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कहते हैं, नदी को रास्ता नहीं दिखाना पड़ता, **वह** खुद-ब-खुद अपना रास्ता बना लेती है। एकलव्य की कहानी महाभारत की एक महत्वपूर्ण कहानी है। यह नैतिक कहानियों में आती है क्योंकि इसमें जीवन के आदर्श मूल्यों का वर्णन है।

महाभारत, भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक माना जाता है। इस ग्रंथ का प्रत्येक पात्र अपने आप में विशेष महत्व रखता है। मुख्य पात्रों के अतिरिक्त और भी ऐसे कई पात्र हैं, जो मानव समाज के लिए प्रेरणा के माध्यम हैं। ऐसे ही एक पात्र **थे**, जिन्होंने गुरु भक्ति का उदाहरण कायम कर दिया। एक ऐसा शिष्य हुआ, जिसने अपने हुनर और गुरुभक्ति से अपना नाम इतिहास में दर्ज करवा लिया। **वह** वीर योद्धा था एकलव्य। शायद बहुत से लोगों ने नाम तो सुना होगा, पर उनकी जीवन की कहानी से शायद परिचित न हों। आज महाभारत से जुड़े एक वीर योद्धा एकलव्य की सच्ची कहानी के बारे में जानेंगे।

बात उस समय की है, जब शिक्षा का रूप आज से बहुत अलग हुआ करता था। उस समय के विद्यालय गुरुकुल हुआ करते थे। विद्यार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए अपने गुरु के पास आश्रम में ही रहना होता था। सभी मिलजुलकर एक परिवार की तरह रहते थे और मिल बाँटकर सब काम करते थे। सभी शिष्य बड़ी निष्ठा और ईमानदारी के साथ शिक्षा प्राप्त करते थे। उस समय शिक्षा भी कुल के अनुसार ही दी जाती थी। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के **अलावा** किसी को भी शिक्षा नहीं दी जाती थी।

एक भील का बालक था, जिसका नाम था एकलव्य। बचपन से ही एकलव्य बहुत होनहार था। **वह** अपने साथ के अन्य बालकों से बहुत अलग था। एकलव्य जीवन में लक्ष्य प्राप्ति की इच्छा रखता था, जिस कारण वह अक्सर बहुत गंभीर दिखाई पड़ता था। यह देखकर भील राजा ने अपने पुत्र को बुलाया और उससे इस गंभीरता का कारण पूछा। तब एकलव्य ने अपने मन की व्यथा बताते हुए कहा, 'पिताश्री! मैं धनुर्विद्या सीखने की इच्छा रखता हूँ, जिसके लिए मैं गुरु द्रोण के आश्रम जाना चाहता हूँ।' अपने पुत्र के इन वचनों को सुनकर भील राजा चिंता में पड़ गए। वे इस बात से भली-भाँति परिचित थे कि गुरु द्रोण केवल ब्राह्मणों और राजकुमारों को ही शिक्षित करते हैं। लेकिन एकलव्य के दृढ़ निश्चय के कारण उन्होंने अपने पुत्र को गुरु द्रोण के आश्रम जाने की अनुमति दे दी।

एकलव्य बड़े उत्साह के साथ गुरुकुल पहुँचा। वहाँ पहुँचते ही उसने देखा कि कुछ बालक धनुर्विद्या की शिक्षा ले रहे थे। यह देखते ही वह समझ गया कि यही गुरु द्रोण हैं, जिनसे धनुर्विद्या सीखने के लिए वह इतनी दूर आया है। एकलव्य एक क्षण भी गँवाए बिना गुरु द्रोण के पास गया और उन्हें प्रणाम किया। गुरु द्रोण ने उससे पूछा, “तुम्हें पहले कभी गुरुकुल में नहीं देखा, तुम कौन हो पुत्र?” तब एकलव्य ने बहुत आदर भाव के साथ उत्तर दिया, “हे गुरुवर! मैं भील राजा का पुत्र एकलव्य हूँ, और यहाँ आपसे धनुर्विद्या सीखने की इच्छा लेकर आया हूँ।”

एकलव्य की बातों को सुनकर गुरु द्रोण कहते हैं, “नियमानुसार, मैं केवल राजघराने के कुमारों और क्षत्रियों को ही शिक्षा दे सकता हूँ और धर्म भी मुझे यही सिखाता है। मैं अपने धर्म के खिलाफ जाकर शिक्षा नहीं दे सकता।” गुरु द्रोण के इन वचनों को सुनकर एकलव्य को बहुत दुःख हुआ। वह यह सोचने पर विवश हो गया कि आखिर ऐसी प्रथा बनाई ही क्यों गई? पर एकलव्य तनिक भी आहत न हुआ, बल्कि उसकी सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने की इच्छा और प्रबल हो गई। वहाँ से लौटकर उसने वन में ही एक शांत स्थान को चुना और वहाँ गुरु द्रोण की प्रतिमा बनाई और उस प्रतिमा के समक्ष लगन और निष्ठा के साथ नित्य धनुर्विद्या का अभ्यास करना शुरू कर दिया। ऐसे करते हुए कुछ वर्ष बीत गए।

एक दिन आचार्य द्रोण अपने **शिष्यों** और एक कुत्ते के साथ उसी वन में पहुँच गए, जहाँ एकलव्य रहता था। उनका कुत्ता राह भटककर एकलव्य के आश्रम पहुँच गया और भौंकने लगा। एकलव्य उस समय धनुर्विद्या का अभ्यास कर रहा था। कुत्ते की भौंकने की आवाज से एकलव्य की साधना में बाधा पड़ रही थी। उसने पहले तो इस ध्वनि की ओर ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब बहुत देर के बाद भी आवाज आनी बंद नहीं हुई, तो वह क्रोधित हो उठा और इस कौशल से बाण चलाए कि कुत्ते को एक खरोंच तक नहीं आई और मुख तीरों से भर जाने के कारण भौंकना बंद हो गया। कुत्ता असहाय होकर गुरु द्रोण के पास जा पहुँचा। गुरु द्रोण और शिष्य ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या देखकर आश्चर्यचकित हो गए कि आखिर इतना महान धनुर्धर कौन है, जिसने अपनी धनुर्विद्या का इतना अद्भुत प्रदर्शन किया है? यह बात द्रोणाचार्य के लिए चिंता का विषय बन गई।

वे सभी उस धनुर्धर की खोज में निकल गए। वहाँ उनकी मुलाकात एकलव्य से हुई, लेकिन वे उसे पहचान नहीं पाए। गुरु द्रोण एकलव्य से मिलने पर पूछते हैं, “क्या ये बाण तुमने चलाए?” एकलव्य ने बड़े आदर के साथ शीश झुकाते हुए कहा, “जी।” “क्या मैं तुम्हारे गुरु से मिल सकता हूँ, जिन्होंने तुम्हें इतनी उत्तम शिक्षा दी है?” द्रोणाचार्य ने कहा। जब उन्होंने एकलव्य के सामने उसके गुरु के बारे में जानने की जिज्ञासा दिखाई, तो एकलव्य ने उन्हें **वह** प्रतिमा दिखा दी। गुरु द्रोण ने कहा, “द्रोण तो मैं ही हूँ, लेकिन यह कैसे संभव है? क्योंकि मैंने तो तुम्हें कभी शिक्षा दी ही नहीं।” तब एकलव्य ने उन्हें सभी पिछली बातों का स्मरण करवाया। उसने बताया कि कैसे उसने केवल उनकी मूर्ति को गुरु बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास किया। गुरु द्रोण को यह जानकर और भी आश्चर्य हुआ कि उन्हें ही मानस गुरु मानकर एकलव्य ने स्वयं ही अभ्यास से यह विद्या प्राप्त की है।

एकलव्य की बातें सुनकर गुरु द्रोण बहुत प्रसन्न हुए, लेकिन दूसरी ओर उन्हें यह भी चिंता थी कि वे अर्जुन को श्रेष्ठ धनुर्धारी बनाने का वचन दे चुके हैं। यदि अब एकलव्य श्रेष्ठ धनुर्धारी बन गया, तो उनका अपमान होगा। यह सोचकर उन्होंने एकलव्य से कहा, “तुमने मुझे गुरु बनाकर शिक्षा तो प्राप्त कर ली, पर क्या तुम जानते हो कि शिक्षा के बदले गुरु को गुरु दक्षिणा भी दी जाती है। क्या तुम मुझे मेरी गुरु दक्षिणा नहीं दोगे?” यह सुनकर एकलव्य का मन प्रफुल्लित हो उठा कि कम से कम द्रोणाचार्य ने उन्हें अपना शिष्य तो माना। एकलव्य ने खुश होकर द्रोणाचार्य से कहा, “हे गुरु श्रेष्ठ, आप जो कहें, मैं वह देने के लिए तैयार हूँ।” इस पर गुरु द्रोण ने कहा, “एक बार सोच लो पुत्र।” “आपके लिए मैं अपने प्राण तक त्यागने के लिए तैयार हूँ,” एकलव्य ने कहा।

तब गुरु द्रोण ने बड़े **अहंकार** से कहा, “हे धनुर्धर! मुझे गुरु दक्षिणा में तुम्हारे दाहिने हाथ का अंगूठा चाहिए।” यह सुनकर एकलव्य एक बार तो स्तब्ध हो गया। क्योंकि यह अंग उसकी साधना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। लेकिन एक भी क्षण रुके बिना और बिना किसी हिचकिचाहट के उसने मुस्कुराते हुए अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर गुरु द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा के रूप में दे दिया। यह देखकर द्रोणाचार्य स्वयं को एक दोषी की भाँति महसूस करने लगे, लेकिन वे अपने वचन के आगे विवश थे। एकलव्य की गुरु भक्ति देखकर उन्होंने आगे बढ़कर उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से एक महान धनुर्धर के रूप में तुम्हारा नाम लिखा जाएगा। जब भी गुरु दक्षिणा या गुरु के प्रति स्वामीभक्ति की बात आएगी, तो तुम्हारा नाम सबसे पहले लिया जाएगा। इस तरह आज इतने वर्षों के बाद भी एकलव्य अपने संकल्प और गुरु दक्षिणा के कारण विश्वभर में जाने जाते **हैं**।

एकलव्य की कहानी से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए और अपने हौसलों से हालातों को बदलना चाहिए। जब एक आदर्श शिष्य की बात होती है, तो सबसे पहला नाम एकलव्य का आता है। अपने गुरु के सम्मान के लिए एकलव्य ने उन्हें वह गुरु दक्षिणा दी, जो उसके जीवन की सबसे अमूल्य वस्तु थी।

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