अभी-अभी मैंने सुना है,
ठठरी सी देह पर
उग आए हैं यादों के झुरमुट,
झुर्रियों की सलवटों में
सिकुड़ गई है नब्बे साल की ज़िन्दगी की चादर।
दंतहीन चेहरे पर चमकती दो आँखें,
कुछ कहने की चाह में
बेबस निकल पड़ी हैं मुक्ति की राह पर।
अभी-अभी मैंने देखा है,
पल-पल क्षीण होती माँ की दुर्बल काया को,
मुस्कुराते चेहरे में छिपी ममता की छाया को,
कुछ मुंदी, कुछ अधखुली पलकों में जीवन की माया को।
कुछ देने की मुद्रा में
झुके हुए दाहिने हस्त को,
ऊर्ध्व गमन का संकेत करते हुए
वाम हस्त को।
"फिर आना" कहकर
माँ ने दी थी
बेटी को विदा।
अचानक कैसी अनहोनी हुई,
बेटी की विदा बन गई माँ की अंतिम विदा।
"रहने न रहने" के बीच
एक दिवस का अंतराल
छोड़ गया अपने पीछे रुदन, पीड़ा का हाहाकार।
दुख की गहन निशा में डूबा
मन मेरा पहुँचा उस ओर,
ममता के बंधन में बंधी
जहाँ थी मेरे मन की डोर।
सूने घर की दीवारों पर
माता के सिरहाने टंगती,
पूज्य पिता के संग लगी
माता की तस्वीर नई थी।
रोक न पाई फिर मैं अपनी
आसू की अविरल धारा को,
जोड़ न पाई टूटे मन की धुंधली होती तस्वीरों को।
सपने में ही देखा माँ को,
सपने में ही पाया।
सपने में ही आँखें छलकीं,
जब-जब गले लगाया।
तब से एक झलक पाने को
तरस रहे हैं मेरे नैन।
काश कि सपना सच हो जाए,
जो कर गया मन को बेचैन!