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जानती हूँ कि ऊँची है दुनिया तेरी इमारत

पर क्यों करूँ मैं तेरी ऊँचाई से शिकायत

नहीं गलती मेरी भी कि ले न पाई उड़ान
कैसे पंखों को अपने दी फिर अरमान

आईना दर्शाता है तस्वीर मेरी
लेकिन मुझे है अपनी नई जगह बनानी
तो किस बात की थी देरी

ज़िंदगी की कशमकश ये कि स्त्री की ताकत
क्या है तेरी हक़ीक़त

मासूम चेहरे के पीछे जो राज़ छुपे होते
क्या दुनिया की नज़रों से बचे होते

बेहतरीन तकनीकों से सब कुछ हुआ है मुमकिन
पर नहीं मैं किसी चीज़ के आधीन

ए हमसफ़र की तरह चलने वाली कलम
चल कुछ पल बाँटें और कुछ ग़म

चलो दोस्तों आज साथ मेरे
नहीं कोई नई परिभाषा, हूँ जैसे आपके चेहरे

कुछ नया करने के बोझ से नहीं हूँ
पीड़ित
यही है मेरी परिभाषा अपरिचित।।

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