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मंच सजा है, शोर बढ़ा है, आँखों में अरमान लिए,
निकला हूँ मैं आज यहाँ फिर, हाथों में तूफ़ान लिए।
सब कहते हैं "किस्मत चमकी", सब कहते "तक़दीर मिली",
पर किसी ने न देखा वो रातें, जो काली और पीर (दर्द) भरी थीं।
यह कहानी किसी कागज़ की स्याही का खेल नहीं,
यह लहू के उस उबल का है, जिसका कोई मेल नहीं।
जब छालों ने पाँव घेरे थे, और मंज़िल कोसों दूर थी,
जब टूटी हुई हर सांस मेरी, बस लड़ने को मजबूर थी।
मैंने गिरकर उठना सीखा है, मैंने हार को ललकारा है,
मैंने बीच भंवर में रहकर, खुद को खुद ही उबारा है।
सोने की चमक न देखो तुम, देखो भट्टी की उस आग को,
जिसने कुंदन (शुद्ध सोना) बना दिया, मेरे लोहे जैसे भाग को।
हाँ, मैं वही हूँ जिसने कल, सन्नाटों से बात की थी,
सूरज से आँखें मिलाने की, अंधेरों में शुरुआत की थी।
आज जो जीत का सहरा है, वह महज़ एक इनाम नहीं,
यह तपस्या है उस राही की, जिसका कोई विश्राम नहीं।
सच्ची कहानी वही यहाँ, जो खुद अपनी मशाल बने,
जो गिरकर ऐसा खड़ा हुआ, कि दुनिया के लिए मिसाल बने।
ठोकरें मारो उन दीवारों को जो रास्ता रोकती हैं,
उखाड़ फेंको उन जंजीरों को जो परवाज़ टोकती हैं।
मेरी रगों में बहता लहू, अब लावा बन चुका है,
सच्ची कहानी वही, जो तूफानों का रुख मोड़ती 
है! यहाँ किस्मत के पन्ने खैरात में नहीं मिलते,
जो डरकर बैठ जाएँ, उन्हें मंज़िल के निशान नहीं मिलते।
ये दुनिया भेड़ियों की है, यहाँ छीनना पड़ता है अपना हक,
हाथ जोड़कर मांगने वालों को ऊँचे मुकाम नहीं मिलते!
वो जो कहते हैं कि तक़दीर पहले से लिखी है,
उनसे कह दो—मेरी कलम मेरे पसीने में डूबी है।

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