Source: Andrey Zvyagintsev on Unsplash.com

बदनाम गली

दिल्ली की पुरानी गलियों में कुछ रास्ते ऐसे भी हैं, जिनके नाम लेते ही सभ्य समाज की भौहें तन जाती हैं और निगाहें अनायास झुक जाती हैं।

जी. बी. रोड।

अजमेरी गेट की तरफ से आगे बढ़ते हुए एक ऐसी ही गली आती है, जिसे लोग न जाने कितने नामों से पुकारते हैं। मगर उस गली में रहने वाली औरतों के लिए वह सिर्फ एक गली नहीं, बल्कि उनकी साँसों का पता, उनकी मजबूरियों का घर और उनकी अधूरी जिंदगियों की गवाही थी।

गली के बाएँ हाथ की तरफ़ एक पुरानी सीढ़ी ऊपर की ओर जाती थी। सीढ़ियों के ऊपर एक कम वाट का पीला बल्ब टिमटिमा रहा था, जैसे अँधेरे से लड़ने की कोशिश तो कर रहा हो, मगर खुद ही अपनी रोशनी से थक चुका हो।

सीढ़ियाँ पार करने के बाद एक गंदी, तंग और सीलन से भरी लॉबी थी। दीवारों पर समय की परतें जमी थीं और हवा में एक अजीब-सी गंध तैर रही थी—पसीने, सीलन, धुएँ और उन अनकही कहानियों की, जिन्हें कोई सुनना नहीं चाहता था।

उस लॉबी में कई छोटे-छोटे कमरे थे।

पहले कमरे के बाहर से गुजरते हुए कुछ आवाज़ें सुनाई दीं।

दूसरा कमरा भी पीछे छूट गया।

और तीसरे कमरे के सामने पहुँचते ही उस बदबूदार गलियारे के बीच अचानक मोगरे की हल्की-सी खुशबू ने जैसे हवा को रोक लिया।

कमरा छोटा था।

सामने एक तख्ता बिछा हुआ था और उसी पर एक महिला बैठी थी। उम्र लगभग सोलह से उन्नीस वर्ष के बीच होगी, पर उसके हाव-भाव और इस तरह से सजी हुई थी मानों वह कोई पच्चीस-तीस साल की युवती हो। साड़ी करीने से पहनी हुई थी, चेहरे पर बनावटी सजावट थी और आँखों में वह थकान, जिसे कोई काजल कभी नहीं छिपा सकता।

दरवाज़ा खुला तो वह सहम गई।

एक पल के लिए उसके चेहरे पर ऐसा डर आया, मानो यह सब उसके लिए पहली बार हो।

फिर उसने अपने डर को भीतर ही कहीं दबा दिया।

चेहरे पर एक बनावटी मुस्कान लाई और धीमी आवाज़ में बोली—

महिला: आइए, साहब।

दरवाज़े पर खड़ा आदमी सामान्य कद-काठी का था। चेहरे पर घनी मूँछें थीं। वह भीतर आया और उस महिला को बड़ी गौर से देखने लगा।

महिला ने भी अचरज भरी निगाहों से उसे देखा।

फिर बोली—

महिला: आइए, साहब! ज़्यादा समय नहीं है। बाहर और भी ग्राहक लाइन में हैं। जो करना है, जल्दी करिए।

वह आदमी कुछ क्षण चुप रहा।

फिर बोला—

रवि: जी... मेरा नाम रवि है। मैं पहली बार यहाँ आया हूँ। इससे पहले कभी नहीं आया।

महिला के होंठों पर एक फीकी-सी हँसी आई।

वह थोड़ी झुंझलाकर बोली—

महिला: अरे यार... तुम मर्दों का यही ड्रामा हर वक़्त रहता है।

उसने हल्का-सा मुँह बिचकाया।

महिला: यह मेरा पहली बार है! मैं तुम जैसे न जाने कितने मर्दों से मिल चुकी हूँ। पहले तो सभी यही कहते हैं... और फिर जानवरों की तरह नोचते हैं। चलो साहब, जल्दी से कपड़े खोलो।

इतना कहते हुए वह अपनी साड़ी उतारने लगी।

रवि अचानक दूसरी तरफ मुड़ गया।

उसकी आवाज़ में घबराहट थी—

रवि: आप यह क्या कर रही हैं?

महिला ने पलटकर उसकी तरफ देखा।

उसके चेहरे पर अब झुंझलाहट साफ़ दिखाई दे रही थी।

महिला: अब तू मुझे बता... ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?

रवि ने हिचकते हुए कहा—

रवि: जी... मेरा मतलब है, कपड़े उतारने की ज़रूरत नहीं है। मैं आपसे वैसे भी कुछ करने नहीं आया हूँ।

महिला कुछ पल उसे देखती रही।

फिर उसके चेहरे पर खीझ उतर आई।

महिला: देखो साहब, तुम्हारा तो टाइम पास हो रहा है... लेकिन मेरा तो धंधा ठप हो गया ना। अभी मुझे तेरे चक्कर में ओवरटाइम करना पड़ेगा।

रवि चौंक गया।

रवि: ओवरटाइम... मतलब?

अब महिला की झुंझलाहट गुस्से में बदलने लगी।

उसकी आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई।

महिला: देख! अगर मैं अपनी आपा को तय दिहाड़ी समय पर न दूँ, तो मुझे ओवरटाइम करना पड़ेगा। और अगर नहीं की... तो मेरे साथ मारपीट भी हो सकती है और रात का खाना भूल ही जाओ।

वह कुछ पल रुकी।

फिर थकी हुई आवाज़ में बोली—

महिला: तो देख... जल्दी से अपना काम ख़त्म कर। मुझसे अब ज़्यादा पूछताछ करने की ज़रूरत नहीं है।

रवि कुछ देर तक उसे देखता रहा।

उसकी आँखों में अब वह जिज्ञासा नहीं थी जो कमरे में आते समय थी।

उसकी जगह कुछ और उतर आया था—

एक सवाल।

एक बेचैनी।

और शायद उस औरत के दर्द को समझने की पहली कोशिश।

उसने हिम्मत करके पूछा—

रवि: आपका नाम क्या है?

सवाल सुनते ही महिला कुछ क्षणों के लिए बिल्कुल शांत रही।

वह रवि को देखती रही।

फिर अचानक ज़ोर से हँस पड़ी।

उसकी हँसी में ख़ुशी नहीं थी।

वह ऐसी हँसी थी, जिसमें वर्षों का दर्द, अपमान और अपनी ही किस्मत पर किया गया व्यंग्य घुला हुआ था।

रवि उसे इस तरह हँसते देख भीतर ही भीतर सोचने लगा—

आख़िर मैंने ऐसा क्या पूछ लिया?

कुछ देर बाद वह महिला उसकी आँखों में देखते हुए बोली—

महिला: कहाँ आए हो, साहब?

उसने कमरे के चारों ओर देखा।

फिर धीमे मगर कड़वे स्वर में कहा—

महिला: यह रंडीखाना है... और इसका यह नाम हम जैसी रंडियों की वजह से पड़ा है।

उसकी आँखों में एक क्षण के लिए नमी तैर गई।

मगर उसने उसे पलकों के पीछे ही रोक लिया।

महिला: मतलब मेरा नाम... रंडी या फिर धंधेवाली है, साहब।

रवि के भीतर जैसे कुछ टूट-सा गया।

उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसका एक मामूली-सा सवाल किसी के लिए कितना गहरा घाव बन सकता है।

वह महिला धीरे-धीरे उसकी ओर बढ़ी।

उसके चेहरे पर अब गुस्सा नहीं था।

सिर्फ़ थकान थी।

एक ऐसी थकान, जो शायद उम्र से नहीं, हालात से आती है।

वह बोली—

महिला: मैंने अभी तक तुम्हें रवि नहीं कहा… जानते हो क्यों?

रवि चुप रहा।

महिला: क्योंकि मेरे लिए तुम एक ग्राहक हो... और मैं एक धंधेवाली।

उसने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा—

महिला: एक-दूसरे का नाम जानकर हमने क्या ही करना है?

कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा पसर गया।

बाहर की आवाज़ें भी जैसे दूर चली गईं।

महिला ने आगे कहा—

महिला: आज तुम मेरे इस कमरे में आए हो। वैसे ही किसी और दिन किसी दूसरे कमरे में चले जाओगे। और फिर... तुम कहाँ और मैं कौन?

उस आख़िरी वाक्य के साथ उसकी आवाज़ जैसे टूट गई।

तभी अचानक बाहर शोरगुल होने लगा।

भागते कदमों की आवाज़ें।

दरवाज़ों के खुलने-बंद होने की आवाज़ें।

घबराई हुई चीखें।

महिला ने चौंककर दरवाज़े की तरफ देखा।

लॉबी में लोग इधर-उधर भाग रहे थे।

वह घबराकर रवि की तरफ़ मुड़ी—

महिला: अरे साहब! जल्दी से भागो। रेड पड़ी है। तुम्हें उठाकर ले जाएँगे और तुम्हें खामखाँ जेब ढीली करनी पड़ेगी।

इतना कहकर उसने दरवाज़ा खोलने के लिए हाथ बढ़ाया।

लेकिन दरवाज़ा खुलते ही सामने से दो पुलिसवाले भीतर आ गए।

दोनों ने रवि को देखते ही सैल्यूट किया।

रवि ने हाथ के इशारे से उन्हें विश्राम करने को कहा।

एक हवलदार आगे बढ़ा—

हवलदार: साहब जी! आपके कहे अनुसार हमने आपा और उसके सभी बदमाशों को पकड़ लिया है।

उसने कमरे के बाहर खड़ी महिलाओं की ओर इशारा किया—

हवलदार: अब इन धंधेवालियों का आगे क्या करना है?

हवलदार के मुँह से निकला वह शब्द—

'धंधेवालियाँ।'

रवि के कानों में जैसे अटक गया।

उसने धीरे से उस महिला की ओर देखा।

वह महिला सिर झुकाए खड़ी थी।

शायद उसे इस शब्द की आदत थी।

शायद वर्षों से।

इतनी आदत कि अब अपमान भी उसके लिए रोज़मर्रा की आवाज़ बन चुका था।

रवि कुछ क्षणों तक उसे देखता रहा।

फिर हवलदार की तरफ़ मुड़ा।

उसकी आँखों में इस बार नाराज़गी साफ़ थी।

रवि: हम सभ्य समाज की बात करते हैं...

वह एक पल के लिए रुका।

उसकी निगाह फिर उन महिलाओं पर गई।

रवि: लेकिन बिना आप लोगों के त्याग को समझे... एक सभ्य समाज की उम्मीद करना भी मुश्किल है।

उसने हवलदार की ओर तिरछी और गुस्से से भरी निगाहों से देखा।

हवलदार उसकी आँखों का अर्थ समझ चुका था।

रवि ने आगे कहा—

रवि: चलिए।

फिर उसने उन महिलाओं की ओर देखा—

रवि: आप सभी को सबसे पहले महिला सुधार केंद्र भेजा जाएगा।

कमरे में खड़ी महिलाओं के चेहरों पर पहली बार कुछ बदला।

किसी के चेहरे पर अविश्वास था।

किसी की आँखों में डर।

और किसी की आँखों में शायद वर्षों बाद उम्मीद की एक बहुत छोटी-सी किरण।

रवि ने कहा—

रवि: वहाँ सरकार और कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से आप लोगों को एक नई शुरुआत करने का मौक़ा मिलेगा।

वह कुछ क्षण रुका।

फिर बहुत धीमे स्वर में बोला—

रवि: एक नया नाम... रहने के लिए नया आवास... और एक नया काम।

उसकी आवाज़ में अब कठोरता नहीं थी।

सिर्फ़ इंसानियत थी।

रवि: जहाँ आप लोग इज़्ज़त की ज़िंदगी जी सकेंगी।

कमरे में खड़ी वह महिला रवि को देख रही थी।

उसकी आँखों में आँसू थे।

मगर इस बार वे आँसू दर्द के नहीं थे।

शायद इसलिए कि किसी ने पहली बार उसके शरीर के पीछे छिपी इंसान को देखने की कोशिश की थी।

रवि ने आख़िरी बार उसकी ओर देखा और कहा—

रवि: और हाँ... वहाँ कोई आपको धंधेवाली नहीं कहेगा।

महिला की पलकों पर ठहरे आँसू आख़िरकार गालों पर उतर आए।

उसने उन्हें पोंछने की कोशिश नहीं की।

शायद कुछ आँसू ऐसे होते हैं जिन्हें बह जाने देना ही बेहतर होता है।

क्योंकि वे केवल आँखों से नहीं निकलते...

वे वर्षों से दबे हुए दर्द को अपने साथ बहाकर ले जाते हैं।

और उस रात, जी. बी. रोड की उस बदनाम गली में पहली बार किसी ने एक औरत को उसके पेशे से नहीं... उसकी इंसानियत से पहचाना था।

भारत में वेश्यावृत्ति स्वयं अपने-आप में अपराध नहीं है। हालाँकि वेश्यालय चलाना, दलाली करना, बाल वेश्यावृत्ति तथा सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहकों को आकर्षित करना कानून के दायरे में अपराध हो सकते हैं।

भारतीय न्यायपालिका ने भी विभिन्न अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि यौनकर्मियों को भी कानून के तहत सम्मान, गरिमा और सुरक्षा का अधिकार प्राप्त है। क्योंकि किसी इंसान की परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी अँधेरी क्यों न हों, उसकी इंसानयत का उजाला कभी खत्म नहीं होना चाहए।

.    .    .