देवगढ़ के छोटे से रेलवे स्टेशन पर हमेशा गीली मिट्टी, चाय के पत्तों, कोयले के धुएँ और जंग की गंध आती थी—चाहे आसमान कितना भी साफ़ क्यों न हो। जब अर्णव ने अपने हाथ में भारी चमड़े का ब्रीफकेस लिए टूटे हुए लकड़ी के प्लेटफॉर्म पर कदम रखा, तो सूरज शिवालिक की पहाड़ियों के पीछे ढल रहा था और पटरियों पर लंबी, गहरी परछाइयाँ फेंक रहा था।
इस घाटी में कदम रखे उसे पूरे पंद्रह साल बीत चुके थे। पंद्रह साल—उस रात के बाद से, जब उनके परिवार का पीतल और काँच का पुराना कारखाना बंद हो गया था, जब उसके पिता पंडित त्रिलोकनाथ शास्त्री का शांत निधन हुआ था और जब अनन्या ने नदी किनारे पुराने बरगद के पेड़ के नीचे वादा किया था कि वह उसे छोड़कर कभी नहीं जाएगी।
उसने अपना बैग एक बेंच पर रख दिया और शाम की धुंध को पोंछने के लिए अपना चश्मा उतारा। कस्बे की खामोशी लगभग दम घोंटने वाली थी। बेंगलुरु और मुंबई जैसे शहरों में समय का अंदाज़ा ट्रैफिक के शोर, कॉर्पोरेट मीटिंग्स और स्मार्टफ़ोन की नोटिफिकेशंस से होता था। लेकिन यहाँ समय बहुत भारी और ठहरा हुआ महसूस हो रहा था—जैसे मिट्टी के कुल्हड़ में जमी हुई ठंडी रबड़ी।
"तो तुम अर्णव हो," स्टेशन के कोने से एक जानी-पहचानी, भारी आवाज़ आई।
अर्णव ने मुड़कर देखा। फटे हुए सूती कुर्ते और नेहरू जैकेट में एक बूढ़ा व्यक्ति हाथ में लालटेन लिए खड़ा था। उनके बाल उड़ते हुए रुई की तरह सफेद थे और चेहरे पर अनुभवों की गहरी रेखाएँ थीं।
"जी हाँ," अर्णव ने नम्रता से हाथ जोड़कर प्रणाम किया। "काका?"
"रामदीन काका ही कहो," बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा और अर्णव के महँगे चमड़े के जूतों को देखा। "तुम बिल्कुल पंडित जी जैसे दिखते हो। वही ऊँचा माथा। हालाँकि उन्होंने कभी ऐसी महँगी पतलून नहीं पहनी और न ही इतने लंबे समय के लिए इतना छोटा बैग लाए।"
"मैं यहाँ केवल तीन दिनों के लिए आया हूँ, काका," अर्णव ने कहा। "बस पैतृक हवेली का हिसाब-किताब करने और ज़मीन के दस्तावेज़ नगर पालिका को सौंपने के लिए।"
रामदीन काका ने सूखी ज़मीन की ओर देखा और सिर हिलाया। "पहाड़ी पर बनी वह 'शास्त्री हवेली' बिकना पसंद नहीं करती, अर्णव। और तीन दिन की यह छोटी-सी यात्रा तो उसे बिल्कुल रास नहीं आएगी।"
शास्त्री हवेली कस्बे से तीन मील दूर, अलकनंदा की एक सहायक नदी के तट पर एक पथरीली पहाड़ी पर स्थित थी। यह काले शहतीरों, नक्काशीदार लकड़ी और चूने-पत्थर से बनी तीन मंज़िला पुरानी हवेली थी, जिसके विशाल झरोखे और ढलवाँ छतें रात के अँधेरे में शांत प्रहरी की तरह दिखती थीं।
अर्णव अकेले ही पहाड़ी रास्ते पर पैदल चल पड़ा। उसने काका की बैलगाड़ी या साइकिल की पेशकश ठुकरा दी थी। उसे अपने चेहरे पर पहाड़ियों की ठंडी हवा महसूस करना पसंद था। फिर भी, जैसे-जैसे वह हवेली के करीब पहुँच रहा था, पुरानी यादें छन-छनकर बाहर आ रही थीं।
उसे अपने पिता, पंडित त्रिलोकनाथ की याद आई—जो देर रात तक अपने अध्ययन कक्ष में महोगनी के विशाल डेस्क पर पीतल के यंत्रों, खगोलीय तालिकाओं (पंचांग) और नीलम व स्फटिक के काँच के टुकड़ों से घिरे रहते थे। त्रिलोकनाथ केवल कारखाने के मालिक नहीं थे; वे प्रकाश और ध्वनियों के विज्ञान के अनूठे शोधकर्ता भी थे।
*"प्रकाश और ध्वनि केवल भौतिक वस्तुएँ नहीं हैं, अर्णव,"* उनके पिता अक्सर कहा करते थे। *"जो भी किरण या तरंग इस सृष्टि की किसी वस्तु पर पड़ती है, वह अपनी छाप छोड़ जाती है। यदि तुम सही पात्र (धातु व काँच) बना सको, तो बीते हुए कल को दोबारा जीवंत कर सकते हो।"*
अट्ठारह साल की उम्र में अर्णव उनके इन विचारों को पुरानी दकियानूसी बातें मानकर हँस दिया करता था। उसने अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री के लिए शहर का रुख किया और अपने पिता को उनके ताँबे के तारों, प्रिज़्मों और डार्क रूम के साथ अकेला छोड़ गया—और अनन्या को नदी के किनारे इंतज़ार करता हुआ छोड़ गया।
हवेली के भारी नक्काशीदार सागौन के दरवाज़े को धकेलते ही नमी, बासी धूप-अगरबत्ती और पुरानी किताबों की गंध ने उसका स्वागत किया। घर किसी प्राचीन मंदिर के गर्भगृह की तरह शांत और ठंडा था।
उसने पीतल का एक दीया जलाया। पीली रोशनी फैली और उसने विशाल आँगन को उजागर किया। हवा में धूल के कण तैर रहे थे। पंद्रह सालों में कुछ भी नहीं बदला था।
अर्णव अपने पिता के अध्ययन कक्ष (Study Room) में गया।
कमरा बिल्कुल वैसा ही था, जैसा पिता ने अपनी अंतिम साँस से पहले छोड़ा था। दीवारों पर वेदों, खगोलशास्त्र और ऑप्टिक्स (प्रकाशिकी) पर लिखे तालपत्र और किताबों की अलमारियाँ थीं। कमरे के बीचों-बीच एक बड़ी मेज़ पर स्फटिक के पात्र, पीतल के कम्पास और एक मखमली कपड़े से ढकी हुई विशाल संरचना रखी थी।
उत्सुक होकर अर्णव मेज़ के पास गया। उसने हाथ बढ़ाकर वह भारी मखमली कपड़ा हटा दिया।
कपड़े के नीचे पीतल और स्फटिक का एक विशाल, गोलाकार दर्पण (शीशा) रखा था—कम से कम तीन फीट चौड़ा—जो ताँबे, पीतल और अष्टधातु के तीन छल्लों के ढाँचे के भीतर जड़ा हुआ था। काँच पारदर्शी नहीं था; उसमें एक अजीब, दूधिया गहराई थी, जैसे गंगा के पानी में तैरती हुई नीली चाँदनी। उसके बाहरी किनारे पर ब्राह्मी और संस्कृत लिपि में छोटे-छोटे अंक व नक्षत्र उकेरे गए थे।
अर्णव थोड़ा झुका। दीये की रोशनी उस पर पड़ी, लेकिन परावर्तित होकर सीधे बाहर नहीं आई। ऐसा लगा, जैसे वह रोशनी उस गहरे स्फटिक के भीतर डूब गई हो।
उसने हाथ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ शीशे की सतह से बस एक इंच दूर थीं।
"अर्णव..."
वह आवाज़ एक हल्की-सी फुसफुसाहट थी—जैसे मंदिर के विशाल प्रांगण में गूँजती हुई शंख की अंतिम ध्वनि।
अर्णव ने झटके से अपना हाथ पीछे खींच लिया। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने दीया ऊपर उठाकर चारों ओर देखा। "वहाँ कौन है?"
अध्ययन कक्ष खाली था। नक्काशीदार झरोखों के पर्दे स्थिर थे।
"यह सिर्फ मेरा वहम है," उसने अपनी आँखें मलते हुए खुद से कहा। "थकावट की वजह से।"
उसने शीशे पर वापस मखमली कपड़ा ढक दिया और सोने के लिए अपने पुराने कमरे में चला गया।
उस रात अर्णव ने नदी के घाट का सपना देखा।
सपने में वह विशाल बरगद के पेड़ के नीचे घाट की सीढ़ियों पर खड़ा था। शाम की आरती का समय था। सामने अनन्या खड़ी थी। उसने साधारण सूती पीली साड़ी पहनी थी और उसके लंबे बालों में मोगरे का गजरा लगा था। उसने अपनी बंद हथेलियों में कुछ पकड़ रखा था—पीतल और काँच का एक छोटा-सा तराशा हुआ टुकड़ा।
"अगर तुम चले गए," अनन्या ने सपने में कहा। उसकी आँखें शांत और दुखी थीं। *"तो तुम अपनी पूरी ज़िंदगी शहर की बड़ी-बड़ी इमारतों में बिता दोगे, लेकिन ढूँढ़ते हमेशा वही रहोगे, जो यहाँ पीछे छोड़ गए।"
"मुझे जाना होगा, अनन्या," सपने में अर्णव ने जवाब दिया। *"इस छोटे-से कस्बे में मेरे सपनों के लिए कोई जगह नहीं है।"
उसने अपनी हथेलियाँ खोलीं। उस टुकड़े से एक अद्भुत नीली रोशनी निकली—
अर्णव एक झटके में जाग गया।
पूरा कमरा एक नीली, लयबद्ध रोशनी से नहाया हुआ था, जो उसके दरवाज़े के निचले हिस्से से छनकर आ रही थी।
वह तुरंत बिस्तर से उठा। फर्श नंगे पैरों के लिए ठंडा था। उसने दरवाज़ा खोला और गलियारे में आया। वह रोशनी नीचे—उसके पिता के अध्ययन कक्ष से आ रही थी।
अर्णव धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरा। हवेली में ताँबे और धूप की एक अजीब-सी महक फैली हुई थी।
अध्ययन कक्ष का दरवाज़ा थोड़ा खुला हुआ था। उसमें से नीले रंग की एक चमकदार किरण निकलकर गलियारे में बिछे कालीन पर पड़ रही थी।
अर्णव ने अपनी साँस रोकी और दरवाज़ा धकेला।
मखमली कपड़ा फर्श पर गिरा पड़ा था। गोलाकार स्फटिक के चारों ओर लगे अष्टधातु के छल्ले धीरे-धीरे घूम रहे थे। पीतल के छोटे-छोटे गियर एक सटीक क्रम में टिक-टिक कर रहे थे—जैसे प्राचीन जल-घड़ी की बूँदें गिर रही हों।
शीशे की दूधिया गहराई के भीतर रोशनी एक आकृति का रूप ले रही थी।
अर्णव मेज़ के पास गया। उसने शीशे में देखा।
उसे अपना चेहरा नहीं दिखा। उसे बीस साल पुरानी एक दोपहर के सुनहरे उजाले में नहाया हुआ देवगढ़ का बाज़ार दिखाई दिया। उसने अपने पिता को देखा—वे मुस्कुराते हुए गाँव के वैद्यजी के साथ बातें कर रहे थे। उसने ताँगे और लकड़ी की बैलगाड़ियाँ देखीं।
"यह असंभव है…" अर्णव बड़बड़ाया।
धातु के छल्ले एक तीखी ध्वनि के साथ घूमे। शीशे के भीतर की छवि बदली।
अब इसमें नदी का घाट दिख रहा था। बरगद की शाखाएँ पानी पर झुकी हुई थीं। सीढ़ियों पर अनन्या बैठी थी। वह सत्रह साल की थी। उसकी गोद में एक डायरी थी और वह बहते पानी में तैरते दीयों का चित्र बना रही थी।
अर्णव का गला भर आया। उसने खुद को रोक न पाते हुए धातु के उस ढाँचे को छू लिया।
जैसे ही उसकी उँगलियों ने ताँबे को छुआ, एक ऊर्जा की तरंग उसकी बाँह में दौड़ी। छल्लों के घूमने की गति अचानक बहुत तेज़ हो गई और शीशे की नीली रोशनी पूरे कमरे में फैल गई।
अध्ययन कक्ष की दीवारें ओझल हो गईं। बासी धूप की गंध की जगह नदी के किनारे की ताज़ी हवा और गीली मिट्टी की महक ने ले ली।
अर्णव अब कमरे में नहीं खड़ा था। वह नदी के घाट की ठंडी सीढ़ियों पर खड़ा था।
हवा पूरी तरह से असली महसूस हो रही थी। वह शाम की ठंडी हवा को अपने गालों पर महसूस कर सकता था और दूर मंदिर से आती घंटे-घड़ियाल की आवाज़ सुन सकता था।
कुछ ही दूरी पर अनन्या बैठी थी।
उसने ठंड से बचने के लिए लाल रंग की ओढ़नी ओढ़ रखी थी। उसका चेहरा ढलते हुए सूरज की ओर था।
"अनन्या?" अर्णव ने काँपती आवाज़ में पुकारा।
वह नहीं मुड़ी। उसने कोई हलचल नहीं की।
अर्णव कुछ कदम आगे बढ़ा। "अनन्या, क्या तुम मुझे सुन सकती हो?"
उसने अनन्या के कंधे को छूने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन उसका हाथ उसकी ओढ़नी के पार ऐसे निकल गया, जैसे वह केवल धूप और हवा से बनी हो।
वह वहाँ नहीं थी। अर्णव वहाँ केवल एक दर्शक था, जो अपने पिता के यंत्र द्वारा कैद की गई एक पुरानी याद के भीतर खड़ा था।
तभी अनन्या ने अपना सिर घुमाया और अर्णव के पार उस रास्ते की ओर देखा, जो कस्बे से नीचे आता था। उसके चेहरे पर एक शांत और गहरी तड़प थी।
"वह आज भी नहीं आएगा, बेटा," एक जानी-पहचानी आवाज़ आई।
अर्णव ने मुड़कर देखा। उसके पिता, पंडित त्रिलोकनाथ, रास्ते से नीचे आ रहे थे। उनके चेहरे पर थकान थी और आँखों में हमदर्दी।
"आज बेंगलुरु से उसका पत्र आया है," त्रिलोकनाथ ने अनन्या के पास रुकते हुए कहा। "उसे नई कंपनी में बड़ा पद मिल गया है। उसने लिखा है कि वह इस दिवाली पर भी नहीं आ पाएगा।"
अनन्या ने अपनी डायरी बंद कर ली। उसने अपनी लाल ओढ़नी को कसकर लपेटा।
"उसे लगता है कि इस कस्बे में ऐसा कुछ नहीं है, जो रुकने लायक हो," उसने बहुत धीरे से कहा। उसकी आवाज़ उतनी ही साफ़ थी, जितनी मंदिर की पीतल की घंटियाँ।
"वह अभी युवा है," त्रिलोकनाथ ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा। "युवाओं को लगता है कि जीवन का अर्थ केवल बड़ी इमारतों और बड़े शहरों में ही मिलता है। वे यह नहीं समझते कि अपनी जड़ों को छोड़कर पाई गई ऊँचाई अक्सर खोखली होती है।"
"मैं यहाँ हमेशा इंतज़ार नहीं कर सकती, चाचाजी," वह फुसफुसाई।
"मैं जानता हूँ, बेटी। मैं जानता हूँ।"
दृश्य टिमटिमाने लगा। घाट की सीढ़ियाँ और नदी का पानी चाँदी की रोशनी में घुलने लगे। और एक भारी आवाज़ के साथ अर्णव अपने पिता के अध्ययन कक्ष के कठोर फर्श पर गिर पड़ा।
वह काफी देर तक वहीं पड़ा रहा।
अध्ययन कक्ष में फिर से खामोशी छा गई थी। स्फटिक का वह गोलाकार शीशा अब शांत था।
अर्णव धीरे-धीरे उठा। उसने देखा कि पीतल के उस ढाँचे के नीचे एक पुरानी हस्तलिखित डायरी रखी थी, जो उसने पहले नहीं देखी थी।
उसने उसे खोला। पहले पन्ने पर उसके पिता की स्पष्ट लिखावट में लिखा था:
अर्णव के लिए—जब वह आखिरकार ठहरकर देखना सीखे।
अर्णव पिता की पुरानी नक्काशीदार कुर्सी पर बैठ गया और पन्ना पलटा।
15 नवंबर, 1998
अष्टधातु और स्फटिक का यह संयोजन आखिरकार सफल हुआ। इस घाटी की हवा और नदियों में कुछ विशेष है। जब प्रकाश और ध्वनि की तरंगें इस पात्र से गुजरती हैं, तो यह बीते हुए क्षणों की छाप को सहेज लेता है।
मैंने देवगढ़ के तीन दशकों के इतिहास और यादों को इसमें सहेजा है। मेले की रौनक, घाट की आरतियाँ, कारखाने के कारीगरों की हँसी...
अर्णव आज शहर चला गया। उसे लगता है कि मैं उसके फैसलों से रुष्ट हूँ। मैं रुष्ट नहीं हूँ। मैं बस दुखी हूँ कि वह यह नहीं देख पाया कि जिस समृद्धि की तलाश में वह भटक रहा है, उसकी नींव यहीं उसकी अपनी मिट्टी में थी। उसने आगे देखने में इतना समय लगा दिया कि वह अपनी जड़ों को ही भूल गया।
मेरे बेटे, यदि तुम इसे पढ़ रहे हो, तो इस हवेली और कारखाने को बिकने मत देना। अतीत कोई बोझ नहीं है, जिसे फेंक दिया जाए—यह तो वह आधार है, जिस पर आने वाली पीढ़ियाँ खड़ी होती हैं।
अर्णव ने डायरी बंद कर दी। उसने अपनी आँखें मूँद लीं।
उसे समझ आ गया था कि अनन्या ने कुछ वर्षों बाद यह कस्बा क्यों छोड़ दिया था और उसकी शादी किसी दूसरे शहर में क्यों हो गई थी। वह किसी गुस्से में नहीं गई थी, बस एक ऐसे इंसान के इंतज़ार में थक गई थी, जो अपनी जड़ों को भूल चुका था।
अर्णव ने अपनी पूरी ज़िंदगी कॉर्पोरेट रेस में दौड़ते हुए, पैसे कमाते हुए और काँच-कंक्रीट के शहरों में बिता दी थी। वह हमेशा खुद से कहता था कि वह प्रगति कर रहा है। लेकिन आज उसे सच समझ आया: वह प्रगति नहीं कर रहा था, वह बस अपनी पहचान से भाग रहा था।
जब सुबह की पहली किरण शिवालिक की पहाड़ियों के ऊपर चमकी, तो अर्णव हवेली के मुख्य बरामदे में आया।
रामदीन काका हाथ में नगर पालिका के दस्तावेज़ लिए पहाड़ी रास्ते से ऊपर आ रहे थे।
"राम-राम, अर्णव," काका ने पुकारा। "मैं तहसील से कागज़ात ले आया हूँ। अगर तुम आज इस पर हस्ताक्षर कर दो, तो यह ज़मीन और हवेली नगर पालिका के सुपुर्द हो जाएगी।"
अर्णव बरामदे में खड़ा होकर नीचे फैली घाटी को देख रहा था।
नदी के ऊपर से सुबह की धुंध हट रही थी। देवगढ़ का पुराना कस्बा जाग रहा था—मंदिरों से शंखध्वनि आ रही थी और चाय की दुकानों से धुआँ उठ रहा था।
"काका," अर्णव ने शांत पर दृढ़ आवाज़ में कहा।
"हाँ, बेटा?"
"क्या अपने कारखाने की पुरानी इमारत और शेड अभी भी ठीक हैं?"
रामदीन काका ने हैरानी से देखा। "पीछे की छत थोड़ी ढह गई है, लेकिन मुख्य ढाँचा और पीतल ढालने वाली भट्टी आज भी वैसी ही मज़बूत है। तुम यह क्यों पूछ रहे हो?"
अर्णव ने अपनी जेब से फाउंटेन पेन निकाला। उसने काका के हाथ से दस्तावेज़ लिए और दस्तखत करने के बजाय कागज़ पर एक बड़ी लकीर खींचते हुए लिखा: **अस्वीकृत (CANCELLED)
उसने कागज़ात काका को वापस थमा दिए।
"नगर पालिका से कह दीजिए कि शास्त्री हवेली और कारखाने की ज़मीन बिक्री के लिए नहीं है," अर्णव ने कहा। "और कस्बे के मिस्त्री से कहिए कि मुझे सोमवार सुबह यहाँ कारीगर चाहिए। हम कारखाने और हवेली की मरम्मत शुरू कर रहे हैं।"
रामदीन काका ने कागज़ को देखा और फिर अर्णव की ओर। उनके चेहरे पर एक झुर्रियों भरी, आत्मीय मुस्कान फैल गई।
"तो तुम वापस आ गए, अर्णव?" काका ने पूछा।
"मुझे यहाँ बहुत-सा काम करना है, काका," अर्णव ने शास्त्री हवेली की ओर देखते हुए मुस्कुराकर कहा। "मैंने पंद्रह साल दूर रहकर बिता दिए। अब समय आ गया है कि मैं अपनी मिट्टी में वापस कुछ नया रचूँ।"
रामदीन काका ने संतोष से सिर हिलाया। "पंडित जी की आत्मा आज बहुत प्रसन्न होगी," उन्होंने कहा और वापस मुड़ गए।
अर्णव काफी देर तक बरामदे में खड़ा रहा, पहाड़ियों की ठंडी हवा और देवदार के वृक्षों की महक को अपनी साँसों में भरता हुआ। पंद्रह सालों में पहली बार उसने अपनी घड़ी नहीं देखी। वह बस शांत खड़ा था—अपनी जड़ों के पास, अपनी नई शुरुआत को देखने के लिए।