Source:  miniperde on pexels.com

काँच के महलों-सा हमने, उम्मीदों का शहर बसाया,
जिनके हाथों में पत्थर थे, उन्हीं को अपना साया बनाया।
पूछा किसी ने दर्द का सबब, तो दिल ने यही दोहराया—
दोष हवाओं का था ही नहीं, हमने चिराग ही गलत जलाया।

उम्मीदें बाँधी उन रस्मों से, जो निभाने के काबिल न थे,
हम वफ़ा की आस में तड़पे उनसे, जो समझने के काबिल न थे।
हमने रिश्तों को इबादत समझा, उन्होंने बस एक दस्तूर माना,
हमने जीवन का अर्थ खोजा, उन्होंने केवल अपना फ़ायदा जाना।

जो साथ चलने के बने ही न थे इस मोड़ पर कभी,
हम उन्हीं के कदमों के निशाँ ढूँढ़ते रहे हर घड़ी।
हर आहट में उनका चेहरा था, हर ख़ामोशी में उनका नाम,
अपने ही दिल की वीरानी को देते रहे मोहब्बत का इल्ज़ाम।

जितनी गहरी आस जगाई, उतना ही गहरा ज़ख्म मिला,
जब टूटे वो कच्चे धागे, तो केवल तन्हाई और शिकवा मिले।
कुछ आँसू आँखों से बहे, कुछ रूह की तहों में उतर गए,
कुछ सवाल उम्रभर के लिए, मौन बनकर भीतर ही ठहर गए।

अजीब दस्तूर है इस दुनिया का—
लोग अक्सर वही वादे करते हैं, जिन्हें निभाने का इरादा नहीं होता।
और हम भोले मन वाले,
हर मुस्कान को अपनापन, हर ख़ामोशी को मजबूरी समझ बैठते हैं।

सच तो यह है—
अपेक्षाएँ कभी बाहर से जन्म नहीं लेतीं,
वे हमारे भीतर पलते उन भ्रमों की संतान होती हैं,
जो प्रेम के नाम पर विश्वास से भी अधिक मासूम होते हैं।
जब वे भ्रम टूटते हैं,
तो केवल रिश्ता नहीं टूटता,
मनुष्य का स्वयं पर विश्वास भी दरकने लगता है।

हमने सोचा था—
स्नेह का एक दीप अँधेरे को हर लेगा,
पर यह कहाँ जाना था कि
कुछ लोग स्वयं ही आँधियों के पक्षधर होते हैं।
वे रोशनी नहीं चाहते,
उन्हें तो केवल बुझते हुए दीपकों का तमाशा प्रिय होता है।

समय ने धीरे से कानों में कहा—
"जिसे तुम अपना सहारा समझते थे,
वह तुम्हारी परीक्षा थी।
जिसे तुम अपना दर्द समझते हो,
वही तुम्हारी सबसे बड़ी शिक्षा है।"

तब जाना—
हर बिछड़ना अभिशाप नहीं होता,
कुछ बिछड़नें आत्मा को स्वयं से मिलाने आती हैं।
कुछ लोग जीवन में इसलिए नहीं आते कि साथ निभाएँ,
वे आते हैं यह सिखाने कि
सच्चा सहारा बाहर नहीं, भीतर होता है।

सीख यही देती है दुनिया, और कहता है हर एक इंसान—
गैर से बाँधी हर उम्मीद, दे जाती है एक गहरा निशान।
जो सुख दूसरों की स्वीकृति में खोजता है,
वह अक्सर अपने ही अस्तित्व से दूर हो जाता है।
और जो स्वयं को पहचान लेता है,
उसे फिर किसी सहारे की आवश्यकता नहीं रहती।

अब ख्वाब बुनो खुद के दम पर, खुद पर ही ऐतबार करो,
औरों की चौखट छोड़ ज़रा, अपनी ही रूह से प्यार करो।
अपने भीतर एक ऐसा दीप जलाओ,
जिसे किसी और की साँसें बुझा न सकें।
अपनी आत्मा को इतना समृद्ध बनाओ
कि किसी की बेरुख़ी तुम्हारी शांति न छीन सके।

याद रखो—
उम्मीद जब दूसरों से जुड़ती है,
तो अक्सर टूट जाती है;
पर जब वही उम्मीद
अपने पुरुषार्थ, अपने विश्वास और अपने ईश्वर से जुड़ती है,
तो वह नियति बदलने की शक्ति बन जाती है।

न टूटेगा फिर कभी ये दिल, न होगा ये मन उदास,
जब खत्म होगी दूसरों से, ये बेबुनियाद उम्मीद की आस।
क्योंकि अंततः—
सबसे सुरक्षित आश्रय किसी और का कंधा नहीं,
अपनी आत्मा का धैर्य है।
सबसे सच्चा रिश्ता किसी और से नहीं,
अपने अंतर्मन से होता है।
और सबसे बड़ी मुक्ति तब मिलती है,
जब मन यह स्वीकार कर लेता है कि—

"जो अपने नहीं थे, उन्हें खोया नहीं जाता;
और जो सचमुच अपने होते हैं,
उन्हें पाने के लिए उम्मीदों की नहीं,
केवल प्रेम और विश्वास की आवश्यकता होती है।”

.    .    .