Image by ANDRI TEGAR MAHARDIKA from Pixabay
असंख्य विचारों से घिरा हुआ ये मन,
पलभर यहाँ, पलभर वहाँ भटकता हर क्षण।
जिसकी गति का कोई नहीं अनुमान,
अनोखे स्वप्न रचकर भी रहता अनजान।
कभी स्मृतियों को कोमलता से सँवारता,
कभी समस्याओं के जाल में उलझाता।
बिना पंखों के गगन को छू आता,
क्षण में शून्य, क्षण में ब्रह्मांड बन जाता।
ना इसे कोई आज तक बाँध पाया,
ना इसकी पहेलियों को सुलझा पाया।
जिसने इसे समझने का प्रयास किया,
वो स्वयं ही इसके जाल में उलझता गया।
मानो जीवन एक रथ समान,
जिसमें यात्री है जीवात्मा महान।
इंद्रियाँ हैं इसके चंचल घोड़े,
बुद्धि सारथी, जो दिशा को मोड़े।
डोर है मन, जिसे साधना है आवश्यक,
बुद्धी के अंकुश से बने यह समर्थ हैं।
मन सदा चाहे इंद्रियों के भोग,
यही बनता उत्थान और पतन का संयोग।
बने मन शत्रु तो जीव का हो पतन,
और यदि बने मित्र तो जीव बने महान।