की जिज्ञासा, और संघर्षों से आगे बढ़ते हुए उनके विचारों, मेहनत और नवाचारों तक की यात्रा को दर्शाया गया है।

न दूर-दूर तक स्कूल था, न किताबों का साथ
बर्फ़ीली वादियों में बिताता, वो अपनी हर रात। 
माँ बनी पहली गुरु, कहानी बनी पाठ
घर बैठे उसने जाना, पढाई क्यो हैं खास। 

प्रश्न थे साथी, प्रकृति शिक्षक
न तख़्ती, न बस्ता, न पुस्तक की रट।

फिर आया वह दिन जब घर से दूर भेजा गया,
नौ साल का बच्चा अजनबी स्कूल में आ गया।
नई भाषा, नए नियम, नया सा डर,
जहाँ सोच से पहले रटना था पुस्तक का हर स्वर,

वह धीमे बोलता, सवाल ज़्यादा करता,
इसलिए कक्षा में वह अलग-सा दिखता।
कुछ ने उसकी चुप्पी को कमजोरी समझा,
कुछ ने उसे समझा बेअकल।

कठोर शब्दों ने उसके मन को कई बार तोड़ा।
सारी चीजों को चुपचाप सहता रहा

समय बदला, हालत बदले
संकल्प बस मजबूत हुए।

उसने खोला ऐसा विद्यालय,
जहाँ हारने वाला भी सक्षम हैं
जहा सोचना, समझना और सवाल पूछना ही 
शिक्षा का वास्तविक मर्म हैं।

SECMOL—सिर्फ़ स्कूल नहीं,
एक विश्वास हैं, एक नई शुरुआत हैं, 
जहाँ सूरज से जलती रोशनी हैं
और शिक्षा से लौटता आत्मसम्मान हैं।

फिर जब बर्फ़ पिघलकर खेतों से रूठ गई,
तो उसने हार को अपमानित कर,
 फिर एक नई दिशा ढूँढ ली।

सर्दी में जमा, बसंत में जीवन,
बर्फ़ से ही गढ़ा उसने उम्मीद का प्रण।
आज वही पहाड़ों में खड़ी है मिसाल,
Ice Stupa—जहाँ विज्ञान और संवेदना हैं साथ।

सम्मान मिला, मंच सजे, और पुरस्कार भी खूब मिलते गये
पर असली जीत तो वो मुस्कान थी, जो देश प्रेम की मिसाल थी

उसकी समझ का अर्थ किताबों से आगे था,
जीवन का मतलब अपनो के काम आना था।

सब ठीक चल रहा था,
सोनम अपना धर्म निभा रहा था,
बच्चों की हँसी, पहाड़ों की साँस,
लद्दाख के कल को बचा रहा था।

न नाम की भूख, न सत्ता का लोभ,
मेहनत मे बस सेवा का जोश।

“छठी अनुसूची” —
ताकि लद्दाख रहे सुरक्षित,
और भविष्य रहे आबाद।

वह अनशन पर बैठा, बिना शोर, बिना हुंकार।
देह दुबली होती गई, पर इरादे रहे अपार।

दिन बीते, रातें बीतीं, ख़बरें आईं, फिर खो गईं।
सत्ता चुप रही, और जनता भी अपने बिस्तर मे में सो गई।

फिर एक दिन हालात बिगड़े, भीड़ में आग लगी।
जिसका हाथ न था उस हिंसा में, उसके ही नाम की परछाईं लाई गई।

और जिसने देश को, सम्मान दिलाया था कभी
वही सलाखों के पीछे खड़ा है अभी।

कितना अजीब है यह दौर,
जहाँ सेवा को साज़िश कहा जाता है।
जो सच बोलता है साफ पानी सा,
उसे ही चुप कराया जाता है।

और हम?
हम स्क्रॉल कर आगे बढ़ जाते हैं,
कुछ देर दुखी होते हैं, फिर सब कुछ भूल जाते हैं।

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