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कभी-कभी सोचता हूँ—

मनुष्य सबसे दूर
विदेश जाकर नहीं,
अपने बचपन से जाकर होता है।

एक समय था
जब मेरी दुनिया
बहुत छोटी थी।

उसमें
एक कच्चा आँगन था,
बरसात के बाद मिट्टी की भीनी गंध,
दोपहर में उनींदा पड़ा बरगद,
शाम को लौटते मवेशियों की घंटियाँ,
और कुछ ऐसे लोग
जिन्हें मेरे आने-जाने का समय
घड़ी देखकर नहीं,
दिल से पता चल जाता था।

उन दिनों
मैं जल्दी बड़ा होना चाहता था।

लगता था,
दुनिया कहीं और है,
और मैं अभी तक
उसके बाहर खड़ा हूँ।

फिर एक दिन
मैं सचमुच चल पड़ा।

रास्ते बदलते गए।
शहर बदलते गए।
चेहरे बदलते गए।

मेरे नाम के साथ
नई-नई पहचानें जुड़ती रहीं,
और मैं
धीरे-धीरे
वह सब बनता गया
जिसका कभी सपना देखा था।

लेकिन सपनों की अपनी एक कीमत होती है।
उसे हमेशा पैसे से नहीं चुकाया जाता।

कभी-कभी
उसकी कीमत
वे लोग होते हैं
जो बिना शिकायत किए
पीछे छूट जाते हैं।

वे कभी रोकते नहीं थे।
बस पूछ लेते—
"इस बार कितने दिन रुकोगे?"

और मैं
हर बार मुस्कुराकर कह देता—

"ज़्यादा नहीं...
फिर आऊँगा।"
अब लगता है,

'फिर' शायद
कैलेंडर का नहीं,
मनुष्य का सबसे अधूरा शब्द है।

समय बीतता गया।
लोग मुझे पहचानने लगे।
सम्मान मिला।
कामयाबी मिली।
भीड़ भी मिली।

लेकिन एक शाम,
जब सारी आवाज़ें लौट गईं,

कमरे में
सिर्फ़ मेरी साँसें रह गईं।

उसी दिन पहली बार
अकेलापन
मुझसे आकर बैठा।
उसने कुछ कहा नहीं।

बस
मुझे मेरे ही भीतर
एक खाली घर दिखा दिया।

तब याद आया—
बरगद की छाँव में
बिना किसी वजह बैठे रहना।

खेतों की मेड़ों पर
दूर तक चलते जाना।

माँ का
रसोई से आवाज़ देना—
"खाना ठंडा हो जाएगा।"
आज सोचता हूँ,

उस आवाज़ में
रोटी कम,
प्रेम ज़्यादा था।

याद आए
वे लोग
जिन्होंने कभी यह नहीं पूछा
कि मैंने क्या पाया।

वे बस इतना देख लेते थे
कि मैं थका हुआ हूँ।

और बिना कुछ कहे
मेरे पास बैठ जाते थे।

आज लौटना चाहूँ भी
तो कहाँ लौटूँ?

गाँव शायद वहीं होगा।

बरगद भी।

पगडंडी भी।

लेकिन जिन कदमों के लिए
वे रास्ते बने थे,
वे दिन

अब कहीं और बस चुके हैं।
शायद
घर ईंटों से नहीं बनता।
प्रतीक्षाएँ बदल जाती हैं।

हम कहते हैं
समय निकल गया।

असल में
समय कहीं नहीं जाता।

वह चुपचाप
हमारे हिस्से के लोगों को
एक-एक करके
स्मृति में बदल देता है।

और एक दिन
हम उसी रास्ते पर लौटते हैं
जहाँ कभी
पूरी दुनिया हमारा इंतज़ार करती थी।

अब वहाँ
हवा तो होती है,

पर पुकारने वाला
कोई नहीं।

यदि कभी
ईश्वर पूछे—

"क्या चाहिए?"
तो मैं
लंबी उम्र नहीं माँगूँगा।

न नाम।
न सम्मान।

मैं बस
एक साधारण-सी साँझ माँगूँगा—

जिसमें
माँ आँगन में बैठी हो,

कोई मित्र
बिना बताए चला आया हो,

दूर कहीं
गायों की घंटियाँ बज रही हों,

और मुझे
कहीं जाने की जल्दी न हो।

शायद
सुख
बहुत बड़ा शब्द नहीं है।

वह ऐसे ही
छोटे-छोटे दृश्यों में रहता है,
जिन्हें हम
जीते समय
पहचान नहीं पाते।
अब समझ में आता है—

लौटना
हमेशा किसी जगह पर लौटना नहीं होता।

कई बार
लौटना
अपने भीतर बची हुई
उस सरलता तक पहुँच जाना होता है,

जिसे दुनिया की दौड़ में
हमने सबसे पहले खो दिया था।

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