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शोर के इस शहर में, एक कोना मेरा भी है,
जहाँ यादों का पहरा, और सन्नाटा गहरा भी है।
होठों पर ताले हैं, पर रूह में शोर बहुत है,
दिखता तो कुछ नहीं, पर भीतर ज़ोर बहुत है।
कभी-कभी हम निशब्द होकर भी, सब कह जाते हैं,
जैसे सूखे पत्ते बिन आवाज़ के, शाख से ढह जाते हैं।
वो जो अनकही बातें थीं, वो अब बोझ नहीं लगतीं,
जो खामोशी में सुलगती हैं, वो अब आग नहीं लगतीं।
निशब्दता हार नहीं, यह एक गहरा संवाद है,
खुद से खुद की मुलाक़ात का, एक मीठा स्वाद है।
जब लफ़्ज़ कम पड़ जाएँ, और जज़्बात बढ़ जाएँ,
समझ लेना कि हम, ख़ुद के थोड़ा और करीब आ जाएँ।
निशब्द खड़ा हूँ मैं, वक्त की इस दहलीज़ पर,
सब कुछ लुटाकर भी, जैसे बैठा हूँ अपनी ही जागीर पर।
मौन की भी एक भाषा है, बस सुनने वाला चाहिए,
इस शोर-शराबे की दुनिया में, थोड़ा ठहराव चाहिए।
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