मैं उस दर्द के बारे में लिखना चाहता हूँ
जिसे कभी कोई नाम नहीं मिला—
जो भीड़ के बीच भी
अकेला खड़ा रहा,
तालियों के शोर में
अपनी ही धड़कन
पहचानने की कोशिश करता रहा।
वह दर्द
जो शिकायत नहीं बना,
जो सवाल होकर
किसी से टकराया नहीं—
बस हर दिन
थोड़ा-थोड़ा
अंदर उतरता चला गया।
मैं उस दर्द के बारे में लिखना चाहता हूँ
जो तुम्हारे कंधे पर
किसी अदृश्य हाथ की तरह
सदा टिका रहा,
जिसने सिखाया
कि मुस्कराते रहना भी
कभी-कभी
एक थकाने वाला काम होता है।
जो हर “मैं ठीक हूँ” के पीछे
चुपचाप
अपनी साँसें गिनता रहा,
और खामोशी को ही
अपना सबसे सुरक्षित जवाब
मानता रहा।
मैं उस ठहराव के बारे में लिखना चाहता हूँ
जिससे तुम डर गए थे—
जब रास्ता अचानक
बीच में थम गया,
और भागते-भागते
तुम पहली बार
खुद के सामने
खड़े हो गए।
वह ठहराव
जो खाली नहीं था,
बस शोर से मुक्त था—
जहाँ तुमने सुनी
अपनी ही अनसुनी आवाज़,
और जाना
तुम वह नहीं हो
जो दुनिया ने तुम्हें समझा था।
दुनिया ने जो दिया
उससे खुशी नहीं मिली,
पर जो तुमने दुनिया को दिया—
वहीं कहीं
तुम खुद से मिलने लगे।
मैं लिखना चाहता हूँ
पूरा होने की उस धीमी,
बहादुर प्रक्रिया के बारे में—
जहाँ हर सुबह
खुद को
दोबारा चुनना पड़ा,
डर के साथ,
काँपते भरोसे के साथ।
जहाँ टूटे हुए हिस्सों को
छिपाया नहीं गया,
बल्कि धैर्य से
जोड़ा गया।
और वहीं तुम समझ पाए—
संपूर्णता कोई मंज़िल नहीं,
बल्कि एक यात्रा है
जो चीखकर नहीं,
चुप रहकर
पूरी होती है।
और उसी चुप्पी में
तुम आखिरकार
अपने हो गए।