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फिर एक कैलेंडर बदला है,
तारीख ने चुपचाप करवट ली है,
पर क्या सच में कुछ बदला है?
वही सुबह है,
वही अलार्म की कर्कश आवाज़,
वही दौड़ती हुई ज़िंदगी,
वही थकान, वही तनाव,
वही अधूरी नींद और अधूरे ख़्वाब।
नए साल का नाम लेकर
हमने कितने ही साल देखे हैं,
हर बार सोचा था—
“इस बार सब कुछ नया होगा,”
पर हर बार वही पुरानी फाइलें खुलीं,
वही जिम्मेदारियाँ,
वही समझौते,
वही मुस्कान जो अक्सर मजबूरी बन जाती है।
कुछ रिश्ते धीरे-धीरे
बिना शोर के टूट जाते हैं,
कुछ लोग बिना वजह
ज़िंदगी से निकल जाते हैं।
कुछ नए आते हैं,
पर दिल उनसे भी डरता है—
कहीं ये भी आदत बनकर
एक दिन याद न बन जाएँ।
हर साल कुछ सपने
थोड़े और थक जाते हैं,
कुछ उम्मीदें चुपचाप
कोने में रख दी जाती हैं।
हम कहते तो हैं— “सब ठीक है”,
पर भीतर कहीं
बहुत कुछ ठीक नहीं होता।
फिर भी…
इस सारी थकान के बीच
एक ज़िद बची रहती है।
एक छोटा सा दीप,
जो हर अँधेरे के बाद
अपने आप जल उठता है।
क्योंकि अगर उम्मीद न हो
तो सुबह का मतलब क्या?
अगर भरोसा न हो
तो साँसों की कीमत क्या?
शायद नया साल
कोई जादू नहीं करता,
शायद वो हमें बदलने नहीं आता,
पर हमें याद ज़रूर दिलाता है—
कि टूट कर भी चलना आ सकता है,
कि गिरकर भी उठना आता है।
शायद इस साल भी
सब कुछ वैसा ही रहे,
पर हम थोड़े मज़बूत हो जाएँ।
शायद हालात न बदलें,
पर नज़र बदल जाए।
और यही तो काफी है…
कि निराशा के शोर में भी
उम्मीद की आवाज़ ज़िंदा रहे।
कि नए साल से नहीं,
खुद से एक वादा करें—
छोड़ेंगे नहीं,
रुकेंगे नहीं,
और उम्मीद को
मरने नहीं देंगे।

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