“मैं करना चाहती हूँ देश का उत्थान,
अपने देश भारत को बनाना चाहती हूँ महान,
अपने देश को पुन: दिलाना चाहती हूँ 'विश्वगुरु' का सम्मान,
इसी में मेरे देश का गौरव, इसी में मेरे देश की शान।“
मेरा एक स्वर्णिम सपना है, जो अपना है और सबका है,
एक ऐसा प्यारा जहां हो हमारा,
जहां चहुँ ओर पुष्प-सुगन्धि और हरियाली हो,
हर्ष, उल्लास और खुशहाली हो,
एक ऐसा सुन्दर स्थान हो, जहां सर्वधर्मसमभाव हो,
जहां गंगा-जमुनी तहज़ीब हो,
जहां रोटी, कपड़ा और मकान-सर्वजन को नसीब हो,
मेरा एक स्वर्णिम सपना है, जो अपना है और सबका है,
एक ऎसी प्यारी जगह हो,
जहां चप्पे-चप्पे पर हिंसा, मारधाड़, बलात्कार नहीं,
बल्कि प्रेम, प्यार और सद्भाव पगा हो,
जहां बच्चा-बच्चा साक्षर हो,
सम्पूर्ण विश्व आत्मनिर्भर हो,
जहां नारी-जाति महान, सशक्त और बलवान हो,
वह पूरे देश की आन-बान और शान हो,
जहां पग-पग रमणीक नज़ारें हों,
प्रगति के पथ पर सारे हों,
जहां महामारी का नाम ना हो,
जहां सुख से रहते सारे हों,
जहां किताबें करती हों ज्ञान प्रशस्त,
जहां हों क्रोध, लोभ और मोह ध्वस्त,
जहां भ्रूण ह्त्या ना होती हो,
जहां जनता ना भूखी सोती हो,
जहां जाति-पाति का भेद ना हो,
जहां सभी स्नेह से रहते हों,
सुख-दुःख सब मिलकर सहते हों,
‘वसुधैव कुटुंबकम’ की जय का उद्घोष जहां पर होता हो,
‘सर्वेसन्तु निरामया:’ का बोध जहां पर होता हो,
मेरा एक स्वर्णिम सपना है, जो अपना है और सबका है,
जहां ना दुःख, ना रोग, ना ही कोई बीमारी हो,
जहां ना तूफ़ान, ना चक्रवात और ना कोई दुश्वारी हो,
सभी मगन और मस्त रहें,
कैसी भी दुविधा आन पड़े,
हर हाल में हँसते, मुस्कुराते और स्वस्थ रहें
मैं जानती हूँ, मैं मानती हूँ कि छोटे मुँह बड़ी बात है,
पर कोई माने या ना माने,
पर मेरा यह दृढ़ विश्वास है,
सपने पूरे करने हों, तो सपने देखना ही सार्थक प्रयास है,
सपने देखना ही सार्थक प्रयास है ।