उन्नीसवीं सदी का मालाबार: क्यों ज़रूरत थी एक ऐसे रहनुमा की?
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समाज पर मुश्किल वक़्त आता है, अल्लाह तआला उसी समाज में ऐसे लोगों को खड़ा करता है, जो अपने इल्म, अख़लाक़ और ख़िदमत के ज़रिए लोगों के लिए उम्मीद की किरण बन जाते हैं। ऐसे लोग सिर्फ़ अपने दौर को नहीं बदलते, बल्कि आने वाली नस्लों के लिए भी रहनुमाई का रास्ता छोड़ जाते हैं। केरल के इतिहास में **मंबरम सैय्यद अलवी तंगल (रहमतुल्लाहि अलैह)** ऐसी ही एक अज़ीम शख़्सियत हैं। उन्हें केवल एक सूफ़ी बुज़ुर्ग या आलिम कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे एक बेहतरीन मुर्ब्बी, समाज सुधारक, दाई, रूहानी रहनुमा और इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद करने वाले नेता भी थे।
उन्नीसवीं सदी का मालाबार (आज का उत्तरी केरल) कई मुश्किल हालात से गुज़र रहा था। एक तरफ़ अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी अपनी हुकूमत मज़बूत कर रही थी, तो दूसरी तरफ़ आम लोग, ख़ासकर मप्पिला मुसलमान, आर्थिक और समाजी परेशानियों का सामना कर रहे थे। 1792 ई. में श्रीरंगपट्टनम की संधि के बाद मालाबार पर अंग्रेज़ों का प्रभाव तेज़ी से बढ़ा। नई ज़मीनी और लगान व्यवस्था ने ग़रीब किसानों की ज़िंदगी को और मुश्किल बना दिया। लोगों के सामने रोज़ी-रोटी का संकट था, जबकि समाज को ऐसे रहनुमा की तलाश थी, जो सिर्फ़ मस्जिद तक सीमित न रहे, बल्कि लोगों के दिलों में उम्मीद, इल्म और हिम्मत भी पैदा करे।
हालाँकि मालाबार का इस्लाम से रिश्ता बहुत पुराना था। इस्लाम के शुरुआती दौर से ही अरब ताजिर केरल के समुद्री किनारों पर आते रहे। उन्होंने अपने कारोबार के साथ-साथ अपने बेहतरीन अख़लाक़, सच्चाई और अमानतदारी के ज़रिए इस्लाम का पैग़ाम पहुँचाया। इसी वजह से मालाबार में इस्लाम केवल दावत से नहीं, बल्कि अच्छे किरदार से भी फैला। वक़्त के साथ मस्जिदें बनीं, मदरसे क़ायम हुए और इल्म का सिलसिला आगे बढ़ा, लेकिन बदलते हालात में समाज को ऐसे आलिम की ज़रूरत थी, जो दीन की सही समझ के साथ-साथ समाजी इस्लाह, तालीम और इंसानी ख़िदमत को भी अपना मिशन बनाए।
क़ुरआन करीम भी ऐसे लोगों की अहमियत बयान करता है, जो दीन का गहरा इल्म हासिल करके अपनी क़ौम की रहनुमाई करें। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَمَا كَانَ الْمُؤْمِنُونَ لِيَنْفِرُوا كَافَّةً فَلَوْلَا نَفَرَ مِنْ كُلِّ فِرْقَةٍ مِنْهُمْ طَائِفَةٌ لِيَتَفَقَّهُوا فِي الدِّينِ وَلِيُنذِرُوا قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوا إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ
"फिर ऐसा क्यों न हुआ कि हर गिरोह में से कुछ लोग दीन की समझ हासिल करने के लिए निकलते, ताकि वापस आकर अपनी क़ौम को आगाह करें।"
(सूरह अत-तौबा: 122)
एक दूसरी जगह अल्लाह फ़रमाता है:
يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنْكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ
"अल्लाह ईमान वालों और इल्म वालों के दर्जे बुलंद करता है।"
(सूरह अल-मुजादिला: 11)
ऐसे ही नाज़ुक दौर में यमन के हद्रमौत से एक ऐसे आलिम और सूफ़ी मालाबार आए, जिन्होंने अपने इल्म, अख़लाक़, तसव्वुफ़ और समाजी ख़िदमत के ज़रिए इस क्षेत्र के इतिहास पर अमिट छाप छोड़ी। यह शख़्सियत थीं **मंबरम सैय्यद अलवी तंगल (रहमतुल्लाहि अलैह)**। उनकी ज़िंदगी केवल अतीत की एक कहानी नहीं, बल्कि आज भी इल्म, इंसाफ़, ख़िदमत और इंसानियत का एक ज़िंदा पैग़ाम है।
मंबरम सैय्यद अलवी तंगल (रहमतुल्लाहि अलैह) का संबंध यमन के मशहूर **बा-अलवी सादात** ख़ानदान से था। यह वही मुबारक सिलसिला है, जिसका नसब हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) और हज़रत फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के ज़रिए नबी-ए-करीम ﷺ तक पहुँचता है। इस ख़ानदान की सबसे बड़ी पहचान सिर्फ़ उनका नसब नहीं, बल्कि इल्म, तक़वा, तसव्वुफ़ और दावत-ए-दीन रही है। सदियों तक इस ख़ानदान के उलमा और सूफ़िया दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाकर लोगों को क़ुरआन और सुन्नत की तालीम देते रहे।
सैय्यद अलवी तंगल का जन्म 1752 ई. (1166 हिजरी) में यमन के मशहूर शहर तरीम में हुआ। उस दौर में तरीम को "मदीनतुल-इल्म" यानी इल्म का शहर कहा जाता था। यहाँ बड़ी-बड़ी मस्जिदें, मदरसे और रिबात (इस्लामी शिक्षण केंद्र) मौजूद थे, जहाँ दूर-दराज़ से तलबा इल्म हासिल करने आते थे। ऐसे ही इल्मी और रूहानी माहौल में उनकी परवरिश हुई। कम उम्र में ही उन्होंने क़ुरआन हिफ़्ज़ कर लिया और फिर अरबी ज़बान, तफ़सीर, हदीस, फ़िक़्ह और तसव्वुफ़ की तालीम हासिल की। उनके घर का माहौल भी इल्म और इबादत से भरा हुआ था, इसलिए बचपन से ही उनके अंदर दीन की ख़िदमत का जज़्बा पैदा हो गया।
जब उनकी उम्र लगभग सत्रह साल हुई, तो उन्होंने अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ हद्रमौत के मुक़ल्ला बंदरगाह से मालाबार की तरफ़ समुद्री सफ़र शुरू किया। उस समय अरब और मालाबार के बीच सिर्फ़ व्यापार ही नहीं, बल्कि इल्म और दावत का भी गहरा रिश्ता था। हद्रमौत के कई सादात पहले ही केरल पहुँच चुके थे और यहाँ दीन की ख़िदमत कर रहे थे। सैय्यद अलवी तंगल भी समुद्री रास्ते से कोषिक्कोड (कालीकट)** पहुँचे। इसके बाद वे तिरूरंगाड़ी के क़रीब मंबरम में आकर बस गए। यहाँ उनके मामू सैय्यद हसन अल-जिफ़री पहले से मौजूद थे, जिन्होंने उन्हें मालाबार के लोगों और यहाँ के इल्मी माहौल से परिचित कराया।
यह सफ़र सिर्फ़ एक मुल्क से दूसरे मुल्क तक पहुँचने का नहीं था, बल्कि दीन की ख़िदमत और समाज की इस्लाह के एक नए मिशन की शुरुआत थी। क़ुरआन करीम ऐसे लोगों की हौसला-अफ़ज़ाई करता है, जो अल्लाह की राह में हिजरत करते हैं। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
وَمَن يُهَاجِرْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ يَجِدْ فِي الْأَرْضِ مُرَاغَمًا كَثِيرًا وَسَعَةً
"जो अल्लाह की राह में हिजरत करेगा, वह ज़मीन में बहुत-सी जगह और रोज़ी की कुशादगी पाएगा।"
(सूरह अन-निसा: 100
मंबरम पहुँचने के बाद उन्होंने अपने ऊँचे ख़ानदान का सहारा लेकर लोगों के दिल जीतने की कोशिश नहीं की। बल्कि अपने इल्म, सादगी, अच्छे अख़लाक़ और ख़िदमत के ज़रिए लोगों का भरोसा हासिल किया। धीरे-धीरे मंबरम एक छोटे से गाँव से बढ़कर मालाबार का अहम इल्मी और रूहानी मरकज़ बन गया। दूर-दूर से लोग उनसे क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह और तसव्वुफ़ की तालीम लेने आने लगे। आने वाले वर्षों में यही मंबरम, केरल की इस्लामी तारीख़ का एक ऐसा नाम बन गया, जिसे आज भी बड़े एहतराम और मोहब्बत के साथ याद किया जाता है।
हद्रमौत का **तरीम (Tarim)** सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि सदियों से इस्लामी इल्म और तसव्वुफ़ का एक बड़ा केंद्र रहा है। यहाँ के मदरसे और रिबात (इस्लामी शिक्षण संस्थान) ऐसे कई बड़े उलमा और सूफ़िया तैयार कर चुके हैं, जिन्होंने अरब, अफ्रीका, भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया तक दीन की ख़िदमत की। मंबरम सैय्यद अलवी तंगल भी इसी इल्मी और रूहानी माहौल में पले-बढ़े।
ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि उन्होंने छोटी उम्र में ही पूरा क़ुरआन हिफ़्ज़ कर लिया था। इसके बाद उन्होंने अरबी ज़बान, तफ़सीर, हदीस, फ़िक़्ह, अक़ीदा, तसव्वुफ़ और दावत के उसूलों की तालीम हासिल की। उनकी शुरुआती शिक्षा उनके ख़ानदान के बड़े उलमा की निगरानी में हुई। बा-अलवी परंपरा में तालीम का मतलब सिर्फ़ किताबें पढ़ना नहीं था, बल्कि अच्छे अख़लाक़, इख़लास, सादगी, विनम्रता और लोगों की ख़िदमत की तरबियत भी उतनी ही ज़रूरी मानी जाती थी।
उनकी इल्मी तरबियत पर हद्रमौत के बा-अलवी मशायिख़ का गहरा असर था। ख़ास तौर पर **सैय्यद हसन अल-जिफ़री** जैसे पारिवारिक बुज़ुर्गों ने उनके इल्मी और रूहानी सफ़र में अहम भूमिका निभाई। कुछ स्थानीय रिवायतों में दूसरे उस्तादों का भी ज़िक्र मिलता है, लेकिन उनके बारे में सभी ऐतिहासिक स्रोत एक राय नहीं रखते। इसलिए इतिहास की अमानतदारी का तक़ाज़ा यही है कि उन्हीं नामों का ज़िक्र किया जाए, जिनकी तस्दीक़ भरोसेमंद स्रोतों से होती है।
उनकी तालीम का मक़सद सिर्फ़ एक आलिम बनना नहीं था, बल्कि ऐसा रहनुमा बनना था, जो समाज को दीन की सही समझ दे सके। क़ुरआन भी इल्म वालों का ऊँचा मुक़ाम बयान करता है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
"क्या जानने वाले और न जानने वाले बराबर हो सकते हैं?"
*(सूरह अज़-ज़ुमर: 39:9)*
एक दूसरी जगह अल्लाह फ़रमाता है:
إِنَّمَا يَخْشَى اللَّهَ مِنْ عِبَادِهِ الْعُلَمَاءُ
"अल्लाह से उसके बंदों में वही लोग सबसे ज़्यादा डरते हैं, जो इल्म रखते हैं।"
(सूरह फ़ातिर: 35:28)
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
إِنَّ الْعُلَمَاءَ وَرَثَةُ الْأَنْبِيَاءِ
"उलमा, अंबिया के वारिस हैं।"
(सुनन अबू दाऊद, जामिअ अत-तिर्मिज़ी)
मंबरम तंगल की पूरी ज़िंदगी इस हदीस की एक बेहतरीन मिसाल थी। उन्होंने इल्म को सिर्फ़ हासिल नहीं किया, बल्कि उसे समाज की भलाई, लोगों की इस्लाह और दीन की ख़िदमत का सबसे बड़ा ज़रिया बना दिया।
मालाबार पहुँचने के बाद मंबरम सैय्यद अलवी तंगल ने बहुत जल्दी यह समझ लिया कि किसी भी समाज में असली बदलाव सिर्फ़ ख़ुत्बों और नसीहतों से नहीं आता, बल्कि अच्छी तालीम से आता है। इसी सोच के साथ उन्होंने मंबरम को अपना इल्मी मरकज़ बनाया। यहाँ की मस्जिद सिर्फ़ नमाज़ अदा करने की जगह नहीं रही, बल्कि क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह और अरबी ज़बान की तालीम का एक अहम केंद्र बन गई। धीरे-धीरे दूर-दराज़ के इलाक़ों से भी तलबा यहाँ इल्म हासिल करने आने लगे।
उनका पढ़ाने का अंदाज़ बहुत आसान और असरदार था। वे मुश्किल मसलों को भी साधारण मिसालों के साथ समझाते थे, ताकि हर व्यक्ति उन्हें आसानी से समझ सके। उनके लिए तालीम का मतलब सिर्फ़ किताबी इल्म देना नहीं था। वे अपने शागिर्दों की तरबियत पर भी उतना ही ध्यान देते थे। इबादत, सादगी, ईमानदारी, अच्छे अख़लाक़, लोगों के हक़ अदा करना और समाज की ख़िदमत करना उनकी तालीम का अहम हिस्सा था। उनका मानना था कि अगर इल्म इंसान के किरदार में नज़र न आए, तो वह इल्म अधूरा है।
मंबरम में लगने वाली उनकी इल्मी मजलिसों की शोहरत पूरे मालाबार में फैलने लगी। अलग-अलग इलाक़ों से तलबा और दीन सीखने वाले लोग उनके पास आने लगे। इन्हीं शागिर्दों में सबसे मशहूर नाम उनके सुपुत्र **सैय्यद फ़ज़्ल पूकोया तंगल (Sayyid Fadl Pookoya Thangal)** का है। उन्होंने अपने वालिद की इल्मी और दावती विरासत को आगे बढ़ाया और बाद में मालाबार के बड़े इस्लामी आलिम और असरदार रहनुमा बने। उनके अलावा भी कई स्थानीय उलमा और दाई मंबरम तंगल से तालीम हासिल करके मालाबार के अलग-अलग हिस्सों में दीन की ख़िदमत के लिए निकले। हालाँकि, उन सभी के नाम भरोसेमंद ऐतिहासिक स्रोतों में दर्ज नहीं हैं।
मंबरम तंगल हमेशा कहते थे कि एक सच्चा आलिम वही है, जो अपने समाज के हालात को समझे और लोगों के बीच रहकर उनकी रहनुमाई करे। यही वजह थी कि वे अपने शागिर्दों को सिर्फ़ किताबें नहीं पढ़ाते थे, बल्कि उन्हें लोगों के दुख-दर्द को समझना, उनकी मदद करना और दीन को आसान और अमली अंदाज़ में पेश करना भी सिखाते थे। कुछ ही वर्षों में मंबरम पूरे मालाबार का एक बड़ा इल्मी और रूहानी केंद्र बन गया।
उनकी तालीम का असर सिर्फ़ उनके दौर तक सीमित नहीं रहा। उनके शागिर्दों, उनके ख़ानदान और बाद की नस्लों ने मस्जिदों, मदरसों और दावती इदारों के ज़रिए इस मिशन को आगे बढ़ाया। यही वजह है कि आज भी केरल के मुस्लिम समाज में मंबरम तंगल की इल्मी, दावती और समाजी विरासत पूरी मज़बूती के साथ ज़िंदा दिखाई देती है।
जब मंबरम सैय्यद अलवी तंगल ने मालाबार में अपनी दावत और तालीम का काम शुरू किया, उस समय पूरा इलाक़ा अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी के क़ब्ज़े में था। 1792 ई. की **श्रीरंगपट्टनम संधि** के बाद मालाबार में अंग्रेज़ों का असर लगातार बढ़ता गया। उन्होंने ज़मीन और लगान की नई व्यवस्था लागू की, जिससे वहाँ के पुराने सामाजिक ढाँचे में बड़ा बदलाव आया। इस व्यवस्था का सबसे ज़्यादा असर ग़रीब किसानों और मप्पिला मुसलमानों पर पड़ा। भारी लगान, ज़मीन से बेदखली और आर्थिक तंगी की वजह से लोगों की ज़िंदगी मुश्किल होती चली गई। इन हालात ने पूरे समाज में बेचैनी और नाराज़गी पैदा कर दी।
ऐसे मुश्किल दौर में मंबरम तंगल ने सिर्फ़ सब्र की बात नहीं की, बल्कि लोगों को दीन, ख़ुद्दारी और अपनी समाजी ज़िम्मेदारियों का एहसास भी दिलाया। उनकी मजलिसों में क़ुरआन की तालीम के साथ-साथ इंसाफ़, अमानतदारी, भाईचारा और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़े होने की भी शिक्षा दी जाती थी। वे लोगों से कहा करते थे कि किसी भी क़ौम की असली ताक़त उसके इल्म, अच्छे अख़लाक़ और आपसी एकता में होती है, न कि दौलत या ताक़त में।
क़ुरआन करीम भी इंसाफ़ और नेकी का हुक्म देता है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُونُوا قَوَّامِينَ بِالْقِسْطِ شُهَدَاءَ لِلَّهِ
"ऐ ईमान वालो! अल्लाह के लिए इंसाफ़ पर मज़बूती से क़ायम रहो और न्याय की गवाही दो।"
(सूरह अन-निसा: 135)
एक दूसरी जगह अल्लाह फ़रमाता है:
وَتَعَاوَنُوا عَلَى الْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰ
"नेकी और तक़वा के कामों में एक-दूसरे की मदद करो।"
(सूरह अल-माइदा: 2)
मंबरम तंगल ने अपनी पूरी ज़िंदगी इन्हीं क़ुरआनी तालीमात के मुताबिक़ गुज़ारी। वे लोगों को समझाते थे कि दीन सिर्फ़ नमाज़, रोज़ा और इबादत का नाम नहीं है। एक सच्चा मुसलमान वह है, जो इंसाफ़ का साथ दे, लोगों पर रहम करे, ज़रूरतमंदों की मदद करे और समाज की भलाई के लिए आगे आए। यही सोच उन्हें मालाबार के मुसलमानों के बीच एक भरोसेमंद रहनुमा और नैतिक नेता बनाती है।
इतिहास बताता है कि मप्पिला समाज के बहुत-से लोग किसी बड़े फ़ैसले से पहले मंबरम तंगल से मशविरा किया करते थे। इससे पता चलता है कि उनका असर सिर्फ़ दीनी मामलों तक सीमित नहीं था। लोग उन्हें अपने समाज, अपनी परेशानियों और अपनी ज़िंदगी से जुड़े अहम मसलों में भी एक भरोसेमंद मार्गदर्शक और रहनुमा मानते थे।
मंबरम सैय्यद अलवी तंगल की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वे समाज की समस्याओं का हल सिर्फ़ तक़रीरों और जज़्बाती बातों में नहीं देखते थे। उनका यक़ीन था कि किसी भी समाज में असली बदलाव अच्छी तालीम, अच्छे अख़लाक़ और किरदार की मज़बूती से आता है। वे अक्सर लोगों को समझाते थे कि जिस समाज में इल्म और अख़लाक़ ज़िंदा हों, उसे कोई भी बाहरी ताक़त ज़्यादा समय तक कमज़ोर नहीं कर सकती।
उन्होंने अपने दौर में फैली अशिक्षा, आपसी झगड़ों, नैतिक गिरावट और दीन से दूरी जैसी समस्याओं को दूर करने की भरपूर कोशिश की। ग़रीबों की मदद करना, तलबा की हौसला-अफ़ज़ाई करना और मस्जिदों को तालीम का केंद्र बनाना उनके मिशन का अहम हिस्सा था। उनके पास आने वाला हर इंसान—चाहे वह किसान हो, ताजिर, तलबा या मज़दूर—इज़्ज़त और अपनापन महसूस करता था। यही वजह थी कि लोग उन्हें सिर्फ़ एक आलिम नहीं, बल्कि अपना हमदर्द और सच्चा रहनुमा भी मानते थे।
मंबरम तंगल की एक अहम ऐतिहासिक कृति **'अस्सैफ़ुल बत्तर' (As-Saiful Battar)** भी काफ़ी मशहूर है। इस अरबी किताब में उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत की औपनिवेशिक नीतियों और ज़ुल्म के दौर में मुसलमानों की दीनी और नैतिक ज़िम्मेदारियों पर अपने विचार पेश किए। इतिहासकारों का मानना है कि इस किताब ने मालाबार के मुसलमानों में ख़ुद्दारी, दीनी जागरूकता और अपने हक़ की हिफ़ाज़त का जज़्बा मज़बूत किया। हालाँकि, उनके सीधे राजनीतिक योगदान और अलग-अलग मप्पिला आंदोलनों में उनकी भूमिका को लेकर इतिहासकारों की राय एक जैसी नहीं है। इसलिए उनके योगदान को हमेशा भरोसेमंद ऐतिहासिक स्रोतों की रोशनी में ही समझना चाहिए।
मंबरम तंगल की रहनुमाई टकराव के बजाय हिकमत, दीन की सही समझ और अच्छे किरदार पर आधारित थी। उनका मानना था कि अगर समाज तालीमयाफ़्ता होगा, नैतिक मूल्यों पर चलेगा और अल्लाह से अपना रिश्ता मज़बूत रखेगा, तो वह हर मुश्किल का सामना कर सकेगा। शायद यही वजह है कि उनके इंतिक़ाल के लगभग दो सौ साल बाद भी उनका नाम सिर्फ़ एक सूफ़ी बुज़ुर्ग के तौर पर नहीं, बल्कि मालाबार के सबसे बड़े समाज सुधारकों और असरदार इस्लामी रहनुमाओं में शुमार किया जाता है।
उनकी मजलिसों में तैयार होने वाले शागिर्दों और उनके ख़ानदान ने आगे चलकर केरल में इस्लामी तालीम, मस्जिदों, मदरसों और समाजी इस्लाह के इस मिशन को आगे बढ़ाया। उनके सुपुत्र **सैय्यद फ़ज़्ल पूकोया तंगल** ने भी इस विरासत को नई दिशा दी और दक्षिण भारत के मुस्लिम समाज में एक अहम दीनी और समाजी रहनुमा के रूप में अपनी पहचान बनाई।
यही वजह है कि मंबरम सैय्यद अलवी तंगल का असर सिर्फ़ उनके अपने दौर तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने मालाबार के मुस्लिम समाज को इल्म, इंसाफ़, अच्छे अख़लाक़ और ख़िदमत की ऐसी मज़बूत बुनियाद दी, जिसकी रोशनी आज भी आने वाली नस्लों का रास्ता रोशन कर रही है।
मंबरम सैय्यद अलवी तंगल की शख़्सियत को सिर्फ़ एक आलिम या समाज सुधारक के रूप में समझना काफ़ी नहीं होगा। वे **बा-अलवी (Ba 'Alawi)** सूफ़ी सिलसिले के एक बड़े नुमाइंदे थे। यह सिलसिला यमन के हद्रमौत से शुरू हुआ और ज़िक्र, तज़किया-ए-नफ़्स (रूह की इस्लाह), सुन्नत की पैरवी, इल्म, इख़लास और इंसानी ख़िदमत के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस सिलसिले के बुज़ुर्गों का मानना था कि किसी भी दाई की सबसे बड़ी दावत उसकी ज़ुबान नहीं, बल्कि उसका किरदार होता है।
मंबरम तंगल ने भी इसी उसूल को अपनी ज़िंदगी में अपनाया। वे लोगों को सिर्फ़ नमाज़ और इबादत का तरीका नहीं सिखाते थे, बल्कि ग़ुस्सा, घमंड, लालच, नफ़रत और दिखावे जैसी बुराइयों से बचने की भी नसीहत करते थे। उनका कहना था कि अगर इंसान का दिल अल्लाह की याद से ज़िंदा नहीं होगा, तो उसके बाहरी अमल भी मुकम्मल नहीं हो सकते। इसलिए वे हमेशा दिल की सफ़ाई, अच्छे अख़लाक़ और सच्चे इख़लास पर ज़ोर देते थे।
क़ुरआन करीम भी दिल की पाकीज़गी और अल्लाह की याद की अहमियत बयान करता है। अल्लाह तआला फ़रमाता है:
يَوْمَ لَا يَنفَعُ مَالٌ وَلَا بَنُونَ إِلَّا مَنْ أَتَى اللَّهَ بِقَلْبٍ سَلِيمٍ
"उस दिन न माल काम आएगा और न औलाद, काम आएगा तो सिर्फ़ वही, जो अल्लाह के सामने पाक दिल लेकर आएगा।"
(सूरह अश-शुअरा: 88–89)
एक दूसरी जगह अल्लाह फ़रमाता है:
أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ
"सुन लो! अल्लाह की याद ही दिलों को सुकून देती है।"
(सूरह अर-रअद: 28)
इन्हीं क़ुरआनी तालीमात की रोशनी में मंबरम तंगल लोगों को ज़िक्र, तौबा, सब्र, शुक्र और तवक्कुल की तालीम देते थे। उनके नज़दीक तसव्वुफ़ का मतलब दुनिया छोड़ देना नहीं था, बल्कि समाज के बीच रहकर अल्लाह की बंदगी करना और इंसानों की ख़िदमत करना था। यही वजह थी कि उनके पास सिर्फ़ तलबा ही नहीं, बल्कि ताजिर, किसान, मज़दूर, औरतें और दूसरे मज़हबों के लोग भी सलाह, दुआ और रूहानी रहनुमाई के लिए आते थे।
उनकी ख़ानक़ाह ऐसी जगह बन गई थी, जहाँ इल्म, इबादत और इंसानी हमदर्दी एक साथ दिखाई देती थी। शायद यही संतुलन मंबरम तंगल को अपने दौर के दूसरे धार्मिक रहनुमाओं से अलग पहचान देता है और आज भी उनकी ज़िंदगी को लाखों लोगों के लिए एक बेहतरीन मिसाल बनाता है।
मंबरम सैय्यद अलवी तंगल की विरासत सिर्फ़ इल्म, तालीम और समाजी इस्लाह तक सीमित नहीं थी। उनकी ज़िंदगी का एक अहम पहलू लोगों की रूहानी और मानसिक रहनुमाई भी था। केरल की स्थानीय रिवायतों में यह बात मशहूर है कि जो लोग ग़म, परेशानी या दिली बेचैनी में होते थे, वे मंबरम तंगल के पास आते, उनसे दुआ की दरख़्वास्त करते, क़ुरआन की तिलावत सुनते और अपने दिल का बोझ हल्का करते थे। इस्लामोनवेब के अंग्रेज़ी लेख *Sanctified Minds and Sacred Presence* में भी बताया गया है कि सूफ़ी परंपरा में ज़िक्र, दुआ, क़ुरआन की तिलावत और अल्लाह पर भरोसा इंसान को रूहानी और मानसिक सुकून देने का अहम ज़रिया माना जाता है।
इसके साथ यह बात भी समझनी चाहिए कि मंबरम तंगल से जुड़ी कुछ करामात की रिवायतें स्थानीय मौखिक परंपराओं में मिलती हैं। इतिहासकार इन रिवायतों को पक्के ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि लोगों की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा मानते हैं। इसलिए उनकी शख़्सियत का सही मूल्यांकन उनके इल्मी, समाजी और रूहानी योगदान की बुनियाद पर ही किया जाना चाहिए।
1845 ई. में उनके विसाल के बाद हर साल मंबरम में होने वाला **उर्स शरीफ़** सिर्फ़ एक यादगार कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि इल्म, इख़लास और समाजी एकता की पहचान बन गया। केरल के अलग-अलग ज़िलों के अलावा कर्नाटक, तमिलनाडु और विदेशों से भी हज़ारों अकीदतमंद इस मौके पर मंबरम पहुँचते हैं। उर्स के दौरान क़ुरआन ख़ानी, दर्स, दीनी बयान, दुआ, सामूहिक भोजन और मेल-मिलाप जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जो लोगों के बीच भाईचारा और मोहब्बत का पैग़ाम देते हैं।
मंबरम उर्स की एक ख़ास बात यह भी है कि इसमें सिर्फ़ मुसलमान ही नहीं, बल्कि दूसरे मज़हबों के लोग भी अदब और एहतराम के साथ शामिल होते हैं। यही वजह है कि इसे केरल की साझा सांस्कृतिक विरासत और आपसी सौहार्द की एक खूबसूरत मिसाल माना जाता है। मंबरम तंगल हमेशा लोगों के दिल जोड़ने पर ज़ोर देते थे। उनका मानना था कि जब इंसान का रिश्ता इंसानों से अच्छा होगा, तभी उसका रिश्ता अल्लाह से भी मज़बूत होगा।
आज भी **मंबरम शरीफ़** सिर्फ़ एक ऐतिहासिक दरगाह नहीं, बल्कि केरल की इस्लामी विरासत, बा-अलवी तसव्वुफ़ और इंसानी ख़िदमत की एक ज़िंदा निशानी है। उनकी तालीम और उनका पैग़ाम आज भी लाखों लोगों को अल्लाह की याद, अच्छे अख़लाक़ और इंसानों की ख़िदमत की तरफ़ राह दिखा रहा है।
18 फ़रवरी 1845 (1260 हिजरी) को मंबरम सैय्यद अलवी तंगल का विसाल हुआ, लेकिन उनके जाने के साथ उनका मिशन ख़त्म नहीं हुआ। उन्होंने जो इल्म, रूहानी तरबियत और समाजी इस्लाह की बुनियाद रखी थी, वह आज भी उसी तरह ज़िंदा है। उनकी सबसे बड़ी विरासत सिर्फ़ उनकी दरगाह या सालाना उर्स नहीं, बल्कि वह इल्मी और दावती सिलसिला है, जो आज भी केरल ही नहीं, बल्कि दूसरे इलाक़ों तक अपनी रौशनी फैला रहा है।
इस विरासत को आगे बढ़ाने वालों में सबसे अहम नाम उनके सुपुत्र **सैय्यद फ़ज़्ल पूकोया तंगल (1820–1901)** का है। उन्होंने बचपन में ही अपने वालिद से क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह और तसव्वुफ़ की तालीम हासिल की। आगे चलकर वे मालाबार के बड़े इस्लामी आलिम, असरदार रहनुमा और समाज सुधारक के रूप में मशहूर हुए। अंग्रेज़ी हुकूमत की नीतियों पर खुलकर अपनी राय रखने की वजह से उन्हें औपनिवेशिक प्रशासन के दबाव और निगरानी का भी सामना करना पड़ा। बाद में वे हिजाज़ और फिर उस्मानी (ओटोमन) सल्तनत के प्रभाव वाले इलाक़ों तक पहुँचे, जहाँ उन्होंने दीन की ख़िदमत का काम जारी रखा।
मंबरम तंगल के ख़ानदान ने आगे चलकर केरल के मुस्लिम समाज में दीनी रहनुमाई की एक मज़बूत परंपरा क़ायम की। उनके वंशजों और शागिर्दों ने मस्जिदों, मदरसों और दावती इदारों के ज़रिए तालीम, तरबियत और समाजी इस्लाह का काम लगातार जारी रखा। ख़ास तौर पर मालाबार में बा-अलवी परंपरा, सुन्नी दीनी तालीम और रूहानी रहनुमाई को आगे बढ़ाने में इस ख़ानदान की अहम भूमिका रही, जिसे आज भी बड़े एहतराम के साथ याद किया जाता है।
इतिहासकारों के मुताबिक़ मंबरम तंगल की सबसे बड़ी कामयाबी यह थी कि उन्होंने लोगों को किसी शख़्स की नहीं, बल्कि इल्म, अच्छे अख़लाक़ और समाज की ख़िदमत की अहमियत समझाई। शायद यही वजह है कि उनके इंतिक़ाल के लगभग दो सौ साल बाद भी उनका असर सिर्फ़ तारीख़ के पन्नों तक सीमित नहीं है। उनकी तालीम, उनकी सोच और उनकी विरासत आज भी लाखों लोगों के लिए रहनुमाई का ज़रिया बनी हुई है और आने वाली नस्लों को इल्म, इंसाफ़ और इंसानियत की राह पर चलने की प्रेरणा देती है।
आज दुनिया विज्ञान, तकनीक और तरक़्क़ी के नए दौर में पहुँच चुकी है। इसके बावजूद समाज कई बड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। नैतिक गिरावट, मानसिक तनाव, दीन से दूरी, आपसी नफ़रत और सामाजिक बिखराव जैसी समस्याएँ लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे दौर में मंबरम सैय्यद अलवी तंगल की ज़िंदगी हमें यह पैग़ाम देती है कि किसी भी समाज की असली तरक़्क़ी सिर्फ़ ताक़त या दौलत से नहीं होती, बल्कि इल्म, अच्छे अख़लाक़ और रूहानी जागरूकता से होती है।
मंबरम तंगल ने कभी अपने इल्म को शोहरत या ऊँचा मुक़ाम हासिल करने का ज़रिया नहीं बनाया। उनके लिए इल्म का असली मक़सद इंसान को अल्लाह के क़रीब लाना और उसे समाज के लिए फ़ायदेमंद बनाना था। उन्होंने अपनी ज़िंदगी से यह भी सिखाया कि एक सच्चा सूफ़ी वह नहीं, जो दुनिया से अलग हो जाए, बल्कि वह है, जो लोगों के बीच रहे, उनकी परेशानियों को समझे, उनकी मदद करे और अपने किरदार से इस्लाम की ख़ूबसूरती पेश करे।
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
خَيْرُ النَّاسِ أَنْفَعُهُمْ لِلنَّاسِ
"सबसे बेहतर इंसान वह है, जो लोगों के लिए सबसे ज़्यादा फ़ायदेमंद हो।"
(अल-मु'जम अल-अवसत, अर्थ के अनुसार प्रसिद्ध रिवायत)
यह हदीस मंबरम तंगल की पूरी ज़िंदगी का ख़ुलासा पेश करती है। उन्होंने अपना इल्म, अपना वक़्त और अपनी पूरी ज़िंदगी लोगों की भलाई और दीन की ख़िदमत के लिए वक़्फ़ कर दी।
आज के मुस्लिम नौजवान उनकी ज़िंदगी से बहुत कुछ सीख सकते हैं। सिर्फ़ डिग्री हासिल करना काफ़ी नहीं, बल्कि ऐसा इल्म हासिल करना ज़रूरी है, जो ख़ुद भी फ़ायदा दे और समाज के भी काम आए। इबादत के साथ अच्छे अख़लाक़ को अपनाना, समाज की समस्याओं से मुँह न मोड़ना, हिकमत और इंसाफ़ के साथ लोगों की रहनुमाई करना और अपने दीन से मज़बूत रिश्ता रखते हुए अपने वतन और समाज की भलाई के लिए काम करना—यही मंबरम तंगल की तालीम का असली पैग़ाम है।
मंबरम सैय्यद अलवी तंगल की ज़िंदगी इस बात की ज़िंदा मिसाल है कि एक सच्चा आलिम सिर्फ़ मस्जिद का इमाम नहीं होता, बल्कि वह अपने समाज का उस्ताद, मुस्लिह (सुधारक), रहनुमा और नैतिक नेता भी होता है। उन्होंने मालाबार की धरती पर इल्म, तसव्वुफ़ और समाजी इस्लाह की जो तहरीक शुरू की, उसकी रौशनी आज भी लाखों लोगों के दिलों को रोशन कर रही है।
उनकी विरासत हमें यह याद दिलाती है कि इतिहास उन्हीं लोगों को हमेशा ज़िंदा रखता है, जो अपने दौर की समस्याओं को पहचानते हैं और क़ुरआन व सुन्नत की रौशनी में उनका हल पेश करते हैं। मंबरम सैय्यद अलवी तंगल निस्संदेह ऐसे ही महान इस्लामी रहनुमाओं में से एक हैं, जिनकी ज़िंदगी आज भी इल्म, इख़लास, ख़िदमत और इंसानियत का एक रोशन पैग़ाम है।
संदर्भ:
आयात-ए-क़ुरआन (Qur'anic References)
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