हम वो देश हैं,
जहाँ मंदिरों में प्रेम की कथा गाई जाती है,
जहाँ हर महाशिवरात्रि पर
शिव और शक्ति के विवाह का उत्सव होता है।
हम दीप जलाते हैं,
भक्ति की आरती गाते हैं,
और कहते हैं —
“प्रेम ही सृष्टि का आधार है।”
फिर भी जब कोई
अपनी मर्ज़ी से प्रेम करता है,
तो वही प्रेम “विद्रोह” बन जाता है।
कितनी अजीब विडंबना है —
हम पूजा में प्रेम माँगते हैं,
पर जीवन में प्रेम को दंड देते हैं।
शिव ने पार्वती से प्रेम किया,
जिसे समाज ने “अनुचित” कहा।
पार्वती ने जन्मों का तप किया
सिर्फ़ एक मिलन के लिए —
जो शरीर नहीं, आत्मा का संगम था।
पर आज,
जब कोई लड़की अपने प्रेमी का हाथ थाम लेती है,
तो पिता की इज़्ज़त खतरे में आ जाती है।
जब कोई लड़का अपनी पसंद की लड़की से विवाह करता है,
तो रिश्तेदार कहते हैं — “संस्कार भूल गया।”
हम वही समाज हैं
जो कैलाश पर प्रेम की आरती जलाता है,
पर अपने ही घरों में
उस लौ से प्रेम को जला देता है।
हम शिव–शक्ति की आराधना करते हैं,
पर अपनी बेटियों से कहते हैं —
“शक्ति बनो, पर प्रेम मत करो।”
शिव ने तो भस्म को अपनाया,
अहंकार को जलाया,
पर हमने परंपरा के नाम पर
मानवता की राख बना दी।
महाशिवरात्रि की रात
हम जागते हैं —
पर भीतर का अंधकार अब भी गहरा है।
क्योंकि हमारे मंदिरों में
अब भी प्रेम की जगह भय जलता है।
कहते हैं, शिव हर जगह हैं —
पर शायद वो अब
उन दो आत्माओं में बसते हैं
जो भीड़ से छिपकर
एक-दूसरे को गले लगाते हैं,
क्योंकि समाज ने कहा —
“तुम्हारा प्रेम हमारी इज़्ज़त से बड़ा नहीं।”
शायद शिव वही हैं,
जो उस लड़की के आँसुओं में हैं
जिसे घर से निकाल दिया गया।
शायद शक्ति वही है,
जो उस लड़के के सीने में जल रही है
जिसे केवल इसलिए ठुकरा दिया गया
क्योंकि उसने प्रेम करने की हिम्मत की।
कितनी अजीब बात है —
हम हर साल शिवरात्रि मनाते हैं,
पर शिव का प्रेम नहीं समझते।
हम भक्ति में प्रेम का नाम जपते हैं,
और प्रेम में भक्ति का अपराध करते हैं।
जहाँ आरती जलती है,
वहाँ प्रेम जलाया जाता है।

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