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देखो,
अब मत आना...
ना मेरे जाने की ख़बर पर,
ना मेरी आख़िरी रात के उजाले में।
बस ख़ामोशी रहने देना,
क्योंकि अब जो बात अधूरी रह गई,
वो किसी माटी के नहीं —
किसी और जहाँ के हिस्से की है।
मेरी देह तो चली जाएगी,
पर मेरा एक हिस्सा —
तुम्हारी पलकों के नीचे छिपा रहेगा,
हर उस नींद में
जहाँ तुमने मुझे कभी याद किया था।
अब हम ख़्वाबों में मिलेंगे —
जहाँ वक़्त नहीं होगा,
ना कोई सवाल,
ना कोई शिकवा।
मैं वहाँ आऊँगी,
धुएँ सी हल्की,
और तुम बस मुस्कुरा देना,
जैसे कुछ भी टूटा न हो।
वो मुलाक़ात होगी,
बिना आँसुओं की,
बिना शब्दों की —
सिर्फ़ एक शांति के साथ,
जो इस जीवन में कभी न मिली।
और जब तुम सुबह उठो,
तो मेरी कोई याद न ढूँढना —
मैं वहीं रहूँगी,
तुम्हारे ख़्वाब की आख़िरी लहर पर,
चुपचाप...
जैसे माफ़ी बनकर