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सतयुग, त्रेता, द्वापर के बाद, कलियुग आया है।
पाप और अधर्म से भरा, घोर कलियुग आया है।।
इंसानियत का कत्ल कर दे, एक ऐसा युग आया है।
खून और हिंसा से भरा, महाभयंकर युग आया है।।

नवरात्रों में जहॉं हर कन्या, नौ रूपों में पूजी जाती है।
बाकी दिन जहॉं हर कन्या, अपमानित की जाती है।।
धर्म के नाम पर जहॉं, हर रोज लड़ाई की जाती है।
मासूमों के खून से जहॉं, हर रोज धरा भीग जाती है।।

पहले अलग-अलग खोज कर, आदिमानव से मानव बना है।
फिर मांसाहार रक्त पान कर, वहीं मानव अब दानव बना है।।
पहले बुरी प्रथाओं को त्याग, हर मानव समझदार बना है।
फिर कूटनीतियां अपनाकर, वहीं मानव अब मूर्ख बना है।।

माता-पिता को ऑंख दिखाते, बेटा और लुगाई है।
धर्म कर्म के नाम पर, सभी ने शर्म बेच खाई है।।
झूठों का बोलबाला देखकर, अच्छाई भी घबराई है।
इंसान ने इंसानियत बेचकर, दो वक्त की रोटी खाई है।।

नशा दौलत, शौहरत और ऐश का, हर किसी पर छाया है।
इन्हीं नशों ने भाई को भाई का, हर घर में दुश्मन बनाया है।।
दिखावटी तन की सुन्दरता का, हर किसी पर खुमार छाया है।
और मन की सुन्दरता का, हर किसी ने मजाक उड़ाया है।।

साम, दाम, दण्ड, भेद की रणनीति, अपनाता हर इंसान है।
शौर-शराबा, खून-खराबे की नीति, अपनाता हर शैतान है।।
प्रकृति की सुन्दरता को बिगाड़ता, हर दूसरा इंसान है।
तूफान और प्रलय से कांपता, हर दूसरा बेईमान है।।

ईर्ष्या, क्रोध और जलन को, त्याग देने में ही भलाई है।
वासनाओं और बुरी संगत को, त्याग देना ही अच्छाई है।।
भ्रष्टाचार, दुर्व्यवहार के खिलाफ ही, असली ये लड़ाई है।
मन की पवित्रता से ही, झलकती असली सच्चाई है।।

हर दिन दे नारी को सम्मान, भगवान भी प्रसन्न होना है।
हर किसी का मत कर अपमान, फिर कोई दुखी ना होना है।।
वसुधैव कुटुंबकम की परम्परा अपना, सदाचार को अपनाना है।
प्रकृति से कोई खिलवाड़ ना करना, धरती को स्वर्ग बनाना है।।

किसी और से उम्मीद ना रख, खुद से ही पहल करना है।
धर्म और दयालुता साथ रख, इंसानियत को जिन्दा रखना है।।
अंततः जीत सच की होगी, इस बात को गांठ बॉंधे रखना है।
हमें ही इस घोर कलियुग को, अब नवयुग में बदलना है।। 

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