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ये रंगीन कागज़ की डिग्रियाँ अब सवाल करती हैं,
किताबों में छुपी वो रातें, अब मलाल करती हैं।
बचपन बेचा, अल्हड़पन बेचा, बेचा सुहाना सुकूँ,
पाने को एक अदद ठप्पा, बहाया रगों का ख़ून,
वो ख़ून की बूँदें अब मेज़ पर, बवाल करती हैं,
ये रंगीन कागज़ की डिग्रियाँ अब सवाल करती हैं। तराशा था खुद को जिसके लिए...
 कमरे की वो तन्हाई:  जहाँ सिर्फ़ उम्मीदों का दीया जलता था।
 चश्मे के बढ़ते नंबर: जो उजले भविष्य का ख़्वाब बुनते थे।
 फ़ाइलों में दबी वो फ़र्ज़ की सिसकियाँ:** जो अब बेआवाज़ चीखती हैं।
सलीके से सजाकर रखा था जिन्हें अलमारी के सीने में,
वो सनदें अब कसमसाती हैं इस घुटन में जीने में,
धूल जमती उम्मीदों पर, ये वक़्त की चाल करती हैं,
ये रंगीन कागज़ की डिग्रियाँ अब सवाल करती हैं।
"दुकानदार पूछता है तजुर्बा, ज़माना पूछता है औकात,
कोई नहीं पूछता कि इस कागज़ के पीछे दफ़न हैं कितनी जज़्बात।"
 
चमकते अक्षरों में लिखा नाम, जैसे कोई कफ़न हो,
मेहनत की उस ज़मीन पर, जैसे बंजर कोई चमन हो,
हुनर जेब में सिसकता है, और ये डिग्रियाँ...
बाज़ार में खड़े होकर, बस अपनी ही नुमाइश का मलाल करती हैं।
ये रंगीन कागज़ की डिग्रियाँ अब सवाल करती हैं,
कि तुमने पाया क्या, जो खोया है वो बेमिसाल करती हैं।

जीत जाऊँ तो ज़माने की नज़रों में सिकंदर हूँ,
हार जाऊँ तो जैसे खुद अपनी ही आँखों में एक समंदर हूँ।"
ये पूछती हैं—"अगर तुम सफल नहीं, तो तुम क्या हो?"
जैसे मेरी हँसी, मेरी मासूमियत, मेरा इंसान होना कुछ भी नहीं।
हर सवाल में ये मेरे अस्तित्व पे वार करती हैं,
ये रंगीन कागज़ की डिग्रियाँ, मुझे खुद ही से बेज़ार करती हैं।

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