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विरासत वह नहीं जो बंद तिजोरियों में रखी रहे, विरासत वह है जो चेतना में उतरकर सोच बन जाए। माता-पिता के विचार समय से आगे चलते हैं और उनसे प्रदत्त संस्कार ताउम्र हमारा मार्गदर्शन करते हैं लेकिन इस बौद्धिक विरासत का असल उत्तराधिकारी कौन होता है? आइए जानने की कोशिश करें इस सच्ची घटना में। 

हमारे आसपास कुछ ऐसे लोग होते हैं जो अपने जज्बे से, अपने जुनून से कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जो समाज में मिसाल बन जाता है, उनकी कहानी हर एक की जुबान पर होती है और उन्हें ‘रियल लाइफ हीरोज़’ कहा जाता है, लोग उनसे प्रेरणा लेते हैं और उनके जैसा ही बनना चाहते हैं। हालांकि ऐसे हीरोज़ गिने-चुने ही होते हैं। ये और बात है कि कठिनाइयाँ और संघर्ष तो सभी की जिंदगी में आते हैं कुछ उनमें डूब जाते हैं और कुछ अपनी समझ और सूझबूझ से उनसे उबरते भी हैं, पर उनमें से ज्यादातर लोगों के संघर्ष की कहानियाँ अनसुनी-अनजानी ही रह जाती हैं क्योंकि उनकी किस्मत इतनी अच्छी नहीं होती कि उन्हें उस स्तर की मान्यता अथवा पहचान मिल सके जिससे वे अपने समुदाय, समाज, देश या वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव डाल सकें। ऐसे लोग ही ‘अनसंग हीरोज़’ कहलाते हैं।

आज मैं जिस लड़की की आपबीती आप तक पहुँचा रही हूँ वो सचमुच सुपात्र है, सुयोग्य है कि उसे दुनिया एक हीरो की नजर से जाने लेकिन किस्मत ने उसे यहाँ भी दगा दे दिया और उसकी कहानी अनकही-अनसुनी रही और दुनिया एक सशक्त, साहसी और निर्भीक लड़की से अपरिचित ही रह गई वरना आज उसकी कहानी अनेक लड़कियों एवं महिलाओं की प्रेरणास्त्रोत होती और उनका जीवन संवार रही होती। मैं बात कर रही हूँ सुमंगला की, जो मेरी सहेली की चचेरी बहिन है और उ.प्र. के इटावा शहर में निवास करने वाले एक उच्च मध्यमवर्गीय परिवार की सबसे छोटी बेटी है। आज उम्र के चौथे दशक के उत्तरार्ध में प्रवेश कर चुकी सुमंगला परिस्थितिवश अविवाहित है। वो एक शांत-सौम्य-सरल स्वभाव और अनुशासित जीवन जीने वाली लड़की है। अभी कुछ समय पहले तक उसे ‘अविवाहित अकेली लड़की’ का टैग लगा चुके रिश्तेदार एवं मोहल्ले के लोग इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ थे कि सुमंगला अपने भीतर किसी सुप्तप्राय ज्वालामुखी की तरह गहरी उथल-पुथल लिए हुए थी। उसके भीतर कितना कुछ टूटा पड़ा था, जिनसे दर्द बूंद-बूंद करके रिसता रहता था।

सुमंगला अपने दो भाईयों की इकलौती बहन थी। पेशे से अध्यापक, उच्चकोटि के विद्वान पिता की शास्त्र, साहित्य और समाज तीनों पर विलक्षण पकड़ थी। घर के हर कोने से उनकी विद्वता और पांडित्य की झलक मिलती थी। पिता अक्सर कहते थे कि जीवन का सबसे बड़ा धन सोचने की स्वतंत्रता है। सुमंगला ऐसे ही माहौल को अपने भीतर सहेजकर बड़ी हो रही थी, किन्तु समय गतिमान है किसी के लिए नहीं रुकता। पिता के अचानक देहावसान ने जैसे पूरे घर से उसकी धुरी छीन ली। माँ का संसार एकदम बिखर गया, पर इस टूटन में सबसे अप्रत्याशित था दोनों भाईयों का व्यवहार। जो भाई पिता के रहते परिवार से जुड़े हुए थे, सुशील एवं आज्ञाकारी पुत्रों के रूप में आस-पड़ोस और रिश्तेदारी में जिनकी मिसालें दी जाती थीं, वही पिता के जाने के बाद जिम्मेदारी से दूर हटते चले गए। औने-पौने पिता की चल-अचल संपत्ति का मनमाना बंटवारा करके अपने-अपने परिवार सहित अलग हो गए। जिस समय माँ-बेटी दोनों को आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक आधार एवं सहयोग की सर्वाधिक आवश्यकता थी, उस समय दोनों भाईयों ने दूरी और उपेक्षा की दीवारें खड़ी कर लीं। माँ के प्रति उनका यही रवैया सुमंगला के विवाह न करने की वजह बना।

सुमंगला को यह बात कचोटती थी कि जिस पिता ने दोनों बेटों में इतनी उम्मीदें देखी थीं, उन्होनें ही इस कठिन समय में सबसे पहले रास्ता बदल लिया। माँ अक्सर चुपचाप आँगन में बैठी दूर आसमान को ताकते रहतीं। सुमंगला इधर-उधर की बातें करके उनका दिल बहलाने की कोशिश करती पर सब व्यर्थ जाता। कभी-कभी रात को माँ का हाथ पकड़कर वह रो पड़ती धीरे से, बिना आवाज के। माँ बिना कुछ कहे बस उसका सिर सहला देतीं। माँ से कहे भी तो क्या? क्योंकि वह जानती थी कि माँ के भीतर एक गहरा अकेलापन है एक पत्नी का, एक माँ का और एक ऐसी स्त्री का जिसे उसके अपने ही पुत्रों ने स्वीकारने से इंकार कर दिया। अपनों का उपेक्षापूर्ण व्यवहार इंसान को अंदर से तोड़कर रख देता है। यही वजह थी कि माँ जीवन के प्रति उदासीन हो गई थीं।

पिता की अलमारी में सैकड़ों पन्ने, टाइप किए हुए लेख, पुराने शोध, व्याख्यानों के नोट्स सभी अव्यवस्थित दबे पड़े थे। वह जब-जब उन्हें देखती, उसके दिल में एक कसक सी उठती कि क्या यह वही व्यक्ति थे जिनकी वाणी सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे? जिनकी कलम समाज की चेतना को झकझोर देती थी? क्या उनका वैचारिक अस्तित्व भी इन पीले पड़ते पन्नों के साथ ही समाप्त हो जाएगा? धीरे-धीरे सुमंगला ने स्वयं को इसी उद्देश्य के साथ जोड़कर नई दिशा देने का निश्चय किया। एक दिन उसने दृढ़ता से अलमारी खोलकर पिता के सारे पेपर्स, नोट्स, डायरीज़ मेज पर फैला लीं और अपने आप से कहा- “नहीं, पिता की इस अनमोल बौद्धिक विरासत को ऐसे नष्ट नहीं होने दूँगी।” बस यही वो क्षण था जिसने उसके जीवन की दिशा एवं दशा दोनों बदल दी।

उसने महीनों तक पिता के लेखों पर काम किया। दिन का समय वह माँ की देखभाल में लगाती और रातें इन कागज़ों के साथ बिताने लगी। कुछ पन्नों के कोने फटे हुए थे, कुछ पर पिता की टिप्पणियाँ थीं लाल स्याही से लिखे छोटे-छोटे वाक्य। उन्हें पढ़ते हुए कभी उसकी आँखें नम हो जातीं, कभी चेहरे पर हल्की मुस्कान उतर आती। यही वो समय था जब सुमंगला ने पिता का सानिध्य पुनः महसूस किया, जैसे हर शब्द के पीछे उनकी आवाज़ गूँज रही हो। समय के साथ सुमंगला पिता के लिखे हुए संसार में इस कदर रम गई कि उसका अपना दुःख भी धीरे-धीरे उन शब्दों की रोशनी में विलीन होने लगा। उसने पांडुलिपि तैयार की और कुछेक प्रकाशन संस्थानों से संपर्क किया। हर बार निराशा हाथ लगी पर वह हारी नहीं क्योंकि वह दृढ़-प्रतिज्ञ थी और पिता का विश्वास लिए हुए थी कि ‘सोचने की स्वतंत्रता को थामे रहना।‘ अंततः एक संस्था ने उस पांडुलिपि को प्रकाशित करने में रुचि दिखाई। जब पहली बार पुस्तक का नमूना उसके हाथ में आया- मुख्य पृष्ठ पर पिता का नाम, नीचे छोटे अक्षरों में ‘विचार-संग्रह’ तो उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के काँप उठीं। उसने माँ को पुस्तक दी। माँ ने उसे सीने से लगा लिया और उनकी आँखों से जो अश्रुधारा निकली, वह अपने साथ पुराने सभी दुखों को, क्लेशों को बहा ले गई। अब वहाँ गर्व था, संतोष था क्योंकि बेटी का अटूट विश्वास और मेहनत रंग लाई थी।

पुस्तक के लोकार्पण में विद्वानों, छात्रों, समाजसेवियों का जमावड़ा था। मंच पर सिकुड़ी-सिमटी बैठी सुमंगला के मन में बचपन से लेकर अब तक की सारी स्मृतियाँ मानो किसी फिल्म की भाँति चल रही थीं। विमोचन उपरांत जब उससे पूछा गया कि पिता के विचारों को पुस्तक का स्वरूप देने का ख्याल उसके दिमाग में कैसे आया? तो उसने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा- “पिता ने मुझे सशक्त व स्वतंत्र सोच दी थी, पर भाईयों के द्वारा की गई अवहेलना ने मेरे इरादों को मजबूती दी। मैंने सीखा कि स्त्री का संघर्ष केवल बाहर नहीं, घर की चौखट के भीतर भी उसे जूझना होता है। माता-पिता की विरासत केवल चल-अचल संपत्ति, धन-दौलत या मकानों की सीमित परिधि तक नहीं सिमटती। उनसे प्राप्त होने वाली सबसे अमूल्य धरोहर उनके विचार होते हैं, जीवन को देखने-समझने का उनका दृष्टिकोण होता है और परिस्थितियों से निपटने की वह क्षमता होती है जो वे अपने आचरण से संतान के मन में अंकित कर देते हैं। धन समय के साथ खर्च हो सकता है, मकान ढह सकते हैं, पर माता-पिता द्वारा दी गई सोच, संस्कार और बुद्धि ऐसी विरासत है जो मनुष्य को भीतर से समृद्ध बनाती है और उसके पूरे जीवन की दिशा तय करती है। यह पुस्तक मेरे पिता को ही नहीं वरन समाज में हर उस व्यक्ति को समर्पित है जो विपरीत परिस्थितियों में भी कर्मरत रहता है और स्वयं को बिखरने नहीं देता है।”

उसकी अंतर्मन से निकली इन बातों पर सभागार में देर तक तालियाँ बजती रहीं। उस भावपूर्ण क्षण में सुमंगला को महसूस हुआ कि वह अकेली नहीं है। जब लोगों ने कहा, “आपने पिता के विचारों को नई पीढ़ी तक पहुँचा दिया। यह उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है। एक बेटी ने पिता के मूल्यों, उनकी वैचारिक धरोहर को आगे ले जाने का सार्थक प्रयास किया।” तो उसे महसूस हुआ कि लोग उसके प्रयास को समझ रहे हैं, सराह रहे हैं।

आज सुमंगला अपने विचारों को शब्द दे रही है, लिख रही है, लोग उसे सुनना पसंद करते हैं, समाज के एक छोटे दायरे में ही सही, अपनी पहचान बना रही है लेकिन ये सब एक दिन में नहीं हुआ। अब लोग उसे एक ‘अविवाहित अकेली लड़की’ के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी बेटी के रूप में पहचानते हैं जिसने अपने पिता के शब्दों को जीवन दिया, माँ को संबल और सहारा दिया एवं स्वयं को अपनी शर्तों पर समाज में स्थापित किया। उसके भीतर अब भी कभी-कभी पुराने घाव टीसते हैं, पर वह यह सत्य जान चुकी है कि जीवन जिन मार्गों पर सबसे अधिक परीक्षा लेता है, वे मार्ग ही चेतना को परिष्कृत कर उसे उसकी वास्तविक मंज़िल तक पहुँचाते हैं और वो मंजिल उसे मिल चुकी है- सम्मान, पहचान और पिता की बौद्धिक विरासत को जीवित रखने से प्राप्त हुए संतोष के रूप में।

नोट: यह एक सत्य घटना है लेकिन पहचान उजागर न हो इसलिए पात्रों के नाम व स्थान में परिवर्तन कर दिया गया है। 

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