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२४ जुलाई, २०१७ का वो दिन,
जब हमने नवोदय विद्यालय में प्रवेश लिया था,
या यूँ कहूँ—
उस दिन हमारा नव उदय हुआ था।

छोटी-सी उम्र, सहमा हुआ मन,
और आँखों में ढेरों सपने लिए,
घर के सुकून को पीछे छोड़
हमने एक नई दुनिया को अपनाया था।

वो कोई सामान्य दिवस नहीं था,
क्योंकि उसी दिन
हमारे भाग्य का भी नवोदय हुआ था।

सात साल का सफ़र था लंबा,
पर साथी मिले इतने कमाल के,
कि उन हसीन लम्हों को
आज भी फिर से जीने का मन करता है।
कि ये दिल,
फिर से नवोदय में जाना चाहता है।

शिष्टपूर्ण दिनचर्या में बंधे,
पढ़ाई की चिंता में उलझे,
मेस के खाने से
कभी खुशी, कभी ग़म का खेल खेलते,
पेरेंट्स डे के इंतज़ार में
हर दिल धड़कता रहता था,
और हर दूसरे दिन
कोई नया ही किस्सा यहाँ मिल जाता था।

वो भूतों की कहानियाँ,
वो हमारी नादानियाँ,
वो छोटे-छोटे पलों की खुशियाँ—
जिन्हें याद कर
आज भी ये दिल खिल उठता है।
कि ये दिल,
फिर से नवोदय में जाना चाहता है।

सुनहरी यादें तो अनगिनत हैं,
पर शब्दों की मर्यादा सीमित है,
सात साल की खुशियाँ
इन पंक्तियों में कहाँ समाहित हैं?

सहे भी बहुत कुछ,
सीखा भी बहुत कुछ,
हे नवोदय!
तुझसे ही तो पाया है
हमने सब कुछ।

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