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मैंने उसे ऐसे चाहा,
जैसे अँधेरे को दीया चाहता है,
जानते हुए —
कि वो जल कर भी
रौशनी नहीं पा सकेगा।
वो मेरी हर बात में था,
हर ख़ामोशी में भी उसका नाम था,
मैंने खुद को भुला दिया,
ताकि वो याद रख सके —
कि कोई है, जो सिर्फ़ उसके लिए सांस लेता है।
मैंने उसके लिए दुनिया से लड़ी नहीं,
क्योंकि मैंने सोचा,
वो ही तो मेरी दुनिया है।
पर जब वो चला गया,
तो दुनिया भी चली गई मेरे भीतर से।
अब मैं नहीं रोती,
आँसू भी थक गए हैं मेरा चेहरा धोते-धोते।
बस हर सुबह उसकी याद से उठती हूँ,
हर रात उसी के नाम पर सो जाती हूँ,
जैसे मीरा अपने कृष्ण से नहीं,
अपने विरह से प्रेम करती थी।
लोग कहते हैं — "छोड़ दो उसे",
पर मैं कैसे छोड़ दूँ?
वो अब मेरा हिस्सा नहीं,
मेरा अस्तित्व है।
मेरा प्रेम अब पवित्र नहीं,
शायद पागलपन है,
या फिर एक धीमा ज़हर —
जो मैं रोज़ पीती हूँ,
बिना शिकायत, बिना मुक्ति की चाह के।
वो चला गया,
पर मेरे भीतर की सज़ा अब भी ज़िंदा है।
प्रेम अब दुआ नहीं,
एक अभिशाप है —
जो मैंने खुद अपने लिए माँगा था।