दुनिया में कुछ ऐसे विभूति हुए हैं जो सिद्धांत का निरवहन मरते दम तक करते हैं। सत्य और धर्म का पालन करने वाले ऐसे ही विश्व प्रसिद्ध राजा हरिश्चन्द्र थे। वे सूर्य वंश के प्रतापी राजा थे और अयोध्या पर राज करते थे। उनकी प्रमुख विशेषता थी कि वे दान का महत्व सबसे ज्यादा देते थे। उनका कहना था कि प्रजापालन में किसी को कष्ट न हो, इसलिए हम अपने राज्य और बाहर के लोगों को भी दान पाने का अधिकार देते हैं। ज्यादातर ऋषि, मुनि, ब्रह्मण दान लेने आते थे।
इस प्रकार उनकी चर्चा दूर-दूर तक फैल गई। अब लोग महादानी के रूप में उनकी चर्चा करते थे। यह बात दूर-दूर तक फैल गई और कुछ लोग इनसे ईर्ष्या करने लगे, जिनमें ऋषि विश्वामित्र भी थे। वे क्षत्रिय कुल के इस राजा की प्रशंसा सुनना नहीं चाहते थे और वे लोगों में उनकी प्रशंसा को समाप्त करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने एक योजना बनाई जिसके मुताबिक वे अपने मंत्र ज्ञान से एक धोखा किया जिससे हरिश्चन्द्र को एक रात स्वप्न आया और उसमें उन्होंने देखा कि कुछ ब्रह्मण गण आए हुए हैं, जिनमें विश्वामित्र भी हैं। वे राजा से उनके समस्त राज्य का दान मांगते हैं और वे स्वीकार कर लेते हैं कि अपने राज्य की समस्त सम्पदा विश्वामित्र को दान कर देते हैं।
प्रात: जब राजा दरबार में आते हैं, तो कुछ ब्रह्मणों समेत ऋषि विश्वामित्र को देखते हैं। तब उन्हें स्वप्न की बात अचानक याद आती है। इतना वे सोच ही रहे थे कि विश्वामित्र उनसे बोले, "क्या सोच में पड़ गया तू? क्या तुम्हें स्वप्न की बात याद नहीं है? क्या तुम अपना वचन निभाना चाहते हो?" तब हरिश्चन्द्र बोले, "हाँ, मैं वचन निभाना चाहता हूँ। और आपको समस्त राज्य की संपदा दान में देता हूँ। आगे आदेश दीजिए।" तब विश्वामित्र बोले, "मैंने इसे स्वीकार किया। लेकिन इसके अलावा हमें और इन सब ब्रह्मणों को दक्षिणा चाहिए, जिसके लिए तुम्हें कुछ स्वर्ण मुद्रा अलग से देना होगा।"
तुरंत हरिश्चन्द्र ने अपने मंत्री को आदेश दिया, लेकिन विश्वामित्र ने रोका, "तुम हमारे सम्पत्ति से देने वाले कौन हो? तुम्हें याद नहीं, तुम मुझे पहले ही पूरी सम्पत्ति दान कर चुके हो। अब तुम्हें दक्षिणा अलग से व्यवस्था करके देना होगा।" तब हरिश्चन्द्र बोले, "इसके लिए मुझे कुछ समय दीजिए, कहीं कोई काम करके आपको दूंगा।" तब वे विश्वामित्र से एक महीने का समय लिए और उनके वचन के मुताबिक राज्य त्याग कर निकल गए।
काफी प्रयास करने के बावजूद उन्हें कोई काम नहीं मिला। वे काफी चिंता में आ गए और सोचने लगे कि आखिर कब क्या करें? चूंकि विश्वामित्र को दिए वचन के मुताबिक मात्र एक दिन का समय शेष है। तभी उनकी नजर एक पंडित पर पड़ी। उन्होंने अपनी समस्या बताई और कहा, "इसके बदले आप हमें खरीद लो।" लेकिन पंडित बोले, "नहीं, हम तुम्हें नहीं, तुम्हारी पत्नी को खरीद सकते हैं क्योंकि मेरी पत्नी मर गई है। और कम काज के लिए हमें इसकी जरूरत है।" तब हरिश्चन्द्र कुछ स्वर्ण मुद्राएं लेकर उन्हें बेच दिए। पंडित उन्हें लेकर चल दिए, तब उनका बच्चा उन्हें जाते देख रोने लगा। तब हरिश्चन्द्र ने उन्हें भी अपने साथ कर लिया। इस प्रकार पत्नी के बिकने के बाद भी उनका मुद्रा इकट्ठा नहीं हो सका। तब वे स्वयं बिकने को तैयार हो गए। कुछ देर बाद उन्होंने एक डोम के झुंड को जाते देखा। उन्होंने उन्हें अपनी समस्या बताई, तब वे लोग उन्हें खरीदने के लिए तैयार हो गए। इस प्रकार हरिश्चन्द्र बिक कर बाकी मुद्रा इकट्ठा किया और वचन के मुताबिक विश्वामित्र को दे दिया।
डोम लोग हरिश्चन्द्र को अपने साथ लेकर आए और उन्हें शमशान में नौकरी दी, जिसमें उन्हें रात में शमशान में सोना और शव जलाने वाले से कर वसूलना शामिल था। इस तरह हरिश्चन्द्र एक भयावह जीवन जी रहे थे। उनका आहार भी दान किए जाने वाले चावल और सब्जी से था। इस तरह वे बड़े संघर्षपूर्ण जीवन जी रहे थे।
इधर उनकी पत्नी, जो पंडित के साथ आई थी, वह भी घर के कामकाज करती थी। उन्हें भी काफी काम करना पड़ता था। पंडित ठीक से खाने और कभी कहीं जाने या बैठने नहीं देता था। यहाँ तक कि उनके बेटे, जिसका नाम रोहित था, उससे भी काम करवाता था। बच्चा होने के कारण उन्हें छोटे घरेलू काम जैसे फूल तोड़ना, साफ-सफाई आदि करवाता था।
एक दिन की बात है, रोहित फूल तोड़ने बगीचे में गया। वहाँ एक विषैला सांप उन्हें काट लिया और वे वहीं चीख-चीख कर मर गए। जो लोग देखे, वे आकर उनकी मां को बताया, लेकिन पंडित ने उन्हें जाने से रोका और कहा, "पहले घर का काम पूरा करो, तब कहीं जाना।" वे रोती हुई काम करती रही। जब वह नहीं जा सकी, तो गांव वाले उसे उठाकर मां के पास पंडित के घर पहुंचा दिए। बेटे का दाह-संस्कार तक का खर्चा पंडित ने नहीं दिया। अंत में वे उन्हें अकेले लेकर शमशान चल पड़ी, जहाँ हरिश्चन्द्र कर संग्रहक का काम करते थे। वे उन्हें देखकर पहचान नहीं सके क्योंकि उनका चेहरा भयावह था।
तब उसने लाश जलाने का निवेदन किया। हरिश्चन्द्र बोले, "पहले कर चुकाना होगा।" तब वह फूट-फूट कर रोने लगी। उन्होंने अपना नाम तारा बताया और लाश का नाम रोहित। फिर उसने अपनी दुखभरी कहानी सुनाई और बोली, "इसी वजह से हम कर नहीं दे सकते। लेकिन दाह संस्कार तो हमें करना है।" लेकिन हरिश्चन्द्र मानने को तैयार नहीं हुए क्योंकि वे अपने धर्म पालन में तत्पर थे। अंत में उसने कपड़े देने के लिए अपनी साड़ी फाड़ने लगी। उसी समय भगवान प्रकट हुए और उनके सारे भ्रम को दूर किए। उन्हें बताया, "यह सब आपके परीक्षा के लिए किया गया था, जिसमें आप सफल रहे।" ऐसा कहकर पुनः उनके राज्य और ऐश्वर्य उन्हें वापस कर दिए।
इस प्रकार हरिश्चन्द्र दान और धर्म के आदर्श के रूप में ख्याति प्राप्त किया। संसार में दान और धर्म की चर्चा जब होती है, हरिश्चन्द्र का नाम लोग उदाहरण के तौर पर बताते हैं। कहा भी गया है,
"चांद टरे, सूर्य टरे, टरे जगत आधार, अटल सत्य हरिश्चन्द्र के टरे नहीं सत्य विचार।"