“पढ़ाई का बोलते ही फिर नौटंकी शुरू हो गई तुम्हारी!”
मेरी बहन, जो प्राथमिक कक्षाओं की शिक्षिका है, अक्सर अपने साढ़े चार साल के बेटे को पढ़ाते हुए यह बात कह देती है। कभी नए अक्षर या कोई नया शब्द समझने में उसे थोड़ी मुश्किल होती, कभी वह लिखते समय बार-बार गलती करता और कभी कुछ देर बाद पढ़ाई से उसका ध्यान हट जाता। तब उसे डाँटते हुए कहा जाता, “खेलने से नहीं थकते, बाकी सारे काम करने आते हैं, बस पढ़ना नहीं आता। अपनी राइटिंग देखो, कितनी खराब है!”
कभी-कभी तो उसे डराने के लिए यह भी कह दिया जाता, “ऐसे रोओ मत, मगरमच्छ की तरह आँसू दिखाते हो। ज्यादा नाटक किया तो भूत वाले कमरे में बंद कर दूँगी।”
लगभग रोज-रोज ऐसा होते देख मैं भी एक सवाल पर गंभीरता से सोचने लगी—क्या सच में साढ़े चार साल का बच्चा पढ़ाई से बचने के लिए नाटक करता है? क्या वह जान-बूझकर नए अक्षर नहीं लिखता? या फिर सचमुच वह अभी उन अक्षरों, शब्दों और उनकी ध्वनियों को समझने में असमर्थ है?
थोड़ा ध्यान से देखने पर मुझे इसका जवाब मिला—नहीं, जरूरी नहीं कि बच्चा नाटक कर रहा हो। हो सकता है वह सचमुच सीखने की प्रक्रिया में संघर्ष कर रहा हो।
हम अक्सर बच्चों से वही अपेक्षा करने लगते हैं, जो चीजें आज हमें बेहद आसान लगती हैं। हमें ‘A’, ‘B’, ‘C’ लिखना आता है। हमें क, ख, ग पहचानने में कोई कठिनाई नहीं होती। कोई शब्द पढ़ना या लिखना हमें सामान्य काम लगता है। लेकिन क्या हमने कभी यह सोचने की कोशिश की है कि जिस बच्चे ने पहली बार किसी अक्षर को देखा है, उसके लिए वह कितना नया है?
जिस चीज को हम वर्षों के अभ्यास के बाद सहजता से कर लेते हैं, वह बच्चे के लिए बिल्कुल नई दुनिया होती है।
मान लीजिए हम 30-32 साल के हैं और पहली बार कार चलाना सीख रहे हैं। क्या हम पहली ही कोशिश में क्लच, ब्रेक, एक्सीलेरेटर, गियर और स्टीयरिंग सब कुछ बिल्कुल सही तरीके से संभाल पाएँगे? शायद नहीं। प्रशिक्षक को हमें बार-बार समझाना पड़ेगा। हमसे गलतियाँ होंगी। कभी कार बंद होगी, कभी गियर गलत लगेगा और कभी घबराहट भी होगी।
तो फिर हम यह कैसे उम्मीद कर लेते हैं कि साढ़े चार साल का बच्चा पहली बार देखे गए अक्षर को दो-तीन बार में बिल्कुल सही लिख ले?
बच्चे का दिमाग अभी सीखने और समझने की प्रक्रिया में है। उसके लिए अक्षर केवल एक आकृति नहीं है। उसे उस आकृति को पहचानना है, उसका नाम याद रखना है, उसकी ध्वनि समझनी है, उसे दूसरे अक्षरों से अलग पहचानना है और फिर हाथ की उँगलियों को उसी आकार में चलाना भी सीखना है। यह सब एक साथ करना किसी छोटे बच्चे के लिए उतना आसान नहीं, जितना हमें आज लगता है।
मैंने अपने भतीजे को कई बार ध्यान से देखा है। कभी वह किसी अक्षर को पहली कोशिश में ही सही लिख लेता है और कभी छह-सात बार कोशिश करने के बाद भी उसे सही नहीं लिख पाता। वह कोशिश करता है, फिर मिटाता है, फिर लिखता है। लेकिन जब बार-बार गलती होती है तो पढ़ाने वाले का धैर्य भी टूटने लगता है।
यह भी स्वाभाविक है।
घर की जिम्मेदारियाँ होती हैं, दूसरे काम होते हैं, समय सीमित होता है। कोई भी व्यक्ति लगातार घंटों तक एक ही बात धैर्य से समझाता रहे, यह हमेशा संभव नहीं। लेकिन इसी जगह हमें एक बात याद रखने की जरूरत है—जिस तरह बड़े व्यक्ति का धैर्य खत्म हो सकता है, उसी तरह बच्चे की मानसिक ऊर्जा भी खत्म हो सकती है।
बच्चा खेलते-खेलते घंटों क्यों नहीं थकता, लेकिन पढ़ते समय कुछ ही देर में परेशान क्यों हो जाता है? इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि वह पढ़ाई से भागना चाहता है। हो सकता है खेल उसके लिए आनंद और सीखने का सहज माध्यम हो, जबकि लिखना-पढ़ना अभी उसके लिए मेहनत वाला काम हो।
बच्चे को गलती पर समझाना जरूरी है। अनुशासन भी जरूरी है। उसे सही और गलत का अंतर सिखाना भी जरूरी है, ताकि वह बड़ा होकर अपने साथ-साथ दूसरों का भी सम्मान करना सीखे। लेकिन अनुशासन और अपमान में बहुत महीन अंतर होता है।
“यह अक्षर गलत लिखा है, चलो एक बार फिर कोशिश करते हैं।”
और
“तुमसे कुछ नहीं होता, तुम जान-बूझकर गलत लिखते हो।”
इन दोनों वाक्यों का उद्देश्य ऊपर से देखने पर एक जैसा लग सकता है—बच्चे को सही लिखना सिखाना। लेकिन बच्चे के मन पर इनका प्रभाव बिल्कुल अलग हो सकता है।
पहला वाक्य बच्चे को दोबारा कोशिश करने का अवसर देता है। दूसरा उसे यह महसूस करा सकता है कि समस्या उसके काम में नहीं, बल्कि उसी में है।
बार-बार “नालायक”, “धीमा”, “ड्रामेबाज” या “तुमसे नहीं होगा” जैसे शब्द सुनने वाला बच्चा धीरे-धीरे अपनी क्षमता पर ही संदेह करने लग सकता है। वह अगली बार गलती होने के डर से कोशिश करने से भी बच सकता है। कई बार बच्चा पढ़ाई से इसलिए नहीं भागता कि उसे पढ़ना पसंद नहीं, बल्कि इसलिए कि उसे गलती करने पर मिलने वाली डाँट से डर लगने लगता है।
और डर सीखने का अच्छा साथी नहीं है।
बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि गलती करना सीखने का हिस्सा है। अगर उसने गलत अक्षर लिखा है तो उसे सुधारना है, लेकिन यह संदेश भी मिलना चाहिए कि अगली कोशिश में वह बेहतर कर सकता है।
“चलो, इस बार थोड़ा ध्यान से देखते हैं।”
“पहली बार में नहीं हुआ तो कोई बात नहीं।”
“तुमने कोशिश तो अच्छी की, अब इसे एक बार और करते हैं।”
ऐसे छोटे-छोटे वाक्य बच्चे के आत्मविश्वास में बड़ा अंतर ला सकते हैं।
इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि बच्चे की हर गलती को नजरअंदाज कर दिया जाए या उसे कभी डाँटा ही न जाए। ऐसा करना भी उचित नहीं होगा। बच्चे को सीमाएँ समझनी चाहिए और गलत व्यवहार पर रोकना भी जरूरी है। लेकिन गलती सुधारते समय बच्चे को उसकी गलती से अलग रखना जरूरी है।
“तुमने गलत लिखा है” कहना और “तुम गलत हो” कहना एक बात नहीं है।
इसी अंतर को बड़े लोगों को समझने की जरूरत है।
बच्चे को डराकर पढ़ाया जा सकता है, लेकिन क्या वह डर उसके भीतर सीखने की खुशी भी पैदा करेगा? यह सोचने वाली बात है।
कभी-कभी हम माता-पिता या अभिभावक बच्चे के भविष्य को लेकर इतने चिंतित हो जाते हैं कि वर्तमान में उसके साथ हमारा व्यवहार कैसा हो रहा है, यह भूल जाते हैं। हम चाहते हैं कि बच्चा आगे बढ़े, अच्छा पढ़े, आत्मनिर्भर बने और जीवन में सफल हो। हमारी मंशा बिल्कुल गलत नहीं होती। लेकिन अच्छी मंशा के साथ सही तरीका भी जरूरी है।
बच्चे को पढ़ाते समय शायद हमें कभी-कभी खुद अपने बचपन में लौटकर देखना चाहिए।
जब हमने पहली बार अक्षर लिखे होंगे, पहली बार गिनती सीखी होगी, पहली बार साइकिल चलाई होगी या कोई नई चीज सीखी होगी, तब क्या हम भी हर बार सही कर पाते थे?
शायद नहीं।
फिर समय के साथ वही चीजें इतनी सामान्य हो गईं कि हमें अपनी शुरुआती मुश्किलें याद ही नहीं रहीं।
यही भूल हम बच्चों के साथ कर बैठते हैं।
इसलिए अगली बार जब कोई छोटा बच्चा नया अक्षर गलत लिखे, बार-बार मिटाए, रोने लगे या पढ़ाई से थोड़ी देर बचने की कोशिश करे, तो उसे तुरंत “ड्रामेबाज” कहने से पहले एक बार रुककर देखिए।
क्या वह सच में जान-बूझकर नहीं कर रहा?
या वह अपनी पूरी कोशिश के बावजूद अभी सीख नहीं पा रहा?
क्या उसे डाँट की जरूरत है?
या थोड़े और समय, अभ्यास और प्रोत्साहन की?
शायद जवाब हर बच्चे के लिए अलग हो।
बच्चों को सिखाने में केवल किताब और पेंसिल ही नहीं, धैर्य, प्रोत्साहन और भरोसा भी जरूरी हैं।
आज जो अक्षर हमें बहुत आसान लगता है, कभी वह भी हमारे लिए नया था। फर्क सिर्फ इतना है कि हमें वह समय याद नहीं।
इसलिए बच्चे की कोशिश को उसकी गलती से बड़ा देखिए। उसे सुधारिए, लेकिन उसके आत्मविश्वास को तोड़कर नहीं। उसे अनुशासन सिखाइए, लेकिन डर के सहारे नहीं। उसे आगे बढ़ाइए, लेकिन यह विश्वास दिलाते हुए कि गलती होने पर भी वह दोबारा कोशिश कर सकता है।
हो सकता है आज वह अक्षर छह-सात बार में लिख पाए।
लेकिन अगर हर कोशिश के बाद उसके मन में यह विश्वास बचा रहा कि “मैं सीख सकता हूँ”, तो कल वही बच्चा बहुत कुछ सीखने की हिम्मत करेगा।
और शायद तब हमें समझ आएगा कि वह “ड्रामेबाज” नहीं था।
वह बस एक छोटा-सा बच्चा था, जो अपनी नई दुनिया को समझने की कोशिश कर रहा था।