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जिम्मेदारियां अक्सर इंसान को
उम्र से बड़ा बना देती है।
कभी बचपन की नादानियां छीन लेती हैं,
तो कभी अचानक मैच्योरिटी का एहसास दिला देती है।
ये वो बेड़ियाँ हैं जो दिखाई नहीं देती,
पर जिनसे चाहकर भी रिहाई नहीं मिलती।
थक हारकर भागना भी चाहे अगर कोई,
तो फ़र्ज़ो की दीवारें कहीं राह नहीं देती।
वो स्वछंदता, वो बेफ़िक्री, वो आजाद हवाएं,
छोड़ आए हम पीछे वो हसीन वादियां ।
अब तो बस एडल्टहुड की चादर ओढे,
ढूंढ रहे हैं अपनी ही खोई हुई खुशियां।
जिम्मेदारियों के बोझ तले कहीं
हमारी असली मुस्कान छिपी है,
होठो पर हंसी तो है मगर
दिल में थकान भी बसी है।
अगर इंसान के वश में होता,
तो शायद छोड़ देता वो
इस बोझ भरी दुनिया को,
और चला जाता ऐसे जहां में-
जहां जगह केवल
हंसी, खुशी और सुकून को हो,
बस जहाँ जिम्मेदारियां नहीं
पर अपने शौक जीने की आज़ादी हो।