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रात मचलती ओढ़ चांदनी, दूर क्षितिज तक पैर पसारे,
लाल गुलाबी आँखों को, फिर टूटा सा कोई ख्वाब पुकारे,
सन्नाटे का शोर है गूंजा, आवाज़ें सब मौन हुई,
सोम रस प्याला डगमग छलका, और पलके मदहोश हुई.
चाँद टहलता स्याह गगन पे, तारो की बारात लिए,
जूझ रहे है अन्धकार से, राहो के खामोश दिए,
कच्ची पक्की नींद ऊंघते, धीरे धीरे करे इशारे,
उम्मीदों के पंख पखेरू सूरज की अब बाट निहारे