दहेज प्रथा हमारे समाज की उन कुरीतियों में से एक है, जो वर्षों से चली आ रही है और आज भी कई परिवारों के लिए पीड़ा का कारण बनी हुई है। विवाह जैसे पवित्र बंधन को जब लेन-देन और पैसों से जोड़ दिया जाता है, तब वह एक पवित्र संबंध नहीं बल्कि सौदा बनकर रह जाता है। दहेज केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक गिरावट का प्रतीक है।
दहेज के नाम पर लड़की के परिवार से धन, गाड़ी, घर, आभूषण और अन्य महंगे उपहारों की मांग की जाती है। कई बार यह मांग सीधे तौर पर नहीं, बल्कि सामाजिक दबाव के माध्यम से की जाती है। जो परिवार इन मांगों को पूरा नहीं कर पाते, उन्हें अपमान और तानों का सामना करना पड़ता है। शादी के बाद भी बहुओं को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना सहनी पड़ती है।
दहेज प्रथा के कारण घरेलू हिंसा, उत्पीड़न और दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध सामने आते हैं। कई परिवार बेटी की शादी के लिए कर्ज़ में डूब जाते हैं। इससे समाज में लड़कियों को “बोझ” समझने की मानसिकता बढ़ती है, जो लैंगिक असमानता को और गहरा करती है।
प्राचीन समय में कन्या को विवाह के समय माता-पिता द्वारा स्वेच्छा से उपहार दिए जाते थे, जिन्हें “स्त्रीधन” कहा जाता था। इसका उद्देश्य बेटी को आर्थिक सुरक्षा देना था। परंतु धीरे-धीरे यह स्वैच्छिक परंपरा बाध्यता में बदल गई और लड़के पक्ष द्वारा मांग की जाने लगी। यहीं से दहेज प्रथा ने एक विकृत रूप ले लिया।
दहेज के कारण कई परिवार आर्थिक रूप से टूट जाते हैं। कई महिलाओं को विवाह के बाद लगातार ताने और हिंसा सहनी पड़ती है, जो उनके आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करता है।
भारत में दहेज को रोकने के लिए Dowry Prohibition Act, 1961 लागू किया गया है, जिसके अनुसार दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय दंड संहिता की धारा 498A और 304B के तहत दहेज से जुड़े अपराधों पर सख्त सजा का प्रावधान है।
लेकिन केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है; उसका सही पालन और सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है।
दहेज प्रथा केवल एक सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध अपराध है। इसे समाप्त करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सोच बदलनी होगी। विवाह को लेन-देन नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और समानता का संबंध बनाना होगा।
आइए मिलकर संकल्प लें —
“सम्मान चाहिए, सामान नहीं।”
“जो दहेज मांगे, रिश्ता वहीं तोड़ो।”
“दहेज लेना अपराध है, संस्कार नहीं।”
दहेज लेना अपराध है, संस्कार नहीं। हमें मिलकर यह संकल्प लेना चाहिए कि हम दहेज न देंगे और न ही लेंगे। जब समाज जागरूक होगा, तभी दहेज मुक्त भारत का निर्माण संभव होगा।
दहेज मुक्त समाज ही सच्चे अर्थों में प्रगतिशील समाज होगा...
“सम्मान चाहिए, सामान नहीं”
ना सोने की मांग, ना गाड़ी की दरकार,
रिश्ते होते हैं दिल से, नहीं बाज़ार।
बेटी कोई बोझ नहीं, घर की शान है,
उसके सपनों में भी उजला आसमान है।
क्यों तोलते हो रिश्तों को दौलत के पलड़े में,
प्यार कहाँ टिकता है लालच के झगड़े में?
जिस घर में दहेज की शर्त लगाई जाती है,
वहीं खुशियों की नींव हिलाई जाती है।
दुल्हन जब आँसू छुपाकर मुस्कुराती है,
समाज की सोच पर सवाल उठाती है।
ना सौदा है शादी, ना व्यापार है,
दो दिलों का मिलना ही असली संस्कार है।
आओ मिलकर ये प्रण दोहराएँ,
दहेज को जड़ से दूर भगाएँ।
कह दो दुनिया से आज यही —
सम्मान चाहिए, सामान नहीं।