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डमरू की उस प्रथम गूँज से, स्पंदित हुआ आकाश,
विस्तार और संकुचन में ही, छिपा सृष्टि का वास।
परमाणु के हर कण में देखो, शिव का ही नर्तन है,
पुराने ढाँचों का टूटना ही, नव-तत्वों का सृजन है।
अग्नि नेत्र में, जटा में गंगा, संतुलन का सार है,
विनाश नहीं, यह ऊर्जा का बस रूपांतरण का आधार है।
पेंडुलम की गति सा जीवन, दो छोरों के बीच पलता,
एक अंत ही दूजे छोर की, नई राह बनकर निकलता।
जटाओं का वह संयम कहता, शक्ति अनुशासन में है,
मुक्ति का मार्ग स्वच्छंदता नहीं, मन के नियंत्रण में है।
बिखरे विचारों को जब हम, एक केंद्र पर लाते हैं,
तब विनाश की ज्वाला को हम, ‘बोध’ बना पाते हैं।
त्रिनेत्र जब खुलता भीतर, भ्रम के पर्दे गिरते हैं,
तर्क और श्रद्धा के संगम से, नए मार्ग फिर मिलते हैं।
ज्ञान के उस अपवर्तन से, बदलती जीवन की दिशा,
विवेक के प्रखर प्रकाश में, मिटती अज्ञान की निशा।
त्रिशूल के उन तीन शूलों में, जीवन का सार समाया,
दैविक, भौतिक, मानसिक द्वंद्वों से, ऊपर उठना सिखाया।
हम केवल दर्शक नहीं यहाँ, इस नृत्य के सक्रिय अंग हैं,
हमारी हर इक श्वास में, शिव के अनंत तरंग हैं।

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