वो पल मेरी ज़िंदगी का वो मोड़ था जब मुझे फैसला करना था कि मुझे कहां जाना है। हर रास्ते की अपनी मंज़िल थी, जो कभी ना कभी मेरी चाह रही थी। नज़रें उठाकर जब अपने बाईं ओर देखा तो पाया कि वो दुनिया, जिसके लिए मैंने अपना तन, मन सब न्यौछावर कर दिया था। वो हंसते हुए चेहरे, वो खुशी के पल, और वो गुपचुप बातें जो हर कोई अपने साथी से अंधेरे में करना चाहता है।
एक-एक करके सारे दृश्य मेरी आंखों में घर बना रहे थे। मैं सोच ही रही थी कि एक हवा का झोंका आया, जिसके झोंके से वो आईना टूट गया। कुछ गिरते-फिसलते हुए मैं उस ओर जाकर गिरी, जिस रास्ते को मेरे कदम कभी छूना नहीं चाहते थे।
सूने से घर, अजीब सा अंधेरा, आंखों में मायूसी भरी मुस्कान, और इंतज़ार का लंबा सफर। हां, मैं देख पा रही थी थके हुए चेहरे। वो थकान जो सालों पुरानी थी, जिसकी उम्र का अंदाज़ा उन आंखों के नीचे के काले गड्ढों से लग पा रहा था।
“ये कुछ जाना-पहचाना सा लगता है।” मेरी आत्मा ने मुझे झकझोरते हुए कहा। अपने अंदर झांककर देखा, तो आवाज़ आई कि अब मुझमें इतनी हिम्मत नहीं कि वापस यहां जा सकूँ।
मैं समझ गई, यहां से निकलना बेहतर होगा। पर निकलती भी तो किस तरफ? कोई रास्ता हो तब ना। मोड़ पर एक चबूतरा मिला। उसके ऊपर थोड़ी देर तक ढलती शाम के आसमान से बात करने लगी। अंदाज़ा हुआ कि शाम भी बहुत जल्दी में थी।
खैर, रात ही अपनी है। चाहे बात तन्हाई की हो या सुकून की, रात जैसा साथी कोई नहीं। मेरी थकी हुई आंखों ने तारों को ऐसे टकटकी लगाकर देखा कि उस दिन तारे भी रुक गए। थोड़ा नीचे उतरकर उन्होंने मेरे चेहरे को छुआ और सहलाया।
“तू जो ढूंढ रही है, वो सहज नहीं है। मुक्ति पाना इतना आसान नहीं। मरना पड़ता है।” तारों ने एक धीमी मगर आश्वस्त करने वाली आवाज़ में कहा।
“मैं मरना नहीं चाहती, पर मुक्त होना चाहती हूँ।” मैंने तारों की आंखों में आंखें मिलाते हुए कहा।
“मैं अपना रास्ता खुद बनाऊंगी, चाहे कोई मेरी मदद करे या ना करे।”
मेरे बोलने से पहले ही तारे जा चुके थे- वहीं जहां से आए थे। आसमान में, मेरी नज़र से दूर, मेरी पकड़ से दूर। खैर, अब मुझे पता था कि क्या करना है। सहज रास्ते मेरे लिए नहीं बने थे।.
अचानक ज़ोर से प्यास लगी, तो आसपास कुछ नहीं मिला। थोड़ा दूर चली तो देखा एक तालाब। चांदनी रात की रोशनी में चांदी जैसा दिखने वाला तालाब मुझे अपना-सा लगा। उसकी गहराई, उसकी शांति—शायद वो पहले पड़ाव थे, जिन्होंने मुझे भरी गर्मी में राहत पहुंचाई थी। सर्दी की इस रात में, जब मेरा मन जल रहा था, तब इस तालाब ने मुझे ठंडक पहुंचाई।
मेरी आंखें कब लग गईं और कब रात मुझे छोड़कर चली गई, मुझे पता नहीं चला। मेरे चेहरे पर एक अनोखी रोशनी थी, जो सूरज से बातें कर रही थी। मेरी प्यास बुझ चुकी थी। एक रात को ही सही, मैं मुक्त हो गई थी। शायद मैं यही ढूंढ़ने निकली थी।
रात भी ढल गई मेरी तन्हाई से ऊब कर,
काश कहीं तो मेरा भी ठिकाना हो जाए।
जहां से ना लौटना पड़े,
इस उथली सी दुनिया में।
थोड़ा आगे बढ़ी तो फिर से वही दो मोड़। मैं उस स्थान पर खड़ी थी, जहां वो दोनों ही रास्ते पराए हो गए थे। अब मेरा मन खोज रहा था वो रास्ता, जहां भले ही देर लगे, पर वहां मैं बिना रुके चल पाऊं। जहां सब जाना-पहचाना हो। जहां अपने घाव भी निहारे जाएं।
अभी दोपहर हुई ही थी कि आसमान में उड़ते हुए पंछियों को देखा। वो आसमान की सीध में ज़मीन पर जिस रास्ते से होकर आए थे, वो रास्ता देखा- पथरीला, कांटेदार, तपती गर्मी में आग बिछाए हुए लेटा था। मगर उसकी तपन मेरे मन की तपन के मुकाबले कुछ नहीं थी।
उन कंकड़-पत्थरों और कांटों से होकर वो रास्ता निकलता था, जो उन दोनों मोड़ों से अलग था। मैंने न आव देखा न ताव, बस चल दी। मुझे पता नहीं था कि आगे क्या होगा। इस सूने रास्ते पर कोई साथी मिलेगा या नहीं? मुझे बस चलना था, तब तक जब तक मंज़िल ना आ जाए।
मंज़िल भी क्या? मुक्ति। बस मुक्त होना चाहती थी मैं—इस दुनिया से, रिश्तों से, लोगों से, झूठी दोस्ती और झूठे प्यार से। मैं थक चुकी थी उन रास्तों से, जहां से हर कोई गुजरता था। मुझे अब उन रास्तों से नफ़रत हो गई थी। सो अपना बोझ उठाया और चल दी।
मैं घर से कुछ लेकर नहीं निकली थी, फिर भी बोझ था। उसे लेकर आगे बढ़ती गई और पहुंच गई उस पथरीले रास्ते पर, जहां पत्थरों के बीच से ऊंचे-नीचे रास्ते निकलते थे। डगमगाते हुए कदम और हांफती हुई सांसें लेकर मैं थोड़ा आगे पहुंची, तो देखा एक मंदिर था।
शायद वहां कोई आता-जाता नहीं था।
वो खाली सा मंदिर, जहां एक कोने में टूटे हुए भगवान थे। मैं नहीं जानती वो कौन से भगवान थे। खैर, सोचा थोड़ी देर आराम करूं। जिस दुनिया में भगवान को भी टूटने के बाद छोड़ दिया जाता है, वहां मेरे टूटने से किसी को क्या फर्क पड़ेगा?
वहीं आसपास एक झाड़ू पड़ी थी। उसे उठाकर थोड़ी सी साफ-सफाई की, सूखे पत्ते किनारे लगाए और भगवान के आगे एक दिया जलाया। मैं उस टूटी हुई सूरत को पहचान नहीं पाई। थोड़ी देर वहां बिताई और जैसे ही दोपहर शांत हुई, वहां से चल दी।
आखिर मुक्ति जो पाना थी। थोड़ा आगे बढ़ी तो फटी-सी डायरी मिली। उसका रंग-रूप तो उजड़ा था, पर सुनसान रास्ते पर वो पहला पड़ाव था, जहां रुकने को मैं मजबूर हो गई कुछ पन्ने खाली थे। आगे के कुछ पन्ने जल चुके थे। मैं डायरी रखने ही वाली थी कि हवा के झोंके ने वो पन्ना खोल दिया, जिसे मैं कब से ढूंढ रही थी।
हां, मुझे मुक्ति का रहस्य मिल चुका था।
“मुक्ति पाने के लिए भागना नहीं पड़ता। बस ठहरना पड़ता है, जब सब भाग रहे हों। जब सबके बीच रहते हुए किसी से फर्क न पड़े, तब तुम मुक्त हो—जिंदा रहते हुए भी।” मैं समझ गई थी। मैं जान गई थी कि मुक्ति कहां मिलेगी। मुक्ति मेरे पास ही थी, पर मैंने उसे खोजने में कितनी तकलीफ उठाई। मेरे आंसू, मेरी थकान, मेरे दुख- सब उस पन्ने की बात से राज़ी हो गए। मुझे थकान नहीं थी अब। मैं तैयार थी दुनिया में वापस जाने के लिए—रहने के लिए नहीं, मुक्ति पाने के लिए। इसके पहले मैं कुछ और कहती, मेरी आंख खुल गई थी। मेरे सारे आंसुओं का हिसाब हो चुका था। मैंने उस रात सपने में वो पा लिया, जिसकी खोज मैंने जागते हुए की थी।
“मेरी खुली आंखों से शुरू की गई मुक्ति की खोज, बंद आंखों के सपने ने पूरी कर दी। अब मैं मुक्त हूं, हमेशा के लिए।”