image by unsplash.com सिर्फ यादें' आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना वो बचपन का खिलना हँसना, मुस्कुराना वो मस्ती के खेले वो मेलों के झूले वो बागों में तितलियों का उड़ना, उड़ाना आता है याद मुझको गुज़रा हुआ ज़माना
वो बारिश के मौसम में
आँगन की चौखट पर
बूँदों का गिरना
वो घर की छत से
काग़ज़ की कश्ती का
तिरना , तिराना
आता है याद मुझको
गुज़रा हुआ ज़माना
खुले आसमान में
पतंगों का उड़ना
कभी ढील दे देना
कभी लूट लेना
कभी गुड्डे-गुड़ियों की
बारात सजाना
आता है याद मुझको
गुज़रा हुआ ज़माना
कभी भुट्टों का स्वाद
कभी बेर खट्टे-मीठे
कभी खो-खो का खेल
कभी पिट्ठू के गिट्टे
कभी होली के रंगों में
डूबना, डुबाना
आता है याद मुझको
गुज़रा हुआ ज़माना
फिर बचपन का जाना
जवानी का आना
कभी बलखाकर चलना
कभी शर्मा जाना
कभी साइकिलों पर
शहर घूम आना
कभी चोरी-चुपके से
कोई पिक्चर देख आना
आता है याद मुझको
गुज़रा हुआ ज़माना
कभी संग सहेलियों के
सावन के झूले
कभी झुला देना
कभी पींगे बढ़ाना
आता है याद मुझको
गुज़रा हुआ ज़माना
कभी ताशों की बाज़ी
अंताक्षरी की रातें
कभी तारों की गिनती
कभी सपनों की बातें
कभी किस्से सुनते,
सुनाते सो जाना
आता है याद मुझको
गुज़रा हुआ ज़माना
कभी वक़्त की गिरह में
नए रिश्तों का जुड़ना
कभी बहना का
बर्फ़ी बनाकर खिलना
कभी कोई गीत
गुनगुनाकर सुनाना
कभी पैरों की थिरकन
कभी ठुमका लगाना
आता है याद मुझको
गुज़रा हुआ ज़माना
सुख-दुःख के मिलन-बिछोह में
यौवन का बीत जाना
पतझड़ की सूखी डाल पर
मधुमास का खो जाना
आता है याद मुझको
गुज़रा हुआ ज़माना
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