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क्या कभी सोचा है—
सोचा है, जिसने यह दुनिया बनाई,
हमारे जीवन की यह कहानी रची,
उससे हमारा भी कोई संबंध है?
जो हमारे अस्तित्व का कारण है,
आज हम उसी के होने पर प्रश्न उठाते हैं।
पर क्या कभी जानने की इच्छा हुई—
कौन है वो?
कैसा होगा उसका स्वरूप?
किस अनुभूति में मिलता होगा?
मंदिरों की मूर्तियों में,
मस्जिदों की इबादत में,
हमने उसके दर्शन तो किए,
पर क्या कभी
उसे जानने का प्रयास किया?
महानता की तो वह पराकाष्ठा है…
हमने उससे अलग होकर
अपना सुख खोजने की इच्छा की,
और उसने तब भी मुस्कुराकर
"तथास्तु" कह दिया।
रच दी यह सृष्टि,
यह प्रकृति,
ये अनगिनत रिश्ते।
माया का ऐसा विस्तार किया
कि हम जीवन को जी सकें।
अपने ही रचे इस खेल में
वह स्वयं ओझल हो गया,
ताकि हम स्वतंत्र होकर
अपनी राह चुन सकें।
न जाने कितने जन्म लिए हमने,
कितने ही स्त्री-पुरुष रूप धरे।
युग बदले, कल्प बीत गए,
पर उसका प्रेम कभी नहीं बदला।
ज़रा प्रेम तो देखो उसका—
स्वयं का विस्तार कर
हर प्राणी के हृदय में स्थान बना लिया।
जैसे एक पिता
अपनी संतान को उड़ने की स्वतंत्रता देता है,
पर उसकी हर उड़ान पर
चुपचाप नज़र भी रखता है,
वैसा ही है
उस परमपिता का प्रेम।
उसने हमें स्वतंत्र इच्छा दी,
हर मोड़ पर अवसर दिए,
हर गिरावट में
संभलने का साहस दिया।
लेकिन...
बदले में हमने क्या किया?
जिसने हमें जीने की स्वतंत्रता दी,
उसी से दूरियाँ चुन लीं।
जो हर जन्म में
हमारे साथ चलता रहा,
उसका नाम हमने कितनी बार लिया है?
उसने तो कभी
अपना प्रेम कम नहीं किया।
प्रश्न केवल इतना है—
हमने उसे याद कब किया?