Image by Boris Kjaev from Pixabay

एक शाम यूँ ही खयाल आया,
फोन की गैलरी भर चुकी है,
ज़रा उसे खाली किया जाए,
यादों के सफ़र पर निकला जाए,
उन प्यारे लम्हों को फिर से जिया जाए।

एक- एक कर तस्वीरें देखने लगी,
पर जैसे - जैसे मैं आगे बढ़ने लगी,
वो तस्वीरें मुझमें समाने लगी,
और मैं उन तस्वीरों में...

बीते दौर का जीवंत अनुभव था,
या उन यादों के पीछे का कोई आकर्षण,
हर तस्वीर अपने आप में खास थी,
दूर होकर भी कुछ अपनों के 
पास होने का एहसास थी।

वो स्कूल के दोस्तों के साथ आख़िरी तस्वीर हो,
या कॉलेज की पहली मुलाकात का वो मंजर हो,
वो बचपन की यादें, वो दोस्ती नवोदय की,
नोट्स, असाइनमेंट्स या हो कॉलेज का कोई इवेंट,
वो क्लास की मस्ती, वो कॉलेज के मेले,
प्रकृति की रंग और वो त्यौहार निराले।
हर तस्वीर के साथ जुड़ा गहरा नाता है,
ये यादों का संसार बड़ा प्यारा है।

किसी तस्वीर को देख खिल जाती मुस्कान,
हँसी आती है याद कर अपनी नादानियाँ।
पर किसी तस्वीर को देख भर जाती अखियाँ,
जब याद आती हैं वो बिछड़ी हुई सखियाँ।
वो जो बिछड़ गए वक़्त की गर्द में कहीं,
तस्वीरों में आज भी वो साथ चलते हैं।

हर तस्वीर में कैद एक प्यारी सी याद,
जिसे जीने का एहसास आज इस
तकनीकी युग ने हमें दिया है,
सच में भाग्यशाली हैं हम,
जो लम्हों को यूँ थाम पाते है,
और बीते कल को
तस्वीरों में सजा पाते हैं।

क्योंकि तस्वीरें सिर्फ देखी नहीं जाती,
उन्हें हर बार फिर से जिया जाता है

.    .    .

Discus