Image by Tumisu from Pixabay
मन में जन्मे अनेक विचार,
विचारों को मिले शब्द।
शब्दों के खेल से बनी कविता,
कविता में पिरोए अनेक भाव।
जितने लोगों ने पढ़ा उसे,
उतने ही निकले उसके सार।
और यही शब्द जब धरे
वाक्यों का रूप,
तो उन्हीं से निखरी कहानी।
कविता यदि सार बने,
तो कहानी उसका विस्तार।
कहानी पूछे कविता से—
“क्या है तेरा आधार?”
कविता कहे—
“भावनाएँ और परिकल्पनाएँ
ही मेरी पहचान हैं।
सुनने और पढ़ने वालों के
हृदय में पाती मैं स्थान।
शब्दों को लयबद्ध पिरोने की कला
ही तो कहलाती कविता।”
अब कविता पूछे कहानी से—
“क्या है तुम्हारे विस्तार का कारण?”
कहानी मुस्काकर कहे—
“कितने किस्से मैंने सुनाए,
बच्चे हों या बूढ़े,
सभी के मन भाए।
भुलाकर भेद अपने-पराए का,
निस्वार्थ भाव से
मैंने लोगों के दिल जोड़े।”
अब किस्सों की कहानी हो
या कविताओं की कथाएँ,
दोनों ही सदियों से
मन को लुभाती आई हैं।
समय, स्थान और जात-पात के भेद से परे,
दोनों ही कालजयी
और चिरंजीवी रही हैं।