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समकालीन बौद्धिक जगत में जब भी धर्म, दर्शन और नास्तिकता पर चर्चा होती है, तो दो अलग-अलग पीढ़ियों और विचारधाराओं के नाम अत्यंत प्रासंगिक रूप से सामने आते हैं। एक हैं युवा पीढ़ी के उभरते हुए इस्लामी विचारक मुफ्ती शमाएल नदवी, और दूसरे हैं भारतीय उपमहाद्वीप के प्रसिद्ध साहित्यकार और मुक्त-विचारक जावेद अख्तर। ये दो व्यक्तित्व न केवल दो भिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, बल्कि उन्होंने समाज में दो अलग-अलग चिंतन धाराओं के बीच संवाद और बहस का एक नया वातावरण तैयार किया है।

मुफ्ती शमाएल नदवी वर्तमान समय के एक ऐसे प्रतिभाशाली विद्वान हैं, जिन्होंने इस्लामी शास्त्रीय ज्ञान को केवल मदरसे की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा। पारंपरिक शिक्षण संस्थान 'दारुल उलूम नदवतुल उलेमा' से उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने आधुनिक शिक्षा और दर्शन का अध्ययन किया है। उनकी विशेषता यह है कि वे अत्यंत जटिल धार्मिक और दार्शनिक विषयों को आधुनिक विज्ञान और तर्क के परिप्रेक्ष्य में सरल तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं। वर्तमान डिजिटल युग में, जब युवा पीढ़ी अनगिनत सवालों का सामना कर रही है, तब मुफ्ती शमाएल अपने 'मरकज़ुल-वहायन' प्लेटफॉर्म के माध्यम से उन सवालों का सैद्धांतिक और तार्किक समाधान देकर एक विश्वसनीय नेतृत्व के रूप में उभरे हैं।

दूसरी ओर, जावेद अख्तर एक कालजयी शब्द-शिल्पी हैं। दशकों से उनकी कविताओं, गीतों और पटकथाओं ने भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया है। हालाँकि, अपनी कलाकार छवि से परे उनकी एक बड़ी पहचान एक कट्टर तर्कवादी और घोषित नास्तिक की है। वे सामाजिक अंधविश्वासों के खिलाफ जीवन भर मुखर रहे हैं। उनके पैने तर्क और लंबे जीवन के अनुभव ने उन्हें आधुनिक प्रगतिशील हलकों में एक अद्वितीय ऊंचाई दी है। उनका मानना है कि जीवन और जगत को समझने के लिए मनुष्य की अपनी बुद्धि ही काफी है।

जब दो अलग-अलग ध्रुवों के ये व्यक्ति एक-दूसरे के आमने-सामने आते हैं—एक तरफ मुफ्ती शमाएल का गहरा ईश्वरीय ज्ञान व दार्शनिक तर्क और दूसरी तरफ जावेद अख्तर का अनुभव व मानवतावादी नास्तिकता—तब यह केवल एक व्यक्तिगत बहस नहीं रह जाती। यह 'वही' (Revelation) बनाम 'शुद्ध तर्क' (Pure Reason) का एक महा-संवाद बन जाता है। एक तरफ मुफ्ती शमाएल जब ब्रह्मांड की सुव्यवस्थित संरचना के पीछे एक रचयिता की अनिवार्यता को सिद्ध करते हैं, तो दूसरी ओर जावेद अख्तर मानव विकास और अस्तित्व की भौतिकवादी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं।

शिक्षा और करियर की सफलता: दो अलग-अलग रास्ते

मुफ्ती शमाएल नदवी: शास्त्रीय विद्वत्ता और आधुनिक शोधमुफ्ती शमाएल का शैक्षिक जीवन पारंपरिक इस्लामी शिक्षा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने लखनऊ के प्रसिद्ध दारुल उलूम नदवतुल उलेमा से अपनी स्नातक (आलिम) और स्नातकोत्तर (फजीलात/दौरा-ए-हदीस) की पढ़ाई पूरी की। यहाँ उन्होंने अरबी भाषा, साहित्य और न्यायशास्त्र (फिकह) में विशेष दक्षता हासिल की। उनकी प्रतिभा और तर्कसंगत दृष्टिकोण ने उन्हें अपने समकालीन अन्य छात्रों से अलग पहचान दिलाई।

करियर की सफलता:

  • उच्च शोध: भारत में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कदम रखा। वर्तमान में वे मलेशिया की अंतर्राष्ट्रीय इस्लामिक यूनिवर्सिटी (IIUM) से डॉक्टरेट (PhD) शोध कर रहे हैं, जिसने उन्हें वैश्विक इस्लामी विचारकों की श्रेणी में ला खड़ा किया है।
  • मरकज़ुल-वहायन और वहायन फाउंडेशन: केवल शिक्षण तक सीमित न रहकर, उन्होंने 2021 में 'मरकज़ुल-वहायन' की स्थापना की। यह एक आधुनिक डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म है, जिसके माध्यम से हजारों छात्र घर बैठे इस्लाम का शुद्ध ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं।

जावेद अख्तर: लखनऊ की गलियों से बॉलीवुड के सिंहासन तक जावेद अख्तर का शैक्षिक जीवन लखनऊ की शैक्षणिक परंपराओं से घिरा हुआ था। उन्होंने लखनऊ के कोल्विन तालुकेदार्स कॉलेज और बाद में अलीगढ़ के सफिया कॉलेज से स्नातक किया। किताबी शिक्षा से कहीं बड़ी शिक्षा उनके लिए लखनऊ का वह साहित्यिक माहौल था, जहाँ हर घर में कविता और उर्दू भाषा का अभ्यास होता था।

करियर की सफलता:

  • सलीम-जावेद की जोड़ी: 1960 के दशक में मुंबई आने के बाद उनके करियर में एक बड़ा मोड़ सलीम खान के साथ जोड़ी बनाने से आया। दोनों ने मिलकर 'शोले', 'दीवार' और 'ज़ंजीर' जैसी कालजयी फिल्मों की पटकथा लिखकर भारतीय सिनेमा का इतिहास बदल दिया।
  • गीतकार के रूप में विश्व विजय: पटकथा के बाद उन्होंने खुद को एक गीतकार के रूप में स्थापित किया। उनके लिखे गीतों के बोल न केवल मनोरंजन हैं, बल्कि गहरे दर्शन और मानवीय भावनाओं का मिश्रण हैं। उन्हें पांच बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और भारत के सर्वोच्च सम्मानों में से एक 'पद्म भूषण' और 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया है।

तर्क, दर्शन और अस्तित्व: मुफ्ती शमाएल और जावेद अख्तर की वह ऐतिहासिक बहस

2025 के अंत में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित उस संवाद में जब दो अलग-अलग ध्रुवों के प्रतिनिधि आमने-सामने हुए, तो पूरे भारत की नज़र उस मंच पर थी। एक तरफ प्रखर बुद्धिमान और शांत स्वभाव के युवा विद्वान मुफ्ती शमाएल नदवी थे, और दूसरी तरफ शब्दों के जादूगर और अनुभवी तर्कवादी जावेद अख्तर। उनकी चर्चा का मुख्य केंद्र था— "ईश्वर का अस्तित्व और धर्म की तार्किकता।"

मुफ्ती शमाएल नदवी के सैद्धांतिक और दार्शनिक तर्क: मुफ्ती शमाएल ने बहस की शुरुआत बहुत ही शालीनता से की। उन्होंने पारंपरिक भावनात्मक चर्चा के बजाय शुद्ध दर्शन और विज्ञान की शब्दावली का उपयोग किया। उनके मुख्य तर्क इस प्रकार थे:

  • निर्भरता का तर्क (Contingency Argument): उन्होंने तर्क दिया कि इस ब्रह्मांड की हर वस्तु और घटना 'निर्भर' (Contingent) है। कुछ भी अपने आप अस्तित्व में नहीं आया। चूंकि यह पूरा जगत एक श्रृंखला की तरह काम कर रहा है, इसलिए इस श्रृंखला की शुरुआत में एक ऐसी 'अनिर्भर' या 'स्वयं-पूर्ण' सत्ता की आवश्यकता है, जिसका अस्तित्व किसी और पर निर्भर न हो।
  • ब्रह्मांड की सूक्ष्म संरचना (Fine-Tuning): उन्होंने विज्ञान को हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए कहा कि यदि ब्रह्मांड के भौतिक स्थिरांक (Physical Constants) थोड़े भी इधर-उधर होते, तो जीवन का अस्तित्व संभव नहीं होता। यह सूक्ष्म संरचना सिद्ध करती है कि ब्रह्मांड के पीछे एक परम बुद्धिमान योजनाकार (Intelligent Designer) है।

जावेद अख्तर का मानवतावादी और भौतिकवादी पक्ष: जावेद अख्तर ने अपने लंबे जीवन के अनुभव और नास्तिक दर्शन के आलोक में मुफ्ती शमाएल के तर्कों को चुनौती दी:

  • बुराई की समस्या (Problem of Evil): उन्होंने भावनाओं और तर्क के मिश्रण के साथ सवाल किया कि यदि कोई सर्वशक्तिमान और दयालु ईश्वर है, तो दुनिया में इतनी प्राकृतिक आपदाएँ, मासूम बच्चों की मौत और अन्याय क्यों है?
  • धर्म और विभाजन: उन्होंने अपनी चिर-परिचित स्पष्टवादिता में कहा कि धर्म अक्सर लोगों को विभाजित करता है और अंधविश्वास को जन्म देता है। उनका मानना है कि परलोक के इनाम या सजा के डर से नहीं, बल्कि इंसान को केवल सहानुभूति और मानवता के नाते अच्छे काम करने चाहिए।

शिक्षा और करियर की सफलता: दो अलग-अलग रास्ते

मुफ्ती शमाएल नदवी: शास्त्रीय विद्वत्ता और आधुनिक शोध

मुफ्ती शमाएल का शैक्षिक जीवन पारंपरिक इस्लामी शिक्षा का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने लखनऊ के प्रसिद्ध दारुल उलूम नदवतुल उलेमा से अपनी स्नातक (आलिम) और स्नातकोत्तर (फजीलात/दौरा-ए-हदीस) की पढ़ाई पूरी की। यहाँ उन्होंने अरबी भाषा, साहित्य और इस्लामी न्यायशास्त्र (फिकह) में विशेष दक्षता हासिल की। उनकी मेधा और तर्कसंगत दृष्टिकोण ने उन्हें अपने समकालीन अन्य छात्रों से अलग पहचान दिलाई।

करियर की सफलता:

  • उच्च शोध: भारत में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कदम रखा। वर्तमान में वे मलेशिया की इंटरनेशनल इस्लामिक यूनिवर्सिटी (IIUM) से डॉक्टरेट (PhD) शोध कर रहे हैं, जिसने उन्हें वैश्विक इस्लामी विचारकों की श्रेणी में ला खड़ा किया है।
  • मरकज़ुल-वहायन और वहायन फाउंडेशन: केवल शिक्षण तक सीमित न रहकर, उन्होंने 2021 में 'मरकज़ुल-वहायन' की स्थापना की। यह एक आधुनिक डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म है, जिसके माध्यम से हजारों छात्र घर बैठे इस्लाम का शुद्ध ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं।

जावेद अख्तर: लखनऊ की गलियों से बॉलीवुड के सिंहासन तक

जावेद अख्तर का शैक्षिक जीवन लखनऊ की शैक्षणिक परंपराओं से ओत-प्रोत था। उन्होंने लखनऊ के कोल्विन तालुकेदार्स कॉलेज और बाद में अलीगढ़ के सफिया कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। किताबी शिक्षा से कहीं बड़ी शिक्षा उनके लिए लखनऊ का वह साहित्यिक माहौल था, जहाँ हर घर में कविता और उर्दू भाषा रची-बसी थी।

करियर की सफलता:

  • सलीम-जावेद की जोड़ी: 1960 के दशक में मुंबई आने के बाद उनके करियर में एक बड़ा मोड़ सलीम खान के साथ जोड़ी बनाने से आया। दोनों ने मिलकर 'शोले', 'दीवार' और 'ज़ंजीर' जैसी कालजयी फिल्मों की पटकथा लिखकर भारतीय सिनेमा का इतिहास बदल दिया।
  • गीतकार के रूप में विश्व विजय: पटकथा लेखन के बाद उन्होंने खुद को एक गीतकार के रूप में स्थापित किया। उनके लिखे गीतों के बोल न केवल मनोरंजन हैं, बल्कि गहरे दर्शन और मानवीय भावनाओं का अद्भुत मिश्रण हैं। उन्हें पांच बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्म भूषण' और 'पद्म श्री' से सम्मानित किया जा चुका है।
  • रिचर्ड डॉकिन्स पुरस्कार: 2020 में, वह प्रतिष्ठित 'रिचर्ड डॉकिन्स पुरस्कार' पाने वाले पहले भारतीय बने। उन्हें यह सम्मान उनके तर्कसंगत विचारों, मानवतावाद और धर्मनिरपेक्ष (Secular) मूल्यों के प्रचार के लिए दिया गया था।

तर्क, दर्शन और अस्तित्व: मुफ्ती शमाएल और जावेद अख्तर की वह ऐतिहासिक बहस

2025 के अंत में दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित उस संवाद में जब दो अलग-अलग ध्रुवों के प्रतिनिधि आमने-सामने हुए, तो पूरे भारत की नज़र उस मंच पर थी। एक तरफ प्रखर बुद्धिमान और शांत स्वभाव के युवा विद्वान मुफ्ती शमाएल नदवी थे, और दूसरी तरफ शब्दों के जादूगर और अनुभवी तर्कवादी जावेद अख्तर। उनकी चर्चा का मुख्य केंद्र बिंदु था— "ईश्वर का अस्तित्व और धर्म की तार्किकता।"

मुफ्ती शमाएल नदवी के सैद्धांतिक और दार्शनिक तर्क:

मुफ्ती शमाएल ने बहस की शुरुआत बहुत ही शालीनता से की। उन्होंने पारंपरिक भावनात्मक चर्चा के बजाय शुद्ध दर्शन और विज्ञान की शब्दावली का उपयोग किया। उनके मुख्य तर्क इस प्रकार थे:

  • निर्भरता का तर्क (Contingency Argument): मुफ्ती शमाएल ने तर्क दिया कि इस ब्रह्मांड की हर वस्तु और घटना 'निर्भर' (Contingent) है। कोई भी चीज़ अपने आप अस्तित्व में नहीं आई है। चूँकि यह पूरा जगत एक श्रृंखला की तरह काम कर रहा है, इसलिए इस श्रृंखला की शुरुआत में एक ऐसी 'अनिर्भर' या 'स्वयं-पूर्ण' सत्ता की आवश्यकता है, जिसका अस्तित्व किसी और पर निर्भर न हो। उन्होंने स्पष्ट रूप से समझाया कि शून्य से किसी चीज़ की उत्पत्ति गणितीय और तार्किक रूप से असंभव है।
  • ब्रह्मांड की सूक्ष्म संरचना (Fine-Tuning): उन्होंने विज्ञान को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करते हुए कहा कि यदि ब्रह्मांड के भौतिक स्थिरांक (Physical Constants) थोड़े भी अलग होते, तो जीवन का अस्तित्व संभव नहीं होता। यह सूक्ष्म संरचना सिद्ध करती है कि ब्रह्मांड के पीछे एक परम बुद्धिमान योजनाकार (Intelligent Designer) है।
  • नैतिकता का स्रोत (Objective Morality): मुफ्ती शमाएल का एक मजबूत बिंदु नैतिकता को लेकर था। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि ईश्वर नहीं है, तो 'अच्छे' या 'बुरे' का कोई शाश्वत पैमाना नहीं हो सकता। नास्तिकता की दृष्टि में नैतिकता केवल सामाजिक विकास का परिणाम है, लेकिन धर्म के अनुसार नैतिकता एक ईश्वरीय विधान है, जो मनुष्य को वास्तविक श्रेष्ठता प्रदान करता है।

जावेद अख्तर का मानवतावादी और भौतिकवादी पक्ष:

जावेद अख्तर ने अपने लंबे जीवन के अनुभव और नास्तिक दर्शन के आलोक में मुफ्ती शमाएल के तर्कों को चुनौती दी। उनके प्रस्तुतीकरण के मुख्य बिंदु थे:

  • बुराई की समस्या (Problem of Evil): जावेद अख्तर ने भावनाओं और तर्क के मिश्रण के साथ सवाल किया कि यदि कोई सर्वशक्तिमान और दयालु ईश्वर है, तो दुनिया में इतनी प्राकृतिक आपदाएँ, मासूम बच्चों की मौत और अन्याय क्यों है? उनका मानना था कि जगत की यह अव्यवस्था एक दयालु रचयिता के अस्तित्व के दावे के विपरीत है।
  • विज्ञान और विकास: उन्होंने दावा किया कि मनुष्य एक समय में जिसे समझ नहीं पाता था, उसे 'ईश्वरीय' घोषित कर देता था। लेकिन आधुनिक विज्ञान और डार्विन के विकासवाद ने सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य और ब्रह्मांड का विकास एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसके लिए किसी चमत्कारिक हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
  • धर्म और विभाजन: जावेद अख्तर ने अपनी चिर-परिचित स्पष्टवादिता के साथ कहा कि धर्म अक्सर लोगों को विभाजित करता है और अंधविश्वास को जन्म देता है। उनका मानना है कि परलोक के पुरस्कार या दंड के डर से नहीं, बल्कि मनुष्य को केवल सहानुभूति और मानवता के नाते अच्छे कार्य करने चाहिए।

बहस के महत्वपूर्ण मोड़ और यादगार क्षण

बहस के एक मोड़ पर जब जावेद अख्तर ने धर्म के कारण होने वाले संघर्षों की बात की, तो मुफ्ती शमाएल ने बहुत ही कुशलता से उत्तर दिया— "किसी भी दर्शन की सत्यता को मनुष्य द्वारा किए गए उसके दुरुपयोग से नहीं आँका जा सकता। जैसे विज्ञान का दुरुपयोग कर परमाणु बम बनाने के लिए विज्ञान दोषी नहीं है, वैसे ही मनुष्य के गलत आचरण के लिए धर्म को दोष देना तर्कसंगत नहीं है।"

पुनः जब जावेद अख्तर ने ईश्वर के अदृश्य होने पर सवाल उठाया, तो मुफ्ती शमाएल ने कहा, "हम बिजली या हवा को आँखों से नहीं देखते, लेकिन उनके प्रभाव को देखकर उनके अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। ठीक उसी तरह, ब्रह्मांड की व्यवस्था को देखकर हम ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करते हैं।"

सारांश और प्रभाव

इस बहस का सबसे सकारात्मक पहलू इसका स्तर था। लंबे समय तक चर्चा चलने के बावजूद किसी भी पक्ष ने उत्तेजित या अभद्र व्यवहार नहीं किया। जावेद अख्तर के पैने सवालों ने जहाँ दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया, वहीं मुफ्ती शमाएल के शांत और तर्कसंगत उत्तरों ने यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिक इस्लामी विद्वान आधुनिक दर्शन में कितने पारंगत हैं।

इस संवाद ने युवा पीढ़ी को यह संदेश दिया कि मतभेद हो सकते हैं, लेकिन तर्क और सम्मान के साथ चर्चा करने पर सत्य के और करीब पहुँचना संभव है। मुफ्ती शमाएल नदवी ने इस बहस के माध्यम से प्रमाणित किया है कि विश्वास केवल अंधभक्ति नहीं, बल्कि गहरे तर्क और विवेक पर आधारित है।

सत्य की खोज और संवाद की संस्कृति

मुफ्ती शमाएल नदवी और जावेद अख्तर के जीवन, दर्शन और उनके बीच के बौद्धिक संघर्ष का विश्लेषण करने पर एक बात स्पष्ट हो जाती है—विचारों में भिन्नता होने के बावजूद, एक स्वस्थ और सभ्य समाज के निर्माण के लिए रचनात्मक संवाद का कोई विकल्प नहीं है। जहाँ एक ओर जावेद अख्तर ने अपने लंबे जीवन के अनुभव और तर्कवादी छवि से प्रचलित धारणाओं को कटघरे में खड़ा किया है, वहीं दूसरी ओर मुफ्ती शमाएल नदवी ने यह सिद्ध कर दिया है कि धर्म केवल कुछ रस्मों का समूह नहीं है, बल्कि यह गहरे दार्शनिक और तार्किक आधार पर टिका हुआ है।

मुफ्ती शमाएल का यह उदय समकालीन मुस्लिम जगत के लिए आशा की एक किरण है। उन्होंने दिखाया है कि आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी अपनी जड़ों और विश्वास के प्रति अडिग रहकर दुनिया के बड़े से बड़े तर्कवादियों के साथ आँखों में आँखें डालकर बात कैसे की जाती है। उनके इस शिष्ट व्यवहार और विद्वत्ता ने न केवल उनके अनुयायियों को गौरवान्वित किया है, बल्कि विरोधियों के मन में भी सम्मान उत्पन्न किया है।

अंततः, जावेद अख्तर और मुफ्ती शमाएल का यह द्वंद्व हमें सिखाता है कि रास्ता चाहे विश्वास का हो या तर्क का, एक-दूसरे के प्रति सम्मान बनाए रखते हुए सत्य की खोज करना ही मनुष्य की वास्तविक सार्थकता है। इस तरह की चर्चाएँ जितनी अधिक होंगी, समाज उतना ही अधिक अंधविश्वास-मुक्त और ज्ञान-आधारित बनेगा। मुफ्ती शमाएल जैसे युवा मनीषियों के माध्यम से आने वाले दिनों में आस्तिकता और नास्तिकता की ये बहसें और अधिक समृद्ध होंगी—यही हमारी अपेक्षा है।

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