प्रत्येक देश का एक राष्ट्रीय चरित्र होता है, जैसे इंग्लैण्ड के लोग देशभक्त हैं, जापान के लोग परिश्रमी हैं तथा फ्रांस के लोग सौन्दर्य-प्रेमी हैं। यदि इसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय लोगों की कोई मूलभूत विशेषता बतानी हो, तो कह सकते हैं कि भारत के अधिकतर लोग भ्रष्टाचार के दल-दल में गले तक फँसे हुए हैं तथा भ्रष्टाचार हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है। चाहे वह व्यापारी हो या नौकरीपेशा व्यक्ति, राजनीतिज्ञ हो या प्रोफेशनल, शिक्षक हो या ठेकेदार—किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार में लिप्त है। यह एक कड़वी सच्चाई है, जो सुनने में कर्णकटु भले ही लगे, किन्तु है यह नितान्त सत्य, जिसे हमें स्वीकार करना ही पड़ेगा।
भारत एक आध्यात्मिक देश है। इतिहास साक्षी है कि हम लोग संतोषी रहे हैं। धन-लिप्सा ने हमें नैतिकता व मानवतावादी मूल्यों से जैसा वर्तमान समय में विचलित कर दिया है, वैसा पहले कभी नहीं था। धर्म, अध्यात्म, नैतिकता भले ही हमें सदाचार की शिक्षा देते हों, किन्तु हमारा आचरण दिनों-दिन भ्रष्ट होता जा रहा है। और वह यह कि भ्रष्टाचार का तात्पर्य केवल “रिश्वत” ही नहीं है, अपितु अनुचित मुनाफाखोरी, करों की चोरी, मिलावट, कर्तव्य के प्रति उदासीनता, सरकारी साधनों का अनुचित प्रयोग भी भ्रष्टाचार की परिधि में आते हैं। आइए, हम अपने-अपने गिरेबान में झाँककर देखें और फिर इस कथन की परीक्षा करें कि क्या भ्रष्टाचार हमारा राष्ट्रीय चरित्र नहीं है?
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के अवसर पर देश की जनता ने यह कल्पना की थी कि अब हमारी अपनी सरकार होगी और हमें भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, किन्तु यह सच नहीं हुआ। अब तो हालात इतने बदतर हो गए हैं कि इस भ्रष्टाचार-रूपी दानव ने समाज को पूरी तरह अपने जबड़ों में फँसा लिया है। आज भ्रष्टाचार का जो स्वरूप हमारे देश में विद्यमान है, उससे सभी परिचित हैं। सरकारी कार्यों में बिना भेंट-पूजा दिए हुए कोई कार्य करवा लेना असम्भव है। क्लर्क के रूप में जो व्यक्ति सीट पर बैठा हुआ है, वही आपका असली भाग्य-विधाता है। अफसर को वह ऐसे-ऐसे चस्के देता है कि बेचारे को नानी याद आ जाती है। यदि क्लर्क न चाहे, तो आप ऐड़ियाँ रगड़ते रहिए—आपकी फाइल पर “फॉरवर्डिंग” नोट नहीं लगेगा। और भला किस अफसर की मजाल है जो क्लर्क की टिप्पणी के बगैर अपना निर्णय लिख दे। कहावत है कि प्रान्त में बस दो ही शक्तिशाली व्यक्ति हैं—लेखपाल या राज्यपाल। लेखपाल ने जो लिख दिया, बस उसे काटने वाला तो जिलाधिकारी भी नहीं।
भ्रष्टाचार के चलते हुए आज लाखों रुपये महीने कमाने वाले डॉक्टर, वकील आदि विभिन्न उपायों से आयकर की चोरी करते हैं। “प्रोफेशनल” कार्य करने वाले कितने लोग ऐसे हैं, जो सही आयकर देते हैं?
व्यापारियों और उद्योगपतियों ने तो बाकायदा चार्टर्ड अकाउन्टेंट रखे हुए हैं, जो उन्हें कर बचाने तथा कर-चोरी करने के उपाय सुझाते हैं।
शिक्षक कॉलेजों में पढ़ाने में उतनी रुचि नहीं लेते, जितनी ट्यूशन व कोचिंग की दुकान चलाने में लेते हैं। विद्यार्थियों को ट्यूशन पढ़ने के लिए बाध्य करते हुए तरह-तरह के हथकण्डे अपनाते रहते हैं। स्कूल-कॉलेज में कक्षाएँ नहीं लगतीं, किन्तु कोचिंग स्कूलों में सदैव भीड़ रहती है।
सरकारी अधिकारी, जिन्हें जनता का सेवक माना जाता है, दोनों हाथों से जनता को लूट रहे हैं। पुलिस का मामूली दरोगा चार-पाँच वर्ष की नौकरी में ही मोटरसाइकिल, मकान, टी.वी., फ्रिज जैसी सुविधाएँ जुटा लेता है। क्या सरकार उससे कभी पूछती है कि भाई, अपने वेतन में इतनी बचत कैसे कर लेते हो, जो लाखों रुपये की सम्पत्ति खरीद ली?
राजनीति में भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। सच तो यह है कि भारतीय चुनाव-पद्धति लोकतन्त्र की खिलवाड़ है। कौन नहीं जानता कि सरकार द्वारा प्रत्याशियों के लिए निर्धारित व्यय-सीमा में चुनाव लड़ पाना असम्भव है। नेतागण चुनाव जीतने के लिए सभी मर्यादाओं को त्याग देते हैं और जब वे भ्रष्ट आचरण से चुनाव जीतते हैं, तो फिर नाक तक भ्रष्टाचार में डूबकर पैसा बनाते हैं। यदि ऐसा नहीं करेंगे, तो अगले चुनाव में उनकी नैया कैसे पार लगेगी?
राजनीतिक पार्टियाँ चुनाव-खर्च के लिए बड़े-बड़े उद्योगपतियों से चन्दा लेती हैं और फिर उन्हें लाभ पहुँचाने के लिए ऐसे नीतिगत निर्णय लिए जाते हैं, जिससे उद्योगपतियों की चाँदी कटती है और गरीब जनता पर उसका बोझ पड़ता है। देश के लिए किए बड़े-बड़े सौदों में भी कमीशन तथा दलाली के नाम पर लम्बी रकम ऐंठ ली जाती है। बोफोर्स सौदे में कमीशन लिया गया—यह तो सिद्ध हो गया है, पर किसने यह रकम डकार ली, यह रहस्य उजागर नहीं हो सका।
भ्रष्टाचार एक सामाजिक अभिशाप है। भ्रष्टाचार को सही ठहराने के लिए लोग तरह-तरह के तर्क गढ़ते हैं, यथा—साहब, इस बढ़ती हुई महँगाई में वेतन से खर्च नहीं चल सकता, अतः मजबूर होकर हमें रिश्वत लेनी पड़ती है; या फिर, क्या करें—बेटी के विवाह में दस लाख का दहेज देना है, अब इतना पैसा वेतन से तो बचाया नहीं जा सकता। ऐसे कितने ही तर्क बेमानी हैं। सच तो यह है कि लोग अपने अपराध-बोध से ग्रस्त रहते हैं और उसे कम करने के लिए इस प्रकार के तर्क गढ़ लेते हैं, जिनमें कोई वजन नहीं होता।
आज हमारी दृष्टि बदल गई है। हम भौतिकवादी हो गए हैं और भौतिक वस्तुओं के प्रति हमारा मोह बढ़ गया है। सुविधाभोगी जीवन-पद्धति के हम आदी बन गए हैं। जैसे भी सम्भव हो, भोग-विलास के उपकरण एकत्र किए जाएँ। पारस्परिक प्रतिस्पर्धा ने भी भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया है। अब यदि पड़ोसी के घर में रंगीन टी.वी. और फ्रिज हैं, तो भला मेरे घर क्यों न हों? बस, एक अंधी दौड़ प्रारम्भ हो जाती है, जिसका समापन भ्रष्टाचार के कुएँ में होता है।
इस भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए बहुत ज़रूरी है कि आयकर के अधिक से अधिक छापे मारे जाएँ और प्रत्येक व्यक्ति से उसके आय-व्यय का हिसाब-किताब पूछा जाए। सरकारी कर्मचारियों पर विशेष निगाह रखी जाए, जिससे वे अनुचित साधनों से धन अर्जित न कर सकें। सम्भव हो तो उनकी सम्पत्ति की खुफिया जाँच करवाई जाए; उनके रहन-सहन के स्तर को भी देखा-परखा जाए।
यदि इन उपायों को ईमानदारी से लागू कर दिया जाए, तो कोई कारण नहीं कि हम भ्रष्टाचार की इस समस्या से छुटकारा न पा सकें।