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सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद, कलियुग
आया है।
पाप और अधर्म से भरा, घोर कलियुग आया है।।
बाकी दिन जहॉं हर कन्या,
अपमानित की जाती है।।
धर्म के नाम पर जहॉं,
हर रोज लड़ाई की जाती है।
मासूमों के खून से जहॉं,
हर रोज धरा भीग जाती है।।
पहले अलग-अलग खोज कर, आदिमानव से मानव बना है।
धर्म कर्म के नाम पर,
सभी ने शर्म बेच खाई है।।
झूठों का बोलबाला देखकर,
अच्छाई भी घबराई है।
इंसान ने इंसानियत बेचकर,
दो वक्त की रोटी खाई है।।
नशा दौलत, शौहरत और ऐश का, हर किसी पर छाया है।
शौर-शराबा, खून-खराबे की नीति, अपनाता हर शैतान है।।
प्रकृति की सुन्दरता को बिगाड़ता,
हर दूसरा इंसान है।
तूफान और प्रलय से कांपता, हर दूसरा बेईमान है।।
ईर्ष्या, क्रोध और जलन को, त्याग देने में ही भलाई है।
हर किसी का मत कर अपमान,
फिर कोई दुखी ना होना है।।
वसुधैव कुटुंबकम की परम्परा
अपना, सदाचार को अपनाना है।
प्रकृति से कोई खिलवाड़
ना करना, धरती को स्वर्ग बनाना है।।
किसी और से उम्मीद ना रख, खुद से ही पहल करना है।