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ना बंजर, ना पिंजर
बर्फ़ की चादर में, लिपटा हुआ
एक युद्धक्षेत्र है।
ना कोई ठंड बनी, उनके लिए कोई दंड,
चाहे सांसों के थम जाने पर,
चाहे अंग से विच्छेदित हो जाने पर,
वे तो बस हौसले की आग से लड़ते हैं,
क्षण-क्षण और
लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते हैं,
मंद-मंद
और बस,
सर ऊँचा, सीना तान के,
दुश्मनों पे है उनकी हर नज़र।
ये जगह जहाँ, आसमां और धरती में ना
कोई फ़र्क बना,
बस फर्क बना तो सीमाओं का और
धर्म के नाम पर भेदभाव का।

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