Source: Giovanni on Pexels.com कौन मानव है जो अभिमान से अछूता है!
लगती है जब आंच, भगोने से दूध उफनता है!!
मिथ्या कीड़ा है ये एक भ्रम का, जिसको पाल रखा है!
ना हमदम ना हमराही, ना वो मानव का सच्चा सखा है!
दाग़-ए-खुद्दार लगाया गया है, जब भी इसको परखा है!
अभिमान आरूढ़ मानव मन ने, विषाक्त स्वाद चखा है!!
यह एक विचित्र सा ख़ुमार है, जो नशे में शुमार है!
चढ़ गया जिसको मिज़ाजे, समझ लो चकनाचूर है!
उठ कर ऊँची गगन में चढ़ी, देखो गर्द-ए-ग़ुबार है!
लटकते झूमते गिरे कहीं पर, रंग-रंगीला दीदार है!!
व्योम अधर लटक रहा जीव, ये कैसा बलबूता है!
भेद न पाया अपने आप को, ये कैसी निपुणता है!
भँवर भ्रमित भीषण भयंकर, ये जग-जाल ऐ लूता है!
"उपासक" मन अभिमान, गंधार शकुनि धूर्तता है!!
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