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लोग कहते हैं—
इन्तज़ार करने वालों को कभी खाली हाथ नहीं लौटाया जाता,
पर मैंने तो हाथ नहीं, अपना वजूद तक फैला दिया था।
वो आया भी नहीं,
और मैं हर रोज़ उसके आने की आवाज़ बनाता रहा।
मेरे हिस्से बस सवाल बचे,
और उसके पास— चुप्पियों का साम्राज्य।
मैंने चाहा कि वो समझे,
पर वो समझने की उम्र पार कर चुका था।
हर आँसू मैंने तर्क की तरह बहाया,
हर सांस एक तकरार की तरह निकली।
मैंने हार नहीं मानी,
बस उस जंग में रहना छोड़ दिया जहाँ जीत भी उसकी थी, हार भी।
कभी-कभी सोचता हूँ—
क्या मोहब्बत की भी कोई एक्सपायरी डेट होती है?
या हम ही ज़्यादा वक़्त तक उम्मीदों को ज़िंदा रखते हैं?
उसके जाने के बाद,
कमरे की दीवारें भी मुझसे सवाल करने लगीं,
"तू अब भी इंतज़ार में है?"
मैंने कहा— "नहीं, अब बस आदत में हूँ।"
दुआओं का भी एक वक़्त होता है,
जब वो देर से पहुँचें, तो असर खो देती हैं।
और मैंने तो अपनी हर दुआ में उसका नाम लिखा था,
शायद इसलिए कोई और दुआ कबूल न हुई।
कभी आईने में खुद को देखता हूँ,
तो चेहरा नहीं, एक सबक नज़र आता है—
कि कुछ लोग हमें छोड़ते नहीं,
वो हमें खुद से दूर कर जाते हैं।
अब जब कोई कहता है,
“मना लेने से सब वापस आ जाता है,”
तो हँसी नहीं आती—
बस एक पुरानी खामोशी याद आ जाती है,
जो कभी किसी की आवाज़ थी।

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