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बधाई हो… आपको बेटी हुई है।
हॉस्पिटल के उस कमरे के बाहर,
जब इंतज़ार करते हुए एक पति को पिता बनने की खबर मिली,
तो उसे लगा जैसे सारा संसार थम सा गया हो।
नर्स ने जब वो नन्ही सी जान उसकी गोद में रखी,
तो उसे एहसास हुआ—
जैसे जीवन की सारी खुशियाँ उसकी बाहों में सिमट आई हों।
आँखों में खुशी के आँसू थे,
और होंठों पर एक ऐसी मुस्कान…
जो शब्दों से परे थी।
“मेरी परछाई है यह… या खुदा का कोई नूर है,”
उसके माथे को चूमते ही, सारा तनाव कोसों दूर हो गया।
अब न रातें लंबी लगेंगी, न मंज़िल कहीं दूर होगी,
बेटी की एक मुस्कान ही अब जीने का दस्तूर होगी।
हाथ पकड़कर चलना सिखाया उसने,
गिरकर फिर से उठना सिखाया उसने,
उसकी किलकारियाँ ही अब उसकी खुशियाँ थीं,
“पापा-पापा” कहती वो बेटी ही उसकी दुनिया थी।
वह खुद धूप में जलता रहा, ताकि उसकी छाँव ठंडी रहे,
अपने ख्वाबों को समेट लिया, ताकि उनकी उड़ान ऊँची रहे।
कंधों पर बिठाकर जिसे सारा जहाँ दिखाया उसने,
अपनी आँखों के हर आँसू को मुस्कुराहट में छुपाया उसने।
वो सिर्फ पिता नहीं, उसका पहला और सबसे मजबूत सहारा था,
बेटी की जीत में ही दिखता, उसके जीवन का हर किनारा था।
पर वक्त…
धीरे-धीरे अपनी चाल चलता रहा।
वो नन्ही सी उंगली थामने वाली बच्ची,
अब किसी और का हाथ थामने लगी थी।
आज फिर वही पिता खड़ा था—
एक दरवाज़े के बाहर…
पर इस बार हॉस्पिटल नहीं,
वह विदाई का आँगन था।
आँखों में फिर वही आँसू थे,
पर इस बार वजह अलग थी…
लोग फिर से कह रहे थे—
“बधाई …”
पर इस बार… वो मुस्कुराया नहीं।
बस चुपचाप अपनी बेटी का माथा चूमकर
धीरे से इतना ही कहा—
“जा…आज सच में तू बड़ी हो गई…”
वो शख्स जो कभी रोना नहीं जानता था,
आज समंदर आँखों में लिए खड़ा है,
उसने अपनी बेटी को विदा नहीं किया,
उसने , एक हाथ से दूजे के हाथ में
अपना सारा संसार सौंप दिया।
अजीब कशमकश है इस रिश्ते की भी,
जो हाथ पकड़कर चलना सिखाता है,
वही एक दिन हाथ छोड़कर...
उसे उड़ना सिखाता है।
कली बनकर जो आई थी, वो अब एक घर का आंगन है,
पिता का त्याग ही तो, इस रिश्ते का सच्चा दर्पण है।