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उसने उसे लौट आने को नहीं कहा।
बस इतना लिखा—
“तुम ठीक तो हो?”
कुछ देर शब्दों को देखता रहा,
फिर मिटा दिया।

दोबारा लिखा—
“तुम्हारी माँ परेशान होगी...”
फिर मिटा दिया।

फिर लिखा—
“कभी किसी चीज़ की ज़रूरत हो,
तो मुझे फ़ोन कर लेना।”
यह भी भेज नहीं पाया।

कुछ शब्द ऐसे होते हैं
जिन्हें एक पिता
लिख तो सकता है,
पर भेज नहीं सकता—

जब दिल में
डर बहुत गहरा हो
और आँखों में
बेटे का चेहरा।

उसने अपने बेटे को
एक नन्हे बच्चे से
एक आदमी बनते देखा था—

वही बच्चा
जो सड़क पार करते हुए
उसकी उँगली कसकर पकड़ लेता था,

और अब वही बेटा
ज़िन्दगी की भीड़ में
अकेला चलता था,

अपने भीतर के घावों को
अपने पिता से छिपाकर।

फिर एक दिन
घर अचानक
बहुत ख़ामोश हो गया।

अगले कमरे से आती
हँसी नहीं थी,

गलियारे में
कदमों की आहट नहीं थी,

चाय के कप के साथ
वह परिचित आवाज़ नहीं थी—

“आपने चाय पी ली?”
वह चली गई थी।

न आँखों में क्रोध था,
न होंठों पर कोई आरोप।

बस—
एक ख़ामोशी थी।

वह कुछ सामान लेकर निकली,
दरवाज़ा धीरे से बंद किया
और अपने साथ
वह चीज़ ले गई
जिसे हाथों में उठाया नहीं जा सकता—

घर की गर्माहट।

उस शाम
वह बूढ़ा पिता
बहुत देर तक अकेला बैठा रहा।

सामने बेटे की तस्वीर थी।

उसने तस्वीर से पूछा—
“हमसे कहाँ भूल हुई?”
शायद किसी का दिल दुखा था।

शायद कोई ऐसा शब्द
कह दिया गया था
जो नहीं कहना चाहिए था।

शायद दो लोग
एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे,

लेकिन धीरे-धीरे
एक-दूसरे से बात करने का
सलीका भूल गए थे।

वह नहीं जानता था।
माता-पिता
कभी पूरी कहानी नहीं जान पाते।

वे केवल इतना जानते हैं—
जब उनके बच्चे दुखी होते हैं,
तो उनके भीतर भी
कुछ टूटता है।

उस रात
उसने फिर अपना फ़ोन उठाया।

लिखा—
“घर लौट आओ।”

बहुत देर तक
उन शब्दों को देखता रहा।

फिर मिटा दिया।

क्योंकि कभी-कभी
“घर लौट आओ”
एक आदेश जैसा सुनाई देता है,

जबकि पिता का हृदय
असल में कहना चाहता है—

“बस इतना मत होने देना
कि यह घर
हमेशा के लिए घर न रहे।”

उसने फिर लिखा।
इस बार
न बेटे का पक्ष लिया,
न अपना।
न किसी को दोष दिया।

बस लिखा—

“अगर हमसे कोई भूल हुई है,
तो हमें क्षमा कर देना।

अगर मेरे बेटे ने तुम्हारा दिल दुखाया है,
तो उससे कह देना।

अगर हमसे कोई ऐसी बात हुई है
जिसने तुम्हें भीतर तक चोट पहुँचाई,
तो हमें बता देना।

लेकिन अपने मौन को
उन दो लोगों का भविष्य
तय मत करने देना
जिन्होंने कभी
एक-दूसरे को अपना चुना था।”

उसकी उँगली
बहुत देर तक
SEND के ऊपर ठहरी रही।

जैसे एक छोटा-सा स्पर्श
किसी टूटे हुए रिश्ते की
पूरी नियति बदल सकता हो।

फिर उसने
बटन दबा दिया।

स्क्रीन पर आया—
“संदेश पहुँच गया।”

वह प्रतीक्षा करता रहा।
कुछ मिनट।
फिर एक घंटा।

फ़ोन की स्क्रीन
वैसी ही ख़ामोश रही।

लेकिन उसके भीतर
कुछ धीरे-धीरे
शांत होने लगा।

शायद पहली बार
उसने समझा—

किसी को
वापस आने के लिए
मजबूर नहीं किया जा सकता।

तर्कों से
टूटा हुआ रिश्ता
नहीं जुड़ता।

और किसी परिवार को
यह तय करके नहीं बचाया जा सकता
कि दोषी कौन था।

कभी-कभी
मनुष्य के पास
सिर्फ़ इतना ही बचता है—

दरवाज़ा खुला रखना,

दिल में
नफ़रत को जगह न देना,

और चुपचाप कहना—

“जब भी लौटने का मन हो,
हम तुम्हारी बात सुनने के लिए
यहाँ होंगे।”

बरसों पहले
एक दिन बेटे ने उससे पूछा था—

“पापा,
जब कोई अपना
हमसे नाराज़ हो जाए,
तो क्या करना चाहिए?”

तब वह हँस पड़ा था।
उसने कहा था—
“उसे थोड़ा समय दो।”

आज उसे लगा,
उस उत्तर का
एक हिस्सा तब
उससे छूट गया था।

उसे कहना चाहिए था—
“समय देना,
लेकिन उम्मीद मत छोड़ना।”

बूढ़े पिता ने
फ़ोन मेज़ पर रख दिया।

बाहर
शाम उतर रही थी।

आसमान का उजाला
धीरे-धीरे
अँधेरे में बदल रहा था।

और घर के भीतर
एक छोटी-सी रोशनी
अब भी जल रही थी।

वह रोशनी
निश्चितता नहीं थी।

न यह विश्वास था
कि सब कुछ फिर पहले जैसा
हो ही जाएगा।

न कोई ऐसी उम्मीद
जिसकी कोई गारंटी हो।

वह बस
वह रोशनी थी
जिसे माता-पिता
अपने बच्चों के लिए
जलाए रखते हैं—

तब भी,
जब बच्चे
घर लौटना बंद कर देते हैं।

शायद
यही प्रेम है।

किसी को
बाँधकर रखना नहीं।

अपनी बात
मनवा लेना नहीं।

यह साबित करना नहीं
कि गलती किसकी थी।

प्रेम शायद बस इतना है—

किसी के जीवन के
बंद दरवाज़े के बाहर
चुपचाप खड़े रहना,

बिना दस्तक दिए,
बिना कोई शिकायत किए,

और कहना—
“मैं तुम्हें
लौटने के लिए मजबूर नहीं करूँगा।

तुम्हें जब लौटना हो,
लौट आना।

तुम्हारे लिए
यह दरवाज़ा खुला रहेगा।

और हाँ—
जब भी लौटोगे,

तुम्हें यहाँ
एक रोशनी जलती मिलेगी।”

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