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बात उन दिनों की है जब भारत में अंग्रेजों का राज था। हर ओर अंग्रेजों का अत्याचार फैला हुआ था। भारत में रहने वाले सभी लोग अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए थे। किसी में भी उनके अत्याचार के विरुद्ध बोलने की हिम्मत नहीं थी। सन 1837 के आसपास बुंदेलखंड के सागर शहर से लगभग 80 किलोमीटर दूर सागर-ललितपुर रोड स्थित नरहट गाँव के एक बुंदेला परिवार में एक बालिका का जन्म हुआ, जिसका नाम उसके माँ-बाप ने सजनी रखा। सजनी बचपन से हिम्मतवाली और समझदार लड़की थी। कभी किसी पर अन्याय होता तब वह जालिमों के खिलाफ बोलने लगती थी, फिर चाहे कोई भी अंग्रेज अफसर हो या गाँव का दमदार आदमी। अंग्रेजों के अत्याचार और जुल्म हर तरफ बढ़ते ही जा रहे थे। गाँव के लोगों पर अंग्रेज शासक अपने जुल्म बढ़-चढ़ कर कर रहे थे, परंतु कोई भी उनका प्रतिकार नहीं कर पा रहा था। गाँव नरहट में वैसा ही अत्याचार होता देखकर बुंदेला किसान, सजनी के पिताजी ने अंग्रेजों के खिलाफ गाँव के लोगों को समझाने का प्रयास किया था। धीरे-धीरे जब यह खबर अंग्रेजों तक पहुँची तब उन्होंने सजनी के पिता को बंदी बना लिया। सजनी और उसकी माँ ने विरोध किया तो सजनी की माँ को भी बंदी बना लिया। सजनी ने बहुत हाथ-पाँव जोड़े, पूरे गाँव से निवेदन किया कि उसके पिता को बचा लें, परंतु किसी ने अंग्रेजों के भय से उसका साथ नहीं दिया। तभी सजनी के माता-पिता की हत्या कर दी गई। इस घटना से सजनी को इतना दुख हुआ कि उसने तीन दिन तक खाना नहीं खाया। गाँव के लोगों ने जबरन सजनी को खाना खिलाया। सजनी ने खाना खाते समय यह कसम खाई कि मैं अपने माँ-बाप की हत्या का बदला अंग्रेजों से जरूर लूँगी। इन्हीं बातों के चलते सजनी अपने मन में तरह-तरह से विचार करने लगी। कुछ दिन बाद वह अपना गाँव नरहट छोड़कर शाहगढ़ पहुँच गई, जहाँ के राजा बख़तबली थे। राजा बख़तबली से मिलकर सजनी ने रोते हुए अपनी पूरी कहानी तथा अपने माता-पिता पर हुए अत्याचार का संपूर्ण विवरण राजा को बताया। राजा बख़तबली भी अंग्रेजों के अत्याचार को जानते थे। अंग्रेज शाहगढ़ के खिलाफ षड्यंत्र रच-रच कर शाहगढ़ को हड़पना चाहते थे। तब राजा ने सजनी को अपनी बेटी मान लिया और सजनी को तलवारबाजी, घुड़सवारी और बन्दूक चलाने की ट्रेनिंग दिलवाई, जिसे सजनी ने बहुत जल्दी सीख लिया और सज्जन सिंह बनकर राजा बख़तबली की सेना में भरती हो गई। उनके साहस, शौर्य और हिम्मत की खबरें लोगों के साथ-साथ राजा तक पहुँच गईं।

शाहगढ़ में सजनी की मुलाक़ात हटा के नवल सिंह से हुई। दोनों में अच्छी मित्रता हो गई। राजा बख़तबली ने दोनों को बताया कि झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जल्दी ही अंग्रेजों के खिलाफ एक मुहिम चलाने वाली हैं। इसमें तुम दोनों अगर चाहो तो उनकी सेना में भर्ती होकर सजनी सिंह का अंग्रेजों से बदला ले सकते हो। वहीं उसके साथ हटा के नवल सिंह भी अंग्रेजों के खिलाफ रानी झाँसी की सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों से अपनी धरती माँ को मुक्त करने की कसम खाकर घर से निकले थे। दोनों ने तय किया कि वे झाँसी जाकर रानी लक्ष्मीबाई से मिलकर उनकी सेना में भर्ती होकर देशसेवा करेंगे, परंतु अंग्रेजों की नाकाबंदी एवं बिना अनुमति के किसी का भी झाँसी में प्रवेश करना आसान नहीं था। इसीलिए दोनों पहले ओरछा गए और वहाँ के राजा के यहाँ रुके। वहीं सजनी सिंह ओरछा के बच्चों को संगीत की शिक्षा देने लगी। वहाँ उन्हें सभी एक संगीत शिक्षक के रूप में जानने लगे।

सजनी सिंह का उद्देश्य तो झाँसी जाकर रानी लक्ष्मीबाई की महिला सेना में भर्ती होकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करना था। इसलिए किसी तरह से सजनी सिंह और नवल सिंह दोनों भेष बदलकर झाँसी पहुँचे। रानी लक्ष्मीबाई से मुलाकात की तथा अपने जीवन का उद्देश्य बताया। अंग्रेजों ने उन पर जो अत्याचार किए थे, उनकी माता-पिता की हत्या वाली पूरी कहानी रानी लक्ष्मीबाई को बताई, जिससे रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें अपने महल के पास स्थित पुस्तकालय में नौकरी पर भी रख लिया और अपनी सेना में भर्ती कर लिया। इसी प्रकार नवल सिंह को भी उन्होंने झाँसी की सेना में भरती कर लिया।

इस प्रकार सजनी सिंह झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की महिला सेना में विशेष सैनिक बन गई। रानी झाँसी का सन 1856 में गुप्त रूप से वृहद स्वतंत्रता संग्राम शुरू करने का सिलसिला बन ही रहा था कि अचानक सेना की सजनी सिंह सहित सत्तर-अस्सी खास सिपाहियों ने रानी की बिना अनुमति के अंग्रेज सैनिकों को पकड़-पकड़ कर उनका और उनके बच्चों का भी कत्ल कर दिया, जिससे पूरे झाँसी तथा झाँसी के आसपास हड़कंप मच गया। यह खबर जब दिल्ली पहुँची तब वहाँ से हजारों की संख्या में अंग्रेजों ने अपने सैनिकों को झाँसी भेज दिया तथा जिन-जिन सैनिकों ने अंग्रेजों को मारा था, उनमें से अधिकतर सैनिकों को बंदी बनाकर कत्ल कर दिया। इस बात से रानी लक्ष्मीबाई भी बहुत दुखी हुईं और उन्होंने उन सभी सैनिकों से रिश्ता तक तोड़ दिया, क्योंकि इन सैनिकों ने चंद अंग्रेजों को मारकर सन 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कमजोर कर दिया था। इससे बहुत सी जानकारियाँ भी लीक हो गई थीं।

इसी कारण रानी लक्ष्मीबाई को सफलता नहीं मिल पाई।

चूँकि अंग्रेजों के उस क़त्लेआम के दौरान सजनी सिंह भी घायल हो गई थीं और काफी बीमार रहने लगी थीं। सजनी सिंह ने तो अपने माँ-बाप के कत्ल का बदला ले ही लिया था, परंतु उनके इस कार्य से रानी लक्ष्मीबाई नाराज़ हो गई थीं और उन्होंने सजनी सिंह से बोलना बंद कर दिया था। रानी उन्हें बीमारी की हालत में भी देखने नहीं गई थीं। इसी दुख और सदमे में सजनी सिंह की मृत्यु हो गई। नवल सिंह जी ने उनकी बहुत दवाई करवाई, परंतु उससे कोई फायदा नहीं हुआ। सजनी सिंह कम उम्र में ही भगवान को प्यारी हो गईं। सजनी सिंह का दाह संस्कार नवल सिंह ने पूरे विधि-विधान से किया। करीब नौ अंग्रेज सैनिकों को कत्ल करने वाली सजनी सिंह को इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। इस तरह सजनी सिंह ने वीरांगना का दर्जा पाया।

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