जब जीवन क़ा बोझ बढ़नेलगे
जब कटीलेऱास्तों पर चलते-चलते
पैर जख्मी हो ज़ाए ,
जब घेर लेतुम्हेंथक़ान और
जीवन क़ा त़ाऩा ब़ाऩा
तब तुम थोड़ा ठहर ज़ाऩा ।
अपनेजख्मों पर सुकू न से मरहम लग़ाऩा ,
लेलेऩा गहरी स़ााँसेऔर इत्मीऩान सेख़ाऩा ।
कर लेऩा वो ब़ातेजो हमेश़ा सेकरनी थी ,
और थोड़ा अपनो केस़ाथ वक्त बबत़ाऩा ।
तुम थोड़ा ठहर ज़ाऩा ।
देख लेऩा आसप़ास के दृश्य पी लेऩा एक च़ाय भूल केबिक्र ।
जरूरी नही होत़ा ,
हमेश़ा चलतेचलेज़ाऩा
तुम थोड़ा ठहर ज़ाऩा ।
लोग कु छ भी कहे,
च़ाहेतुम पर त़ानेकसे।
तुम बस मुसकु ऱाऩा
और आगेबढ़नेकी बहम्मत जुट़ाऩा क्योंबक ठहर ज़ाऩा
नही होत़ा ह़ार ज़ाऩा तुम बस थोड़ा ठहर ज़ाऩा ।।