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बिहार के चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं। बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम में सबसे ज्यादा भाजपा की प्राप्त सीटों ने चौंकाया। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था कि भाजपा अपने लगभग सत्तर उम्मीदवारों को फिर से मैदान में उतारा है, कहीं यह रणनीति भारी न पड़ जाए। राजनीतिक गलियारों में नीतीश को मुख्यमंत्री घोषित न करना भाजपा की रणनीतिक चूक माना जाता था, लेकिन उसकी जीत ने देश के राजनीतिक पंडितों के माथे पर बल ला दिया।

बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा की सफलता से एक बात स्पष्ट है कि उत्तर भारतीय राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की ओर दलितों, बहुजनों और पिछड़ों का एक बड़ा वर्ग दक्षिणपंथी राजनीतिक आदर्शों का समर्थन करता है। यह हिंदुत्व राष्ट्रवाद और स्थानीय जातिगत इतिहास के बीच एक कड़ी विकसित करने हेतु सांस्कृतिक रणनीतियों की नवीनता के माध्यम से अंतर-जातीय तनावों को दूर करने के लिए किया गया है। बिहार चुनाव के बाद अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में टूटते जातीय समीकरणों की प्रमुखता से चर्चा की। दलित-बहुजन दृष्टिकोण से सामाजिक इतिहास लेखन की लोकप्रिय शैली को अब तक मुख्यधारा द्वारा नज़रअंदाज़ किया जाता रहा है। भाजपा इसे अपनाने में सफल रही है, जबकि विपक्ष के पास इस क्षेत्र में हिंदुत्व के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए वैकल्पिक दृष्टि और सांस्कृतिक रणनीतियों का अभाव रहा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हिंदुत्व की राजनीति में हालिया मंथन इसके पहले के "ब्राह्मणवादी" संस्करण से अलग प्रतीत होता है। दलितों, बहुजनों, आदिवासियों और पिछड़ों के बीच एक महत्वपूर्ण वर्ग भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक पहल में शामिल हो गया है, जिससे यह एक "समावेशी" पार्टी बन गई, जिसे अब "सबाल्टर्न हिंदुत्व" के नए शीर्षक के तहत वर्णित किया गया है। भाजपा ने विभिन्न निम्न जाति समूहों के सांस्कृतिक दावों को सुधारने और उनसे जुड़ने के द्वारा सामाजिक इंजीनियरिंग की कला को फिर से खोज लिया है। यह स्थानीय सांस्कृतिक विशिष्टताओं के लिए एक राष्ट्रवादी वैचारिक उपांग प्रदान करता है और रणनीतिक रूप से हिंदू धार्मिक देवताओं के भीतर अपनी पहचान की पहचान करता है। इससे भाजपा की चुनावी राजनीति को फ़ायदा हुआ है और निम्न वर्ग के समूह लोकतांत्रिक विमर्श में अपनी सांस्कृतिक विरासत की प्रासंगिकता से संतुष्ट दिखाई देते हैं।

बिहार के प्रत्येक गांव में पहुँची स्वयंसेवकों की टीमें — जिसमें संघ के दस से पंद्रह स्वयंसेवकों की टीम हर गांव में गई। हर ब्लॉक में साप्ताहिक मिलन कार्यक्रम का आयोजन किया। लोगों से रुबरु हुए। पहली बार मतदान करने वाले वोटरों के लिए विद्यार्थी परिषद ने जागरण का कार्य किया। उन्हें वोट का महत्व समझाते हुए मतदान करने के लिए उत्साहित किया। इसके साथ ही स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर लोगों के साथ सामाजिक जीवन और विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की। लोगों की राय ली कि उनको कैसी सरकार चाहिए, वे किसको और क्यों पसंद करते हैं — इस तरह का फीडबैक लिया। साथ ही सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से लोगों को अवगत कराया।

स्वयंसेवक घर-घर जाकर और बूथ लेवल पर मीटिंग करके लोगों को वोट करने का आग्रह करते थे। उन्होंने लोकमत जागरण, लोकमत परिष्कार जैसे कार्यक्रम चलाए। बताया जा रहा है कि एक महीने में 221 शाखाओं के स्वयंसेवकों ने घर-घर जाकर लोगों से मुलाकात की।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में भाजपा के समर्थन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जमीनी रणनीति तैयार करना शुरू कर दिया था। साथ ही आगामी होने वाले चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न भी बना लिया था। अब यह उसके लिए नाक का सवाल हो गया था, जिसके लिए 'ऑपरेशन त्रिशूल' जैसे विशेष अभियान चलाए गए।

इस अभियान के तहत, आरएसएस के स्वयंसेवकों को सक्रिय रूप से चुनावी मैदान में उतारा गया ताकि वे जमीनी स्तर पर काम कर सकें। वैसे मतदाताओं की भी सूची तैयार की गयी जो भाजपा की नीतियों और उसके कार्यप्रणाली से नाराज़ हैं। इसके अलावा संघ के स्वयंसेवक बूथ स्तर तक के वैसे मतदाताओं से संपर्क करने की तैयारी में जुट गए जो राष्ट्रवादी, हिंदूवादी विचारधाराओं से ओतप्रोत हों।

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रत्येक विधानसभा में चार सौ छोटी-बड़ी बैठकें हुईं जिसमें मतदाताओं को राष्ट्रहित में मतदान देने के लिए प्रेरित किया गया। इनके राष्ट्रहित का मतलब था हिंदुत्व की राजनीति करने वाले को मतदान देना। इसके साथ ही NOTA नहीं दबाना और सौ फीसदी मतदान का लक्ष्य रखा गया था। इसका लाभ भी भाजपा को मिला। इसके कारण लोग भावनात्मक रूप से भाजपा से जुड़ रहे हैं। विपक्ष वैचारिक मुद्दों को उठाता रहा लेकिन मतदाताओं ने अपनी बुद्धि से ज्यादा भावनाओं को महत्व दिया और विपक्ष को नकार दिया। इससे बिहार में लेफ्ट-टू-सेंटर वाली पार्टियों को चुनौती मिली और दक्षिणपंथ मजबूत हुआ। राजद, कांग्रेस जैसी पार्टियां लोगों से इमोशनल कनेक्ट नहीं हो पाईं जबकि भाजपा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दों से जनता को जोड़ पाने में सफल रही। भाजपा के अनुवांशिक संगठन मतदाताओं को बूथ तक पहुंचाने का काम करते रहे। संघ ने भाजपा के समर्थन में अप्रत्यक्ष रूप से कार्य करने के लिए ऑपरेशन त्रिशूल नाम दिया।

ऑपरेशन त्रिशूल नाम देने के पीछे संघ विचारकों का अपना अलग-अलग मत रहा। कुछ विचारकों का मानना है कि ऑपरेशन त्रिशूल के द्वारा हर घर तक पहुंचना और लोगों को संगठन की विचारधारा और भाजपा के पक्ष में मतदान करने के लिए प्रेरित करना है। दूसरा, बूथ स्तर पर मतदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित करना और खास तौर पर उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना जहां संगठन कमजोर है। तीसरा, भाजपा नेताओं और आरएसएस के स्वयंसेवकों के बीच मजबूत समन्वय बैठाना है। भाजपा के लिए बिहार में यह ऑपरेशन सफल प्रतीत होता दिखा।

आरएसएस और भाजपा के बीच समन्वय और चुनावी रणनीति के संदर्भ में अन्य प्रकार के अभियान और जमीनी कार्य जरूर हुए। हालांकि, आरएसएस अपनी विचारधारा और राष्ट्रवाद के प्रचार-प्रसार के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के लिए माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा। चुनाव के दौरान, ये स्वयंसेवक बूथ स्तर तक काम करते रहे, घरों तक पहुंचकर मतदाताओं से संपर्क साधते रहे, उन्हें राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर जागरूक करते और भाजपा की विचारधारा और सरकार के कार्यों को समझाते रहे।

आरएसएस कार्यकर्ता अक्सर उन क्षेत्रों और बूथों की पहचान करते रहे जहां भाजपा का समर्थन मजबूत या कमजोर है। वे कमजोर बूथों पर ध्यान केंद्रित करते, मतदाताओं की सूची की समीक्षा करते और यह सुनिश्चित करते कि भाजपा समर्थक मतदाता मतदान के दिन घर से निकलकर वोट करें। इसके लिए संघ के एक-एक स्वयंसेवक मतदान के दिन पूरी तरह से सक्रिय हो गए।

चुनाव से पहले, आरएसएस और भाजपा के पदाधिकारियों के बीच समन्वय बैठक हुई। इस बैठक में आरएसएस जमीनी स्तर से प्राप्त फीडबैक — जैसे स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की लोकप्रियता, जनता का मूड — भाजपा नेतृत्व के साथ साझा करता रहा, जो पार्टी को अपनी रणनीति में बदलाव करने में मदद करता रहा।

हिंदूवाद, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक गौरव जैसे वैचारिक मुद्दों पर जनमत तैयार करने में आरएसएस एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा।

चुनाव के समय भाजपा ने बिहार में पिछड़े वर्ग के चालीस उम्मीदवार मैदान में उतारे, साथ ही अनुसूचित जातियों के बारह प्रत्याशियों को टिकट दिया। परिणाम के बाद अनुसूचित जाति के सभी बारह उम्मीदवार जीत गए। एनडीए को बिहार की चालीस आरक्षित सीटों में से पैंतीस पर सफलता मिली, जिसमें भाजपा का प्रतिशत सौ रहा। यह आँकड़े दर्शाते हैं कि भाजपा का सबाल्टर्न हिंदुत्व का कार्ड बिहार में इस बार चला है। इसलिए इतनी बड़ी सफलता में बहुजन समाज और पिछड़े तबके को अपने पक्ष में जोड़ने में भाजपा सफल रही। यह संदेश भाजपा के विरोधियों के साथ-साथ एनडीए के सहयोगियों के लिए भी आगामी चुनाव में चिंता का सबब बनेगा।

यदि कहा जाए तो बिहार चुनाव में नब्बे प्रतिशत सफलता लेकर भाजपा ने लालू–तेजस्वी सहित पिछड़े वर्ग की राजनीति करने वाले नेताओं को चिंता में डाल दिया है। 1990 में बिहार में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के रथ को रोककर और गिरफ्तारी का आदेश देकर लालू प्रसाद ने पिछड़ों और कमजोर तबके के बीच सबाल्टर्न सेक्युलरिज़्म की पटकथा लिखी और इस पर पंद्रह साल तक बिहार में राज किया। इस बार सबाल्टर्न हिंदुत्व ने समीकरण में सेंध लगाकर वंचित वर्ग को अपने पक्ष में किया। नरेंद्र मोदी भी समय-समय पर अपने को एक सबाल्टर्न नेता के रूप में पेश करते रहे हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में पूरे उत्तर भारत में भाजपा के इस प्रयोग को अपनाया जाएगा और सबाल्टर्न सेक्युलरिज़्म पर सबाल्टर्न हिंदुत्व को प्रभावी बनाया जाएगा।

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