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मेरा मन जो तलाशता हैं
तराशकर जो थक सा गया है।
अर्धविराम जो कुछ ही सही पर
पूर्णविराम न रुक सा गया है।

आती हैं जो भी बाँधाए
उनको उपहार बनाया।
हार- हारकर सबको मैंने
अपने गले लगाया।

कोई साथ नहीं तो क्या गम हैं?
थोड़ी ही सही आँखें नम हैं।
मजबूत बना में टूट- टूट कर
नहीं किसी से कुछ कम हैं।

कहीं गिर सा गया
मैं बिखर गया।
जब जख्म भरे थे इस दिल में
मैं निखर गया सो निखा गया।

जिस आंधी से सब डरते हैं
उस आंधी 'मै' तो पला - बड़ा।
उखाड़ सके तो क्या उखड़े
जिद में देखो 'मैं' जो अड़ा।

कहने को आए चले गए
हर किसी बात का किस्सा है।
हर हार - जीत सौ बाधाएँ
मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं।

आए हो तो कुछ कर जाओ
लोगों के विश्वास में।
तेरे लिए सब स्वीकृत सारी
धरती और आकाश में।

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