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यह बिना किसी चेतावनी के शुरू हो गई थी।

एक पल आसमान शांत था—भारी, अनिश्चित—और अगले ही पल बारिश आ गई। न किसी ज़ोर-शोर के साथ, न किसी जल्दबाज़ी के साथ, बल्कि एक शांत आग्रह के साथ, मानो वह बरसने के लिए सही पल का इंतज़ार कर रही हो।

अर्जुन सड़क किनारे बने कैफ़े की छोटी-सी छत के नीचे आ गया और अपनी आस्तीनों से बारिश की बूँदें झाड़ने लगा।

"अजीब है," उसने धीरे से कहा, मानो खुद से ही बात कर रहा हो। "मौसम के पूर्वानुमान में तो बारिश का कोई ज़िक्र नहीं था।"

"कुछ चीज़ें पूर्वानुमान का इंतज़ार नहीं करतीं।"

यह आवाज़ उसके पीछे से आई। वह मुड़ा। और एक पल के लिए मानो बारिश भी थम-सी गई।

"मीरा?"

वह वहीं खड़ी थी, छत के ठीक किनारे पर, बारिश को अपने बालों और कंधों पर गिरने दे रही थी—मानो उसे बारिश से बचने की कोई ज़रूरत ही न हो।

"नमस्ते, अर्जुन।"

उसकी आवाज़ शांत थी। न तो बहुत दूर की, न ही बहुत गर्मजोशी भरी। बस... स्थिर।

वह उसे घूमता जा रहा था, मानो उसमें कुछ ढूँढ़ रहा हो—कोई पहचान, कोई अपनापन, या शायद अपना बीता हुआ कल।

"तुम बिल्कुल नहीं बदली," उसने कहा।

वह हल्की-सी मुस्कुराई। "ऐसा बहुत कम ही होता है, अर्जुन।"

वे दोनों वहीं खड़े रहे—उनके बीच कुछ फ़ीट की दूरी थी और कई सालों का फ़ासला।

उनके बीच की खामोशी को बारिश ने भर दिया।

"तुम यहाँ हो?" उसने पूछा—एक ऐसा सवाल जिसकी कोई ज़रूरत नहीं थी।

"यही सवाल मैं तुमसे भी पूछ सकती हूँ।"

उसने सिर हिलाया। "काम से। एक कॉन्फ्रेंस है।"

"बेशक," उसने कहा। "तुम्हारे पास हमेशा ही कोई-न-कोई बहाना होता था।"

ये शब्द बहुत सीधे-सादे थे, मगर वे उसके ज़हन में ठहर गए।

"और तुम?" उसने पूछा।

"बस घूमने आई हूँ," उसने जवाब दिया। "मेरे माता-पिता अभी भी यहीं आस-पास रहते हैं।"

एक कार गुज़री और सड़क पर पानी के छींटे उछालती चली गई। दोनों में से कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला।

"काफ़ी समय हो गया है…" उसने बात शुरू की।

"कई साल," उसने बात पूरी की।

"हाँ।"

दोनों मुस्कुराए। एक ऐसी मुस्कान, जो गुज़रे हुए वक़्त को बिना नापे-तौले ही स्वीकार कर लेती है।

"क्या तुम अब भी..." वह बीच में ही रुक गया।

उसने अर्जुन की तरफ़ देखा और उसके आगे बोलने का इंतज़ार करने लगी।

"...वही पुरानी किताबें पढ़ती हो?" उसने थोड़ी हिचकिचाहट के साथ अपनी बात पूरी की।

उसने अपना सिर हल्का-सा झुकाया। "हाँ, पढ़ती हूँ। और क्या तुम अब भी उन्हें समझने का नाटक करते हो?"

वह हँस पड़ा। उसे खुद भी हैरानी हुई। उस हँसी की आवाज़ उसे कुछ जानी-पहचानी-सी नहीं लगी—मानो वह किसी ऐसे इंसान की आवाज़ हो, जो कभी वह खुद हुआ करता था।

“मैं कोशिश करता था,” उसने कहा। “ज़्यादातर इसलिए क्योंकि तुमने ज़ोर दिया था।”

“मैंने कभी ज़ोर नहीं दिया,” उसने जवाब दिया।

“तुमने दिया था।”

“मैंने सुझाव दिया था,” उसने बात ठीक करते हुए कहा।

फिर एक पल का ठहराव आया। बारिश तेज़ हो गई।

“तुम भीग रही हो,” उसने कहा।

“तुम भी भीग रहे हो।”

“मैं तो छाँव में हूँ।”

“पूरी तरह से नहीं।”

उसने अपने कंधे की तरफ़ देखा। वह सही कह रही थी। बारिश की एक पतली-सी धार उस तक पहुँच गई थी।

“तुम यहाँ खड़ी हो सकती हो,” उसने कहा।

वह थोड़ा और पास आई, लेकिन बहुत ज़्यादा नहीं। बस इतनी पास कि दोनों को छाँव मिल सके।

कुछ देर तक दोनों बारिश को देखते रहे।

“तुम्हें याद है?” उसने अचानक पूछा, “पिछली बार जब ऐसी बारिश हुई थी?”

उसे याद था। बेशक, उसे याद था। लेकिन वह हिचकिचाया।

“यूनिवर्सिटी के पास?” उसने पूछा।

उसने सिर हिलाया। “तुम अपना छाता भूल गई थी।”

“और तुमने अपना छाता ठीक से शेयर करने से मना कर दिया था।”

“मैंने शेयर किया था।”

“बेमन से।”

वह मुस्कुराया। “तुम मुझसे तेज़ चल रही थी।”

“तुम हमेशा ज़रूरत से ज़्यादा धीरे चलते थे।”

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। और उस छोटे-से पल में, कुछ पिघल-सा गया।

“उस दिन,” उसने धीरे से कहा, “तुमने कुछ कहा था।”

उसने उसकी तरफ़ देखा। “क्या?”

उसने तुरंत जवाब नहीं दिया। इसके बजाय, वह बारिश को देखती रही। जैसे कि वह याद कहीं बारिश के बीच ही छिपी हो।

“तुमने कहा था,” उसने आगे कहा, “कि कुछ पलों को थोड़ा और लंबा खींचना चाहिए... ताकि वे इतनी जल्दी खत्म न हो जाएँ।”

अब उसे याद आया। सिर्फ़ शब्द ही नहीं, बल्कि जिस अंदाज़ में उसने वे शब्द कहे थे। बेपरवाही से। बेख़बरी में।

“मैं तो बहुत कुछ कहता रहता था,” उसने कहा।

“हाँ,” उसने जवाब दिया। “तुम कहते थे।”

बारिश थोड़ी और तेज़ हो गई। कैफ़े के बाहर की दुनिया धुंधली-सी हो गई।

“तुम क्यों नहीं आए?” उसने पूछा।

यह सवाल अचानक पूछा गया था। लेकिन इसकी उम्मीद थी। उसने नासमझी का दिखावा नहीं किया।

“मीरा...”

“नहीं,” उसने धीरे से कहा। “बस जवाब दो।”

उसने नीचे अपने हाथों की तरफ़ देखा, जो अब ज़्यादा उम्रदराज़ लग रहे थे और जिनमें अब पहले जैसा आत्मविश्वास नहीं था।

“मुझे लगा…” उसने कहना शुरू किया, फिर रुक गया।

“क्या?” उसने पूछा।

“मुझे लगा कि तुम नहीं चाहती कि मैं ऐसा करूँ।”

वह उसकी तरफ़ मुड़ी। पहली बार उसकी आँखों में कुछ था। गुस्सा नहीं। उदासी भी नहीं। बस… स्पष्टता।

“मैंने इंतज़ार किया,” उसने कहा।

शब्द धीरे से निकले, लेकिन उनमें वज़न था।

“कितनी देर तक?” उसने पूछा।

वह मुस्कुराई। एक छोटी, थकी हुई मुस्कान।

“काफ़ी देर तक,” उसने कहा।

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