एक नन्हा बालक जन्मा था,
धूल भरे उस गाँव की छाया में,
नाम था Bhimrao Ramji Ambedkar,
जिसकी तकदीर लिखी थी संघर्ष की माया में।
ना किताबें पास थीं पूरी,
ना सम्मान का कोई अधिकार,
छू लेने से भी जिन्हें अपवित्र कहते थे लोग,
वही बना आगे चलकर ज्ञान का भंडार।
स्कूल की चौखट पर अपमान मिला,
प्यास लगी तो पानी भी नसीब न हुआ,
पर आँखों में जला एक दीपक ऐसा,
जिसे कोई अंधेरा कभी बुझा न सका।
विदेशों तक जाकर ज्ञान लिया,
हर बंद दरवाज़े को खोल दिया,
कोलंबिया की धरती से लेकर लंदन तक,
अपने सपनों को सच में ढाल दिया।
फिर लौटे वो अपनी मिट्टी में,
जहाँ दर्द अभी भी जिंदा था,
हर शोषित, हर पीड़ित की आवाज़ बने,
जहाँ इंसान इंसान से ही शर्मिंदा था।
कलम उठाई तो इतिहास लिखा,
अन्याय के खिलाफ बिगुल बजाया,
भारत के संविधान में समानता भर दी,
हर दिल में अधिकारों का दीप जलाया।
ना झुके कभी, ना रुके कभी,
हर तूफ़ान से लड़ते चले गए,
“शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”
ये मंत्र देकर अमर बन गए।
अंतिम सांस तक लड़े वो,
अपने लोगों के अधिकारों के लिए,
और फिर छोड़ गए ये संदेश,
कि जीना है तो सम्मान के लिए।
आज भी जब अन्याय दिखता है,
तो याद आती है उनकी आवाज़,
जो कहती है—
“खुद को बदलो, समाज बदलेगा”
यही है सच्ची श्रद्धांजलि का राज।
हे बाबासाहेब,
आप सिर्फ एक नाम नहीं,
एक क्रांति हैं, एक विचार हैं,
आपका संघर्ष हर दिल में जिंदा है,
आप भारत की आत्मा का आधार हैं।

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