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वो सख्त लहजा, वो माथे की शिकन,
पूरा घर काँपता था, देख उसका आगमन।
नियम ही धर्म थे, अनुशासन ही था खुदा,
मुस्कुराहट उस चेहरे से रहती थी सदा जुदा।
दुनिया कहती थी—'ये पत्थर है, पिघलेगा नहीं',
इस सूखे दरख्त पर फूल कोई खिलेगा नहीं।
पर वक्त के हाथों में एक अजीब सी लकीर थी,
उसकी सख्त रूह की बदलनी अब तकदीर थी।
फिर एक रोज़ घर में नन्हीं पायलें खनक उठीं,
खामोश दीवारों की सोई हुई किस्मत जाग उठी।
एक नन्ही सी उँगली ने जब उसके हाथ को थामा,
जैसे बरसों का कोई पुराना बांध एकाएक टूटा।
वो शख्स जो बात-बात पर बिजली सा कड़कता था,
अब ज़मीन पर झुककर 'घोड़ा' बनकर चलता था।
ग़ुस्से वाली वो आँखें, जो सुर्ख रहा करती थीं,
अब बस काजल की डिबिया और लोरी में ढलती थीं।
परिवर्तन के रंग:
कठोरता से कोमलता: जो हाथ मेज़ पर मुक्के मारते थे, अब मासूम की गाल सहलाते हैं।
मौन से संवाद: शब्दों की जगह अब तुतली भाषा ने ले ली है।
अहंकार से समर्पण: खुद को सर्वोपरि मानने वाला अब एक मुस्कान के लिए हार जाता है।
ये जादू नहीं, बस प्रेम का एक सच्चा स्पर्श था,
जिसने बता दिया कि इंसान का असली उत्कर्ष क्या था।
वही शख्स, वही चेहरा, पर रूह अब नई थी,
नफरत की पुरानी किताब अब कहीं खो गई थी।
सच है, मोहब्बत जब किसी के भीतर घर करती है,
तो वो बड़े-बड़े तूफानों का रुख मोड़ देती है।
इंसान बदलता नहीं, बस उसे कोई चाहिए—
जो उसकी कड़वाहट को
 अपनी मिठास से धो देती है।

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