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पृथ्वी के अस्तित्व में आने से पहले लगभग 45 लाख साल पहले, ब्राह्म ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को बहुत विशिष्ट कर्तव्यों के साथ पूरी पृथ्वी के प्रबंधन, पूर्ण लोकतंत्र व्यवस्था से संचालन एवं अपने प्रभुत्व के भीतर, दूसरे के क्षेत्रीय वर्चस्व में लिप्त हुए बिना कार्य के लिये नियुक्त किया था।

उनके प्रभुत्व कर्तव्यों की नियुक्तियों को अच्छी तरह से परिभाषित किया गया था।

  • ब्रह्मा :

ऐसी स्थिर और गतिशील सृष्टि का निर्माण करने के लिए ब्रह्मा का कर्तव्य, जो पृथ्वी की पारिस्थितिक और पर्यावरण संतुलन गतिविधियों को बनाए रखने के लिए सभी प्रकार के जीवित प्राणियों, गतिशील और स्थिर (बनस्पति) दोनों पृथ्वी के लिये आवश्यक थे। साथ ही इन जीवों को जीवित रहने के लिए सभी प्रकार के बुनियादी ढांचे का निर्माण करने का उचित प्रबंध हों, जब तक कि उनका रचनात्मक समय (जीवनकाल ) समाप्त नहीं हो जाता।

  • विष्णु :

इन सभी बुनियादी ढांचे का प्रबंधन और नियंत्रण करने के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में विष्णु का कर्तव्य: इन प्राणियों को विभिन्न स्थानों पर नियुक्त करें और उन्हें पृथ्वी की पर्यावरणीय पारिस्थितिक प्रणालियों का समर्थन करने के लिए रखें जो कि उनकी शारीरिक पहचान को उचित स्वस्थ स्थिति में बनाए रखने के लिए आवश्यक दैनिक प्रयोजन सम्पन कर सकें, तथा अन्य जीवित प्राणियों के साथ सहायक होने के लिए अपने कर्तव्यों को निष्पादित कर सकें ।

  • शिवा :

शिव का कर्तव्य है कि वह पृथ्वी को पूरी तरह से स्वच्छ स्थिति में बनाए रखें ताकि सारी सृष्टि स्वस्थ स्थान के लिए पृथ्वी की पारिस्थितिक और पर्यावरण की स्थिति बनी रहे। संक्षेप में जिस जीव का जीवनकाल अंत हों जाय, उसे इस पृत्वी से तुरंत मृत करे ताकि पारिस्थितिक और पर्यावर्णनी की स्थिति साफ रहे और नए आने वाले जीवों के उत्पाद को इस पृथ्वी पर अपना रचनात्मक समय समाप्त होने तक रहने के लिए खाली एवं स्वछ स्थान मिल सके।

त्रिगुणा ब्रह्मा, विष्णु, महेश, उनकी नियुक्तियाँ प्राप्त करने के बाद तीन मुख्य प्रभुत्व कार्यपालक, अपनी संबंधित निष्पादन रणनीतियों की योजना बनाना शुरू कर दिया। ऐसा करते हुए लाखों साल बीत गए।

ब्राह्म भी लाखों आकाशगंगाओं का दौरा करने में व्यस्त थे ताकि इन लाखों आकाशगंगाओं की विभिन्न संस्थाओं की मूलभूत संरचना का निष्कर्ष निकाला जा सके, जैसे कि प्रत्येक आकाशगंगा में कितने ग्रह, सूर्य, चंद्रमा और तारे आदि की व्यवस्था की जाय। इन आकाशगंगाओं में ब्रह्म की यात्रा को भी लाखों वर्ष बीत गए। और फिर वह वापस देवनिवास पहुंच गये। ब्रह्मः सभी आकाशगंगाओं के ब्रह्मांड का दौरा करते हुए थक गये थे, इसलिए उन्हे आराम की अति आवश्यकता थी। उनके विश्राम में भी लाखों वर्ष बीत गये।

ब्रह्मः आराम करने करने के बाद उन्होंने तीनों विशिष्ट प्रभुत्व अधिकारीयों अर्थात "त्रिगुणॉ" को मिलने और चर्चा करने के लिए बैठक सूचित किया। तीनो त्रिगुणा ब्रह्मा, विष्णु, महेश बैठक सुचना प्राप्त करते ही, एक आपसी बैठक में चर्चा में उलझ गये, कारण ब्रह्मः जी के बैठक के चर्चा का विषय स्पष्ट उल्लेख नहीं किया था। त्रिगुना कि यह बैठक जल्द ही एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में बदल गईं... लेकिन शिव ने उन्हें शांत करा दिया, तुम दोनों क्या बात कर रहे हो!

मेरा काम है सफाई करना और मृत्यु प्रदान करना, न तो पृथ्वी हैं औऱ न कोई जीव है, तुम दोनों मूर्ख हो। सृष्टि करना ब्रह्मा का काम था और इस बूढ़े आलसी कर्महीन देव ने कुछ नहीं किया। वाह वाह विष्णु चिल्लाया।

विष्णु ने कहा, "ठीक है और मेरे पास भी देखभाल या रखरखाव के लिए कुछ भी नहीं है न ही निष्पादित करने के लिए कुछ भी नहीं है।

ब्रह्मा पूरी तरह से घिर गए थे। वह अपनी वृद्धावस्था की नींद से जाग गये, अपनेशांत भाव से अमृत सोमरस की चुस्की लेते हुये, धीरे-धीरे सिर हिलाते हुए कहा, "शिव तुम ने तो अति निपूर्णता से यथार्त व्यक्त कर दिया, आपने हमे ब्रह्म की खींचाई से बचाया औऱ हमें वास्तविकता में लें आये ।हमारा एक दूसरे पर आरोप लगाना एक बेवकूफी भरी कार्रवाई थी।

 ब्रह्मा
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खैर, मैं सबसे बड़ा होने के नाते शिव, तुम को "देवादी देव महादेव" की उपाधि प्रदान करता हूं, मेरा आपको शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद.

मैं भी कोई भी सृष्टि नहीं कर पाया क्योंकि हमारी सार्वभौमिक आधारभूत संरचना पृथ्वी को बनाने का भार ब्रह्मः का हैं. अतः हमें बैठक सुचना से विचलित होने की कोई आवश्यकता नहीं हैं.

विष्णु ने भी यही पंक्ति अपनाई और शिव को प्रणाम किया। शिव उठ खड़े हुए, और उन्हें इतनी महान उपाधि के लिए धन्यवाद दिया। शिव ने अपनी अफीम की चिलम को गहरी साँस के साथ खींचा और तैयार होने के लिए अपने निवास पर वापस चले गए।

जैसे ही शिव ने सभास्थल छोड़ा, विष्णु ने ब्रह्मा से कहा, "श्रीमान ब्रह्मा जी, आपने इस अर्धनग्न, नशेड़ी को इतना महान उपाधि क्यों दें दिया?"

ब्रह्मा ने एक कुटिल मुस्कान दी, धीरे से अपना सिर हिलाते हुए, विष्णु से कहा, "विशु तुम बहुत छोटे हो, पहले तो उसने वास्तव में हमें यथार्त दिष्ट करा दिया, औऱ यदि ब्राह्म हमें दोष देना शुरू करते हैं, तो हम उनकी टिप्पणी का प्रतिकार कर सकते हैं। तथा अगर कुछ गलत हो भी जाय तो हम शिव को दोष देंगे'।

विष्णु ने तुरंत ब्रह्मा को शष्टांग प्रणाम किया। फिर कहा, "श्रीमान ब्रह्मा जी आपका चिँतन बहू दूर दर्शित हैं ।अच्छा तो ब्रह्म जी के बैठक में मिलते हैं।"

समय अनुसार ब्रह्म देव कि वैठक शुरू हुई...

बैठक विषय : त्रिगुणा के अपनी सहायक संस्थाओं और निर्माण, रखरखाव और विलुप्त होने की प्रक्रिया के साथ पृथ्वी का निर्माण करना।

बैठक कई वर्षों तक चली और सभी विषय पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। अंत में संकल्प सर्वसम्मति से पारित किया गया।

  • संकल्प:

1. जीवों के जीवन सृष्टि, और उन जीवो का सर्व समीकरणो के लिए, 33 देव संस्थाओं का निर्माण किया जाएगा और इन सभी देवों में व्यक्तिगत अवशिष्ट शक्ति होगी।

ये 33 देव संस्थाएं निम्नलिखित शीर्षों के अनुसार होंगी:

क. उत्पादन - 2

1. प्रजापति

2. तड़ित

ख. वासु - 8

1. सूर्य

2. चंद्रमा

3. नक्षत्र मंडल

4. आकाश

5. वायु

6. अग्नि

7. जल

8. पृथ्वी

ग. रुद्र - 11

1. 5 कर्म इंद्रिय

2. 5 ज्ञान इंद्रिय

घ. बुद्धि - 1

ड़. आदित्य- 12

2. पृथ्वी पर जीवन सृष्टि का विकास व्यवस्थित रूप से किया जाएगा ताकि समय काल के अंतरंग में जीवों का प्रत्येक चरण पृथ्वी के वायुमंडलीय, पारिस्थितिक और पर्यावरण की स्थिति में हो रहे गतिशील परिवर्तनों में जीवन सक्षम हों सके l

सृष्टि विकास के चरण:

1. मस्त्य : पानी में

2. कछुआ: पानी और जमीन में

3. वराह : भूमि में स्तनपायी

4. आंशिक द्विपाद : अर्धमनुष्य अर्धपशु

5. बौना : शारीरिक रूप से कम विकसित, मानसिक रूप से बुद्धिमान

6. बनमनुष्य : कुल्हाड़ी अस्त्र धारी के साथ जंगल में रहना

7. पूर्ण मनुष्य : विकसित मनुष्य

3. लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था ।

यह विधिवत संकल्प लिया गया कि, इस संसदीय प्रणाली में शीर्ष 3 कार्यकारिणी होंगी अर्थात

1. अध्यक्ष: ब्रह्मा

2. व्यवस्थापक: विष्णु

3. कानून और व्यवस्था: शिव और मंत्रिपरिषद जो विभिन्न विभागों के प्रभारी होंगे।

हालांकि इन मंत्रिपरिषदों की नियुक्ति तत्काल की जाएगी, लेकिन इनका काम तभी शुरू होगा जब मानव प्रजाति समझदार होगी और सामाजिक मिश्रण की स्थिति में रहने लगेगी।इस प्रकार गणेश, लक्ष्मी, स्वरस्वती, कुबेर, देवी, यामा, नारद और अन्य को मंत्रिपरिषद में विधिवत रूप से मंत्रियों के रूप में शपथ दिलाई गई। इन मंत्रिपरिषद ने वर्तमान वर्ष से लगभग 15 हजार वर्ष पूर्व अपना पदभार ग्रहण कर लिया था. मस्त्य से विकसित मानव तक इन सभी सृष्टि विकासों में पृथ्वी के अस्तित्व से लेकर वर्तमान तक लगभग 45 lakh वर्ष लग गये । पृथ्वी बहुत सुचारू रूप से चल रही थीं, इसलिए सभी विशिष्ट अधिकारी और मंत्रिपरिषद आनंदमयी समय बिता रहे थे.

लाखों साल बीत गये, मानव की बुद्धि में वंश दर वंश विकास होता रहा. इस विकसित बुद्धि ने मानव को न केवल अपनी प्रजातियों पर शासन करने के लिए लालची बना दिया, बल्कि उन पर भी नियंत्रण शुरू कर दिया तथा मानव अपनी जरूरतों के लिए अन्य जीवो का इस्तेमाल करने के लिए उन्हें पालतू बना लिया।

जल्द ही इस मानव ने पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरण की स्थिति नष्ट करने लगी, विकास परियोजनाओं हेतु. वायु, जल, बन- वनस्पति जैसी सार्वभौमिक संस्थाओं के साथ हस्तक्षेप किया, जिसके परिणामस्वरूप विशिष्ट अधिकारीयों के संचालन के कर्तव्यों को पूर्ण भ्रम, असहमति, अव्यवस्था और कहर में डाल दिया। पृथ्वी असंतुलित परिस्थिति में डूबती चली गई. सूचना एवं प्रसारण मंत्री नारद ने विशिष्ट अधिकारियो एवं मंत्रीयों के प्रभुत्व मानक की अनियंत्रण की सुचना ब्रह्मः जी को संर्पित कर दिया. समाचार प्राप्त होते ही, ब्राह्मजी ने सर्वोच्च आपातकालीन बैठक बुलाई और "त्रिगुण" विशिष्ट अधिकारीयों एवं सम्पूर्ण मन्त्री परिषद को उनके कर्तव्य के पालन की अक्षमता के लिए बहुत निरलज्जित किया। विष्णु को सबसे अधिक धिक्कारा की वह आवश्यक प्रबंधन, नियंत्रण और निष्पादन उनके प्रभुत्व के अधीन था।

विष्णु पतन के कगार पर थे, खुद को इस स्थिति से बाहर निकालने के लिए, उन्होंने आरोप लगाया कि ब्रह्मा इस मुद्दे का मुकाबला करने के लिए सही प्रकार के जीवों का उत्पादन करने में विफल रहे हैं और इस अर्ध-नग्न नशेड़ी शिव ने आबादी को मृत्यु नहीं दी जिस हेतु जनसंख्या बिना किसी प्रतिबंध से कई गुणा बढ़ती गई, अतः शिवा के इस नशेड़ी पन ने मृत्यु काल की अवहेना कर नशे में डूबे रहें.

यह सुनकर ब्राह्मजी ने शिव को आड़े हाथ लिया। शिवा अति रुष्ट हो गए एवं रुष्टा के मारे उनका शरीर लालामित हों गया और कहा, यह मानव प्राणी, जिसे ब्रह्मा एवं विष्णु ने अपने स्वार्थ स्वरूप वर्तमान मानव को एक गतिशील स्वं विकसित बुद्धि प्रदान कर दिया जो हर अगली पीढ़ी के साथ विकसित होता चला गया। यह एक अति कुटिल समझ से किया गया था, ताकि आपके ये दो विशिष्ट अधिकारी अर्थात ब्रह्मा एवं विष्णु आराम कर सकें और स्वं निर्देशित कार्य ये मानव जैसा वे चाहें वैसा करे ताकि ये दोनों विश्राम एवं आनंद करते रहें ।

परिणाम: विनाशकारी हों गया, मानव का अपने शरीर पर पूर्ण नियंत्रण है और उनका आपके या ब्रह्माजी के मृत्यु समय से कोई लेना देना नहीं है क्योंकि मानव इसे जब तक चाहें बढ़ा सकते हैं। वे आवश्यकता के अनुसार शरीर के किसी भी अंग को बदल सकते हैं। अतः जब मृत्यु समय कोई समय ही अंकित न हों मैं, किस नियम हेतु जीवो को मृत्यु दें दूँ? है कोई उत्तर इन के पास ?

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विष्णु, ब्रह्मा और ब्राह्मजी, शिव के सर्वोच्च विस्फोट में हस्तक्षेप करना चाहते थे। लेकिन शिव ने कहा कि उनका व्यक्तव अभी समाप्त नहीं हुआ है। और अपने चिलम पर कई गहरी दम कश दी।

फिर कहा कि ये सूचना एवं प्रसारण मंत्री नारद जोकि ब्रह्मा जी के पुत्रश्री हैं, ने उस विनाशकारी जानकारी की सुचना, ब्रह्माजी आप को नहीं दी होंगी जो कई हमारी स्थिति के सृष्टि, व्यवस्था और मृत्यु के रूप को क्षीण कर रही है क्योंकि मनुष्य ने हमारे देवता होने के अस्तिव्त को दुत्कार कर दिया है ...तथा क्या आपने सुना ब्राह्म जी मानव ने जीवन नियंत्रण, प्रबंधन और मृत्यु के लिए हमारे हस्तक्षेप को अस्वीकार कर दिया। तथा हमें गृहबंदी के तहत बंद कर दिया। मनुष्य अब हमारी पूजा नहीं करते क्योंकि मनुष्य अब हम से नहीं डरते हैं और न ही आप को ब्रह्माण्ड के सर्वोच्च मानते हैं ।

बैठक स्थल में सन्नाटा छा गया। शिव ने चुपचाप खुद को थपथपाया और वह ब्राह्मजी को सबसे विनाशकारी समाचार देना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने चिलम पर कुछ और गहरी दम ली और आगे बोले, "ब्राह्मजी" हम विशिष्ट अधिकारी आपकी गतिविधियों से पूरी तरह अनजान हैं और इसलिए नहीं जानते हैं, आप अति भयंकर समाचार जानते हैं या नहीं; इस मानव ने तो आपके भी क्षेत्रों में हस्तक्षेप कर दिया. मानव ने चंद्रमा, मंगल, बुध, शुक्र, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेपच्यून पर छापा मारा है। और चंद्रमा एवं मंगल पर अपना झंडा फहरा चुके हैं।

तब शिवजी ने पटल कर थिरकते हुए कहा, यह सबसे बुद्धिमान और बौद्धिक विषय पर मानव ने एक पुस्तक लिखी है तथा ये पुस्तक अति उच्च ज्ञान से परिपूत हैं। इस महा पुस्तक का नाम वेद हैं. इस पुस्तक को, जिसे महर्षि परासर के पुत्र कृष्णा द्वीपन्ना जी ने चार भाग में विभाजित किया, औऱ उन्हें वेद व्यास के उपाधि से शुशोभित किया गया.

इस पुस्तक में मानव ने स्वयं को ईश्वर घोषित किया है.

वे ईश्वर हैं... एवं शक्ति प्रचार और वेद में उनकी घोषणाएँ हैं ....

जोकि महावाक्य के उपाधि से शुशोभित हैं.

1. प्रज्ञानं ब्रह्म। "चेतना ब्रह्म है"।

2. अहम् ब्रह्मास्मि। "मैं ब्रह्म हूँ"।

3. तत् त्वम् असि। "आत्मा ही बह्म हैं।"

4. अयात्मा ब्रह्म।"यह स्वयं ब्रह्मा है।"

तो पृथ्वी और पृथ्वी का ब्रह्मांड मानव द्वारा शासित है।

शिव आगे बोले मैं भाग्यशाली हूं क्योंकि उनके एक दार्शनिक ने घोषणा की है कि मैं भगवान नहीं हूं! लेकिन आदि योगी। इसलिए मैं आज भी अपनी पत्नी देवी शक्ति के साथ-साथ पूरी दुनिया में पूजित हूं।

श्रीमान ब्रह्मजी, इन मानव के 9 महान दार्शनिक थे और प्रत्येक के तथाकथित आध्यात्मिक दर्शन को समान रूप से निर्वासन के लिए परिभाषित किया गया है। 9आदर्श में से 8 आदर्श ने कोई देवता या सर्वोच्च ब्राह्मजी के अस्तित्व को खारिज कर दिया है। आप श्री ब्राह्म सर्वोच्च और आपके देव व देवी का पृथ्वी में कोई स्थान नहीं है।

तत् त्वम् असि। "आत्मा ही बह्म हैं।"

"पदार्थ के आवरण में शक्ति जीविन श्रखला है। वह जो आवर्ण है वह तू हैं.
तो जब पदार्थ को अवर्ण कर दें तो जीव शाश्वत और अनंत "परम ब्रह्म" हैं.

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